परिचय आदिम जनजाति या Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTG) भारत सरकार द्वारा चिह्नित वह विशेष जनजातीय समुदाय हैं जो सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे अधिक पिछड़े हुए हैं तथा विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहे हैं। इन्हें पहले Primitive Tribal Groups (PTG) कहा जाता था, जिसे 2006 में बदलकर PVTG किया गया। भारत में कुल 75 PVTG हैं, जिनमें से अधिकतम 13 ओडिशा में हैं। झारखंड में 9 PVTG हैं, जो संख्या की दृष्टि से देश में दूसरा स्थान रखता है। ये 9 जनजातियाँ हैं – असुर, बिरजिया, बिरहोर, कोरवा, मल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, सवर, सोरिया और परहैया। इन जनजातियों की पहचान निम्नलिखित तीन मुख्य मानदंडों के आधार पर की गई है: घटती या स्थिर जनसंख्या (Declining or stagnant population) प्राक-कृषि स्तर की तकनीक एवं पिछड़ी हुई आजीविका (Pre-agricultural technology level) अत्यंत निम्न साक्षरता दर एवं आर्थिक पिछड़ापन (Extremely low literacy and subsistence level of economy) झारखंड में सर्वप्रथम 1975-76 में दुलो समिति की संस्तुति पर 8 जनजातियों को PTG घोषित किया गया था। बाद में 2007 में परहैया (बैगा परहैया) को शामिल कर कुल संख्या 9 की गई। ये जनजातियाँ मुख्यतः राज्य के ग्रामीण, वनांचल एवं पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती हैं और इनमें से कई का जीवन आज भी शिकार, संग्रहण और झूम खेती पर निर्भर है। वर्तमान में (2025 तक) इनकी कुल जनसंख्या लगभग 2.9 से 3.1 लाख के बीच अनुमानित है, जिसमें मल पहाड़िया सबसे बड़ी और सोरिया सबसे छोटी PVTG है। इनके संरक्षण के लिए केंद्र सरकार की “विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के विकास” योजना एवं झारखंड सरकार का PVTG विकास अभिकरण निरंतर कार्यरत है। झारखंड की 9 आदिम जनजातियों की नवीनतम सूची झारखंड में केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कुल 9 विशेष रूप से कमजोर आदिम जनजातियाँ (PVTG) हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी कुल जनसंख्या 2,92,359 थी। 2024-25 के मोबाइल ऐप आधारित हेबिटेशन सर्वे एवं राज्य सरकार के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार यह संख्या अब लगभग 3 लाख के आसपास पहुँच गई है। क्र.सं. जनजाति का नाम दूसरा नाम/उप-नाम मुख्य निवास जिले 2011 जनसंख्या 2024-25 अनुमानित जनसंख्या 1 असुर असुरा रांची, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा 22,459 ~25,000 2 बिरजिया बिरजिया गुमला, लातेहार, पलामू 6,750 ~7,000 3 बिरहोर - हजारीबाग, गिरिडीह, गुमला, चतरा, रांची 17,044 ~18,000 4 कोरवा - सरायकेला-खरसावाँ, पश्चिम सिंहभूम 35,806 ~37,000 5 मल (माल) पहाड़िया मलर/मालेर साहिबगंज, पाकुड़, गोड्डा, दुमका 1,35,797 ~1,40,000 6 सौरिया पहाड़िया कुमारभाग पहाड़िया साहिबगंज, पाकुड़, दुमका 44,129 ~45,000 7 सवर (सबैर) सौर/सावर रांची, गुमला, खूंटी, लोहरदगा 5,587 ~6,000 8 सोरिया (सबर) - पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला ~1,000 ~900–1,100 9 परहैया बैगा परहैया पलामू, गढ़वा, लातेहार 24,145 ~25,000 कुल अनुमानित जनसंख्या (2025) 2,92,359 (2011) ~3,00,000 महत्वपूर्ण नोट (2025 तक): सबसे बड़ी PVTG → मल पहाड़िया सबसे छोटी एवं संकटग्रस्त PVTG → सोरिया 2024-25 में पीएम-जनमन योजना के तहत PVTG बस्तियों में 100% आवास, बिजली, पानी एवं सड़क पहुँचाने का लक्ष्य स्रोत: झारखंड राज्य जनजातीय कल्याण अनुसंधान संस्थान (2024 सर्वे), भारत सरकार की PVTG रिपोर्ट 2023-24 प्रत्येक जनजाति का विस्तृत परिचय असुर जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास असुर जनजाति एक प्राचीन ऑस्ट्रोएशियाटिक (मुंडा) समूह है, जिसकी उत्पत्ति पूर्वी भारत के चोटानागपुर पठार से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे महिषासुर के वंशज हैं, जिन्हें दुर्गा पूजा के दौरान शोक मनाने की परंपरा है। ऐतिहासिक रूप से, असुर लौह-गलाने (आयरन स्मेल्टिंग) के विशेषज्ञ थे, जो वैदिक काल से जुड़े हैं। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन ने उनके पारंपरिक व्यवसाय को प्रभावित किया, जिससे वे आर्थिक रूप से पिछड़ गए। 1975-76 में दुलो समिति ने उन्हें PTG (अब PVTG) घोषित किया। 2011 जनगणना में झारखंड में 22,459 असुर दर्ज हैं, जो राज्य की 30 जनजातियों में 21वें स्थान पर हैं। निवास क्षेत्र एवं जिले असुर मुख्य रूप से झारखंड के रांची, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा और पलामू जिलों में निवास करते हैं। ये क्षेत्र घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरे हैं, जहां वे छोटे-छोटे गांवों (टोलों) में रहते हैं। कुछ असुर बिहार के पश्चिम चंपारण और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो) असुर भाषा मुंडा भाषा परिवार की है, जो ऑस्ट्रोएशियाटिक समूह से संबंधित है। यह मौखिक रूप से प्रचलित है, कोई लिखित लिपि नहीं है। दैनिक संवाद में हिंदी और सदरी का मिश्रण उपयोग होता है। भाषा संरक्षण के लिए असुर ट्राइबल विजडम सेंटर (जोबिपट, नेतरहाट) कार्यरत है। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि) असुर जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं, जहां लौह अयस्क प्रचुर है। उनके गांव मिट्टी के घरों से बने होते हैं, जिनकी दीवारों पर चित्रकारी की जाती है। वे गुफाओं और प्राकृतिक आश्रयों का उपयोग करते हैं, जो उनके शिकार और संग्रहण जीवन से जुड़े हैं। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज) पारंपरिक रूप से लौह-गलाने और शिकार पर निर्भर, अब मुख्यतः कृषि (चावल, मक्का) और मजदूरी। वे लघु वन उपज जैसे महुआ, शहद और जड़ी-बूटियां संग्रहित करते हैं। झूम खेती सीमित है, लेकिन वन संसाधनों पर निर्भरता बनी हुई है। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा) असुर 12 कुलों (क्लैन) में विभाजित हैं, जो जानवरों, पक्षियों और अनाजों के नाम पर हैं। कुल अंतर्विवाह निषिद्ध है। विवाह एक विवाह प्रथा पर आधारित है, विधवा पुनर्विवाह अनुमत। जाति पंचायत (जाति पंच) विवाद सुलझाती है। परिवार संयुक्त होता है। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य दुर्गा पूजा को महिषासुर शोक के रूप में मनाते हैं। सरहुल और सोहराई त्योहारों में सामूहिक नृत्य होते हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे ढोल और मांदर के साथ लोक नृत्य प्रचलित हैं। