परिचय बिहार भारत का ऐसा तीसरा सबसे बड़ा राज्य है जहाँ अनुसूचित जनजातियों की बड़ी आबादी निवास करती थी। 1981 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में अनुसूचित जनजातियों की आबादी 58,10,867 है। यह राज्य की कुल आबादी का 8.31 प्रतिशत बैठता है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 29.10.1956 को संविधान के अनुच्छेद (i) के तहत जारी अधिसूचना न. एस.आर.ओ. 2477-ए के मुताबिक बिहार में 30 अनुसूचित जनजातियों को सूचीबद्ध किया गया है। सूचीबद्ध जनजातियों में कुछ ऐसी जातियां है जिनकी आबादी काफी है जैसे – संथाल (20.6 लाख), उराँव (10.5 लाख), मुंडा (8.5 लाख), हो (5.4 लाख), खरवार (2.2 लाख), लोहरा (1.7 लाख), खड़िया (1.4 लाख), भूमिज (1.4 लाख) लेकिन यहाँ ऐसी भी जातियां है जिनकी आबादी बिलकूल नगण्य है जैसे – बंजारा (412), खोंड़ (1,263), बथुडी (1,595), सावर (3,014), बैगा (3,553), विरजिया (4,057) और विरहोर (4,337)। हालाँकि मध्य और उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों जैसे सासाराम, भभूआ, चंपारण, पूर्णिया, भागलपुर और मुंगेर जिले में छिटपुट तौर पर जनजातियाँ फैली हुई लेकिन मुख्य रूप से ये छोटानागपुर के पठार और संथाल परगना क्षेत्र में निवास करते हैं। इस क्षेत्र को राजनीतिक इलाके में झारखण्ड या वनांचल के नाम से पुकारा जाता है। अनुसूचित जनजातियों के परम्परागत निवास अनुसूचित जनजातियों के परम्परागत निवास जिसके अंतर्गत राज्य के 16 जिले आते हैं मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया। ये हैं – (ए) उत्तरी छोटानागपुर डिविजन जिसका मुख्यालय है हजारीबाग। इसके अंतर्गत पांच जिले हैं – हजारीबाग, चतरा, गिरिडीह, धनबाद और बोकारो। (बी) दक्षिणी छोटानागपुर डिविजन जिसका मुख्यालय है रांची। इसके अंतर्गत सात जिले हैं – रांची, गुमला, लोहरदगा, पलामू (डालटेनगंज), गढ़वा, पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा), पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर)। (सी) संथाल परगना डिविजन जिसका मुख्यालय है दुमका। इसके अंतर्गत चार जिले हैं। दुमका, साहेबगंज, गोड्डा, और देवघर। हालाँकि इन क्षेत्रों को आदिवासियों का पारंपारिक निवास स्थान माना गया है जहाँ कि 58.11 लाख की जनजातीय आबादी में आदिवासियों की संख्या 54.9 लाख है (94.7 प्रतिशत)। लेकिन वास्तविकता है की वे इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक है क्योंकि उनकी आबादी 1981 की जनगणना की मुताबिक क्षेत्र की कुल आबादी का सिर्फ 32.2 प्रतिशत है। यहाँ की कुल आबादी उपलब्ध आंकड़े के मुताबिक 181.7 लाख है। यह स्वाभाविक है कि इस क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों की वर्तमान अनुपातिक आबादी आगे व्यापक रूप से घटेगी। 43604 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए 1974 – 75 में ट्राइबल सब प्लान बनाया गया। इसके अंतर्गत सात जिलों को सम्पूर्ण रूप से तथा तीन जिलों के कुछ हिस्सों जिनमें 112 ब्लाक तथा 11 सब – डिविजन आते हैं को रखा गया। इस सब प्लान के द्वारा क्षेत्र के 87.56 लाख की आबादी (1981 की जनगणना) जिसमें अनुसूचित जनजातियों के 43.29 लाख सदस्य या 49.44 प्रतिशत सहमी हैं को रखा गया। अर्थात सब प्लान के अंदर बिहार की कुल अनुसूचित जनजातियों की आबादी के करीब 75 प्रतिशत भाग को लाया गया। जनजातियों का भू-वर्गीकरण इस ट्राइबल सब प्लान के माध्यम से सम्पूर्ण अनुसूचित क्षेत्र के अलावा पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूम और घाटशिला सब डिविजन पश्चिमी सिंहभूम के सराईकेला सब डिविजन के चांडिल ब्लाक तथा ईचागढ़ ब्लाक। गोड्डा जिले के सुन्दर पहाड़ी ब्लाक तथा बोराईजोर ब्लाक और गढ़वा जिले के भंडरिया को भी अपने कार्यक्षेत्र में लिया गया। ये सभी क्षेत्र छोटानागपुर और संथाल परगना डिविजन में आते हैं। धालभूम सब डिविजन से अलग कर बनाये गये नये घाटशिला सब डिविजन को छोड़कर सभी सब डिविजनों का एक इकाई माना गया है, जिनमें अन्य राज्यों की तरह आई . टी. डी. पी. के ढर्रे पर 14 एम. ई. एस. ओ. (मेसो) स्थापित किये गये हैं ये हैं रांची, खूँटी सब डिविजन। गुमला जिले के गुमला और सिमडेगा सब डिविजन। लोहरदगा सब डिविजन। पूर्वी सिंहभूम जिले का धालभूम सब डिविजन। इसमें घाटशिला सब डिविजन भी शामिल है। पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा, चक्रधरपुर, सराइकेला सब डिविजन। दुमका जिले के दुमका और जामताड़ा सब डिविजन। साहेबगंज जिले के राजमहल और पाकुड़ सब डिविजन इसमें गोड्डा जिले के सुन्दर पहाड़ी और बोराईजोर ब्लाक शामिल हैं। पलामू जिले का लातेहार सब डिविजन इसमें गढ़वा जिले का भंडरिया ब्लाक शामिल है। आदिम जनजातियों की पहचान आदिम जनजातियों की पहचान के लिए जो आधारभूत बातें तय की गई हैं वे निम्नलिखित हैं – 1. कृषि की पुरानी तकनीक, 2. साक्षरता का निम्नस्तर और 3. स्थिर या घटती हुई आबादी। 