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा) एनीमिज्म, एनिमेटिज्म और प्रकृति पूजा का मिश्रण। मुख्य देवता सिंगबोंगा (सूर्य देव)। धरती माता, पूर्वज पूजा और काला जादू में विश्वास। सरना स्थलों पर पूजा होती है। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन) जनसंख्या स्थिर लेकिन साक्षरता दर मात्र 10% से कम। गरीबी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, वन कटाई से आजीविका प्रभावित। खनन परियोजनाओं से विस्थापन। सांस्कृतिक क्षरण और भाषा विलुप्ति का खतरा। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ PVTG के तहत SCA to PVTG योजना से आवास, शिक्षा (एकलव्य स्कूल), स्वास्थ्य (मोबाइल यूनिट)। बिरसा मुंडा आवास योजना और वन अधिकार अधिनियम (FRA 2006) से लाभ। 2024-25 में पीएम जनमन से 50 करोड़ आवंटन। बिरजिया जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास- बिरजिया असुर जनजाति का उप-समूह है, जिसकी उत्पत्ति ऑस्ट्रोएशियाटिक परिवार से है। वे चीन से पूर्वोत्तर भारत होते हुए चोटानागपुर पहुंचे। ऐतिहासिक रूप से लौह-गलाने वाले, लेकिन ब्रिटिश काल में वन कानूनों से प्रभावित। 1975 में PTG घोषित। 2011 में 6,750 सदस्य, जो घटती जनसंख्या दर्शाती है। निवास क्षेत्र एवं जिले- मुख्यतः गुमला, लातेहार, पलामू और रांची जिलों में। कुछ छत्तीसगढ़ और बिहार में। वे जंगलों के किनारे छोटे गांवों में रहते हैं। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो)- बिरजिया भाषा मुंडा समूह की, असुरी से निकट। इंडो-आर्यन प्रभाव। कोई लिपि नहीं, मौखिक। हिंदी और सदरी का उपयोग। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि)- घने जंगलों और पहाड़ियों में, जहां वे अस्थायी झोपड़ियां बनाते हैं। भौगोलिक अलगाव से अलग-थलग। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज)- वन उत्पाद संग्रहण (शहद, फल), शिकार और मजदूरी। झूम खेती सीमित। चाय बागानों में प्रवास मजदूरी। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा)- कुल-आधारित, असुर जैसे 12 क्लैन। एक विवाह, कुल अंतर्विवाह निषिद्ध। पंचायत प्रथा। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य- सरहुल, सोहराई। सामूहिक नृत्य ढोल के साथ। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा)- प्रकृति पूजा, पूर्वज और सिंगबोंगा। सरना पूजा। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन)- घटती जनसंख्या, साक्षरता <10%, कुपोषण, विस्थापन। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ- PVTG विकास अभिकरण, आवास, शिक्षा छात्रवृत्ति। पीएम जनमन योजना। बिरहोर जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास-बिरहोर मुंडा समूह के प्राचीन शिकारी- संग्राहक हैं, 'बिर' (जंगल) और 'होर' (लोग) से नाम। उत्पत्ति चोटानागपुर से। 1975 PTG घोषित। 2011 में 17,044 सदस्य। निवास क्षेत्र एवं जिले-हजारीबाग, गिरिडीह, गुमला, चतरा, रांची। अर्ध-घुमंतू। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो)- बिरहोर भाषा मुंडा, मौखिक। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि)- घने जंगल, अस्थायी टांडा (झोपड़ियां)। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज)- बंदर शिकार, शहद संग्रहण, रस्सी बनाना। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा)- उथलू (घुमंतू) और जंगी (स्थायी)। एक विवाह। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य- सरहुल, नृत्य। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा)- सूर्य देव, पूर्वज। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन)-घटती आबादी, निम्न साक्षरता, स्वास्थ्य। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ- स्थायीकरण, SCA योजना। कोरवा जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास -मुंडा समूह, सूरगुजा से झारखंड। महाभारत कौरव वंशज दावा। 1975 PTG। 2011 में 35,806। निवास क्षेत्र एवं जिले-सरायकेला-खरसावां, पश्चिम सिंहभूम। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो)-कोरवा भाषा मुंडा, भाशी कहते हैं। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि)-पहाड़ी जंगल। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज)-शिकार, वन उपज। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा)-अगारिया, पहाड़ी उप-समूह। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य-सतबाहिनी देवी पूजा। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा)-पूर्वज पूजा। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन)-भाषा विलुप्ति, गरीबी। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ-आवास, शिक्षा हॉस्टल। मल (माल) पहाड़िया जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास मल पहाड़िया (Mal Paharia) जनजाति झारखंड की सबसे प्राचीन और मूल निवासी आदिम जनजातियों में से एक है, जो विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह जनजाति मुख्य रूप से झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में राजमहल पहाड़ियों (कोहिस्तान के नाम से जाना जाता है) में निवास करती है, जिसमें पाकुड़, गोड्डा, दुमका और साहिबगंज जिले शामिल हैं। माल पहाड़िया समुदाय का एक उप-समूह है, जिसे मलेर या मालो के नाम से भी जाना जाता है। इनकी जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 1.25 लाख है, जिसमें साक्षरता दर मात्र 25% के आसपास है। यह लेख इनकी उत्पत्ति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक विशेषताओं और चुनौतियों पर केंद्रित है। माल पहाड़िया जनजाति पूर्वी भारत की सबसे पुरानी आदिवासी आबादी में से एक है, जिसकी जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यह समुदाय द्रविड़ियन समूह से उत्पन्न हुआ है, जो मूल रूप से कर्नाटक क्षेत्र से नर्मदा नदी के रास्ते प्रवास करते हुए बिहार के सोन नदी के किनारे पहुंचा। वहां से आगे बढ़ते हुए, अन्य समूहों के दबाव में वे पहाड़ी क्षेत्रों में बस गए।इनकी नस्लीय विशेषताएं प्रोटो-ऑस्ट्रलॉइड हैं, जिसमें छोटा कद, चौड़ी नाक, लंबा सिर, हल्का भूरा रंग और घुंघराले बाल शामिल हैं। इनकी भाषा माल्टो (Malto) द्रविड़ियन भाषा परिवार की है, जो ओरांव जनजाति की कुरुख भाषा से निकटता रखती है।माल पहाड़िया भाषा (जिसे माल paharia या माल्टो के नाम से जाना जाता है) लगभग 50,000 लोगों द्वारा बोली जाती है, जबकि जातीय जनसंख्या 1,10,000 के आसपास है।यह भाषा माल्टो और बंगाली से व्युत्पन्न है, जो 1881 से झारखंड में प्रचलित है। हालांकि, भाषाई वर्गीकरण में विवाद है—कुछ इसे इंडो-आर्यन (बंगाली-आसामी शाखा) मानते हैं, जबकि अन्य इसे माल्टो का उपभाषा या द्रविड़ियन-इंडो-आर्यन मिश्रित मानते हैं। यह भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, लेकिन औद्योगीकरण, बांधों, खदानों और शहरीकरण के कारण यह लुप्तप्राय हो रही है। माल पहाड़िया pahariya समुदाय के दो प्रमुख उप-समूह हैं: माल pahariya (दक्षिणी पहाड़ियों में निवास करने वाले) और सौरिया pahariya। माल pahariya मुख्य रूप से दामिन-ए-कोह के दक्षिणी हिस्सों और संथाल परगना के दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों में रहते हैं। इनकी उत्पत्ति गहन जंगलों और अलग-थलग स्थानों से जुड़ी है, जहां वे मुख्यधारा से अलग रहकर अपनी संस्कृति को संरक्षित रखते थे। माल पहाड़िया का इतिहास प्रतिरोध, विस्थापन और सांस्कृतिक संरक्षण की कहानी है। वे जंगल के संरक्षक और स्वतंत्र पहाड़ी निवासी थे, जो झूम खेती (कुरदो या झुम), शिकार और वन उत्पादों पर निर्भर थे। पूर्व-औपनिवेशिक काल (Pre-Colonial Period) प्राचीन काल में, माल पहाड़िया आर्य, मुगल और मराठा आक्रमणों का प्रतिरोध करते रहे। वे गुरिल्ला युद्ध शैली से अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते थे। चीनी यात्री फा-हिएन और ह्वेन सांग ने अपनी यात्राओं में इनकी विशिष्ट रीति-रिवाजों, भाषा और सामाजिक संरचना का उल्लेख किया है।16cb71 वे योद्धा थे, जो मैदानी इलाकों से पहाड़ियों में धकेल दिए गए, जिससे उनकी अलगाव और कमजोरी बढ़ी। औपनिवेशिक काल (Colonial Era) ब्रिटिश शासन के दौरान (1600 ई. से), माल पहाड़िया ने कड़ा प्रतिरोध किया। योद्धा रामना आधी ने गुरिल्ला युद्ध छेड़ा, जबकि जाबरा पहाड़िया (तिलका मांझी) ने 1784 में ब्रिटिश अधिकारी ऑगस्टस क्लीवलैंड की हत्या कर दी, जिसके लिए उन्हें 1785 में फांसी दी गई।ee63c9 ब्रिटिश नीतियां पहले समावेश की थीं (जैसे क्लीवलैंड द्वारा परिषदें और भत्ते), लेकिन बाद में फूट डालो और राज करो की रणनीति अपनाई गई, जिसमें संथालों को pahariya भूमि पर बसाया गया। दामिन-ए-कोह नीति (1832): इस नीति ने माल पहाड़िया को विस्थापित किया, क्योंकि संथालों को कृषि के लिए उनकी भूमि पर बसाया गया। इससे जनसांख्यिकीय क्षरण, भूमि हानि और अंतर-जनजातीय तनाव बढ़ा।6f8d4e 19वीं शताब्दी में औद्योगीकरण ने भाषा और संस्कृति को प्रभावित किया। स्वतंत्रता के बाद (Post-Independence) स्वतंत्र भारत में, माल पहाड़िया को PVTG का दर्जा मिला (भारत सरकार, जनजातीय मामलों का मंत्रालय, 2020)।93ce98 हालांकि, वन कटाई, पर्यावरण क्षरण और मजदूरी में बदलाव से वे हाशिए पर हैं। कई परिवार तमिलनाडु या गुजरात जैसे राज्यों में प्रवास करते हैं। ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ा है, जो पारंपरिक प्रथाओं से मिश्रित है। स्वास्थ्य, शिक्षा और भूमि अधिकार (वन अधिकार अधिनियम, 2006) जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। सांस्कृतिक पहलू और वर्तमान स्थिति माल पहाड़िया की संस्कृति प्रकृति से जुड़ी है—झुमुर गीत, नृत्य, सूती साड़ियां और मोतियों के हार। वे महुआ फूल, जड़ी-बूटियां और औषधीय पौधों पर निर्भर हैं।535e7c वर्तमान में, सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, कुपोषण और प्रवास प्रमुख मुद्दे हैं। हालांकि, सामुदायिक प्रयास जैसे तालाब पुनरुद्धार (जैसे बुद्धोबन तालाब, 2022 में पुनर्निर्मित) आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे रहे हैं। माल पहाड़िया की कहानी प्रतिरोध और लचीलापन की है, लेकिन उनके संरक्षण के लिए तत्काल कदम आवश्यक हैं। यह जनजाति झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। निवास क्षेत्र एवं जिले माल पहाड़िया (Mal Pahariya) एक प्रमुख प्राचीन जनजाति (Primitive Tribal Group) है, जो मुख्य रूप से झारखंड और उसके आसपास के क्षेत्रों में निवास करती है। मुख्य निवास क्षेत्र: संताल परगना प्रमंडल (Santhal Pargana Division), झारखंड प्रमुख जिले जहाँ माल पहाड़िया जनजाति की अच्छी-खासी आबादी है: साहिबगंज (Sahibganj) – सबसे अधिक केंद्रित क्षेत्र (राजमहल की पहाड़ियाँ) पाकुड़ (Pakur) गोड्डा (Godda) दुमका (Dumka) जामताड़ा (Jamtara) (कुछ हिस्सों में) देवघर (Deoghar) (सीमित संख्या में) विशेष क्षेत्र: राजमहल पहाड़ियाँ (Rajmahal Hills) – यह माल पहाड़िया का मूल और परंपरागत निवास क्षेत्र है। ये मुख्य रूप से पहाड़ी एवं जंगली क्षेत्रों में बसे हुए हैं और अभी भी काफी हद तक परंपरागत जीवन शैली जीते हैं। अन्य राज्य:- बहुत कम संख्या में पश्चिम बंगाल के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों (जैसे बीरभूम) और बिहार के भागलपुर के कुछ हिस्सों में भी मिलते हैं, लेकिन मुख्य आबादी झारखंड के संताल परगना में ही है। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो) मल्टो भाषा द्रविड़ियन। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि) माल पहाड़िया मुख्य रूप से राजमहल पहाड़ियों (Rajmahal Hills) और उसके आसपास के क्षेत्रों में रहते हैं, जो भौगोलिक रूप से बहुत विशिष्ट और दुर्गम है। इनकी प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं: 1. पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्र ऊँचाई: 200 से 600 मीटर (कुछ जगहों पर 700 मीटर तक) खड़ी ढाल वाली पहाड़ियाँ, गहरी घाटियाँ और संकरे रास्ते जंगल से ढके घने और बीहड़ इलाके (Dense Tropical Moist Deciduous Forests) 2. राजमहल ट्रैप बेसाल्ट क्षेत्र (Rajmahal Traps) यह क्षेत्र प्राचीन ज्वालामुखी लावा (Basalt Rock) से बना है। काली चट्टानें, गहरे खड्ड और पठारी संरचना मिट्टी: लाल-काली लैटेराइट और चट्टानी, कम उपजाऊ (खेती के लिए चुनौतीपूर्ण) 3. नदियाँ और जल स्रोत प्रमुख नदियाँ: बंसलोई, ब्राह्मणी, मोरंगी, त्रिकुटा आदि (गंगा की सहायक नदियाँ) पहाड़ियों से निकलने वाले अनेक छोटे-छोटे झरने और प्राकृतिक सोते बारिश के पानी पर बहुत निर्भरता (मानसून आधारित जल प्रणाली) 4. जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु गर्मी में तापमान: 42–45°C तक सर्दी में: 5–10°C तक भारी वर्षा: 1500–2000 मिमी (जून–सितंबर), जिससे भूस्खलन आम है 5. वन और जैव विविधता घने साल (Shorea robusta) के जंगल वन्य जीव: बाघ, तेंदुआ, भालू, सांभर, जंगली सूअर, विभिन्न प्रकार के साँप और पक्षी औषधीय पौधों की प्रचुरता (जो माल पहाड़िया पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग करते हैं) 6. भूमि उपयोग और आजीविका से जुड़ी विशेषताएँ ढलुआ खेत (टेरास फार्मिंग या झूम खेती के अवशेष) बहुत कम समतल भूमि → खेती सीमित (मुख्य फसल: मड़ुआ, ज्वार, मक्का, कोदो) जंगल पर निर्भरता: लकड़ी, शहद, महुआ, सागौन, औषधियाँ, छोटे-मोटे वन उत्पाद संक्षेप में माल पहाड़िया का भौगोलिक परिवेश: “बीहड़, जंगली, चट्टानी, ऊँची-नीची पहाड़ियों वाला दुर्गम क्षेत्र, जहाँ पहुँचने के लिए आज भी कई गाँवों में पक्की सड़क नहीं है।” इसी भौगोलिक पृथकता के कारण माल पहाड़िया आज भी अपनी भाषा, संस्कृति और परम्पराओं को बहुत हद तक संरक्षित रख पाए हैं। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज) माल पहाड़िया अभी भी अर्ध-खानाबदोश और वन-निर्भर जीवन जीते हैं। इनकी आजीविका का आधार बहुत हद तक परम्परागत और प्रकृति पर निर्भर है। वन उत्पाद संग्रहण- महुआ, चार, तेंदू पत्ता, शहद, औषधीय जड़ी-बूटी, साग-सब्जी, लकड़ी, बाँस- 40–50% झूम/ढलान खेती (Shifting + Terrace)-मड़ुआ, कोदो, ज्वार, मक्का, कुदरुम, जंगली आलू, छोटे-मोटे दालें- 25–30% मजदूरी (मनरेगा + अन्य)- मनरेगा, सड़क निर्माण, पत्थर तोड़ना, ईंट भट्ठा, शहरों में मौसमी मजदूरी- 15–25% पशुपालन- बकरी, मुर्गी, सूअर (बहुत कम संख्या में गाय-बैल)- 5–10% शिकार (अब बहुत कम)- जंगली सूअर, खरगोश, पक्षी (कानूनी प्रतिबंध के कारण अब गुप्त रूप से या बहुत कम)- <5% छोटे-मोटे शिल्प- बाँस की टोकरी, मछली पकड़ने का जाल, झाड़ू, चटाई विशेष बातें महुआ इनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है – फूल से शराब, बीज से तेल, दोनों बेचकर नकद आय। तेंदू पत्ता संग्रहण मौसमी रूप से बहुत बड़ी कमाई का साधन है (मई-जून में)। अभी भी कई गाँवों में बाजार से 15–30 किमी दूर हैं, इसलिए जंगल पर निर्भरता बहुत अधिक है। सरकारी योजनाएँ (मनरेगा, वन अधिकार पट्टे, प्रधानमंत्री आवास आदि) ने पिछले 10–15 सालों में मजदूरी और स्थायी खेती को बढ़ाया है, लेकिन जंगल अभी भी प्राथमिक स्रोत है। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा) माल पहाड़िया की समाज व्यवस्था बहुत पुरानी, कबीले-आधारित और अभी भी काफी हद तक परम्परागत है। 1. कुल (Clan) गोतार/खिल्ली 12–14 प्रमुख गोतार हैं (जैसे हांसदा, मरांडी, सोरेन, किस्कू, टुडू आदि)। विवाह उसी गोतार में वर्जित है। 2. उप-कुल खूंट एक गोतार के अंदर कई खूंट होते हैं। ये भाई-बन्धु समूह हैं। 3. गाँव पहाड़ी/मांझी थाना एक गाँव में 15–60 घर। प्रत्येक गाँव का अपना अलग पहाड़ी इलाका। 4. गाँव का मुखिया मांझी वंशानुगत या चुना हुआ। गाँव का धार्मिक-सामाजिक नेता। 5. धर्मगुरु/पुजारी नायकी देवता को चढ़ावा चढ़ाता है, बलि देता है, गाँव के त्योहार करवाता है। 6. युवा संगठन दलागोड़ी / सेंगेल युवक-युवतियों का समूह। नाच-गाना, सामाजिक कार्य, विवाह में सहायता। अब भी बहुत सक्रिय। 7. पारम्परिक पंचायत पंच (साम-दाम) पाँच-सात बुजुर्ग। झगड़ा, जुर्माना, बहिष्कार का फैसला करते हैं। अभी भी पुलिस-कोर्ट से पहले यही काम करता है। प्रमुख सामाजिक विशेषताएँ विवाह प्रणाली-गोतार के बाहर विवाह अनिवार्य (Exogamy) मुख्य रूप: दान-दहेज विहीन विवाह (सगाई → चावल-हल्दी → घर लाना) घर-जमाई प्रथा (घर में दामाद रखना बहुत आम)- बल-विवाह (हरप्पा) अब बहुत कम, पहले प्रचलित था विधवा-विवाह