1961 में पेश अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित आयोग (ढेबर आयोग) की रिपोर्ट, 1969 में ट्राइबल डेवलपमेंट प्रोग्राम की स्टडी टीम (शीलू एओ टीम) तथा छठा पंचवर्षीय योजना 1980 - 85 के दौरान वर्किंग ग्रुप ऑफ़ ट्राइबल डेवलपमेंट के कार्यों के आधार पर बिहार की नौ जातियों समेत 52 और अब 74 जातियों की पहचान आदिम जातियों के रूप में की गई है। यह निम्नलिखित प्रकार से है। आदिम जनजातियों की जनसंख्या एवं साक्षरता का अनुपात क्र. सं आदिम जातियां जनसंख्या साक्षरता का अनुपात 1961 1971 1981 1971 1981 1 असुर 5,819 7,026 7,783 5.41 10.37 2 माल पहाड़िया 45,423 48,636 79,322 3.03 6.14 3 सौरिया पहाड़िया 55,606 58,047 39,269 3.57 15.30 4 परहिया 12,268 14,651 24,012 2.71 7.59 5 विरहोर 2,438 3,464 4,377 2.51 5.71 6 विरजिया 4,029 3,628 4,057 5.21 10.50 7 कोरवा 21,162 18,717 21,940 2.95 9.55 8 सावर 1,561 3,548 3014 3.07 6.87 9 हिल खड़िया 9,423 10,241 12,387 कुल योग 1,57,729 1,67,958 1,96,161 अनुमानित आबादी 1981 की जनगणना के मुताबिक बिहार नौ आदिम जनजातियों की जनसंख्या 1.96 लाख के करीब थी। कुछेक आदिम जनजातियों की विलुप्त होती आबादी के बारे में समय – समय पर विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में अत्यंत चिंतित कर देने वाली रिपोर्ट और खबरें प्रकशित होती रही है। उपरोक्त आंकड़ा से भी इस बात के संकेत मिलते हैं कि विभिन्न जनगणना वर्षों में इनकी आबादी में अस्वाभाविक उतार - चढ़ाव आये हैं। उदाहारण के लिए 1961 से 1971 के बीच विरजिया और कोरवा की आबादी में (-10 प्रतिशत) की कमी आई। जबकि 1971 से 1981 के बीच सौरिया पहाड़िया की आबादी में (-32 प्रतिशत) और सावर में (-15 प्रतिशत) की गिरावट आई। इस संबंध में अनेक तर्क दिए गये हैं और वाद – विवाद हुआ है। लेकिन आदिम जनजातियों की आबादी में अस्वाभाविक उतार - चढ़ाव से संबंध विभिन्न पक्षों और तर्कों पर विचार के बाद मेरी अपनी राय यह है कि यह उतार – चढ़ाव मुख्य रूप से आधे - अधूरे ढंग से प्रशिक्षित और अपने कर्तव्य के प्रति कम समर्पित जनगणनाकरों की लापरवाही की वजह से देखने में आता है। मेरी राय यह भी है कि रहन – सहन के आदिम और तरीके, कुपोषण, ख़राब स्वास्थ्य और धीमी जन्म दर के बावजूद पिछले कुछ दशकों में आदिम जनजातियों की आबादी बढ़ोत्तरी के क्रम में है। वैसे वास्तविकता यह भी है कि क्या हिल खड़िया और सावर एक ही जाति है। हिल खड़िया जाती खड़िया जाति है। हिल खड़िया जाति खड़िया जाति के तीन शाखाओं में से एक है। ये लोग अपना कुलनाम सावर रखते हैं। इससे संभवता जनगणना अधिकारीयों में भ्रम पैदा होता है कि ये शायद सावर जाति के रूप में और कुछ अन्य कि सावर के रूप की गई है। ऐसा जान पड़ता है कि सावर की रूप में की गई है। अत: जनगणना के दस्तावेज़ में हिल खड़िया जाति की आबादी का कोई प्रमाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। ऐसी ही भ्रामक स्थिति से माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया और पहाड़िया जाति की आबादी में अस्वाभाविक उतार – चढ़ाव देखने में आता है। जहाँ 1971 और 1981 में सौरिया पहाड़िया की आबादी में 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है वहीँ माल पहाड़िया की आबादी में 63 प्रतिशत और पहाड़िया की आबादी में 64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। बिहार की सभी नौ आदिम जनजातियों की संस्कृतिक पृष्ठभूमि के बारे में यहाँ संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है। खेद है कि कुछ समय पूर्व बेंच मार्क सर्वे संपन्न हुआ लेकिन उसका कार्य अभी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही 1991 में संपन्न जनगणना के आंकड़े भी पूर्ण नहीं किये जा सके हैं। अत: यहाँ इस संबंध में अद्यतन आंकड़े सम्मिलित नहीं किये जा सके हैं। स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार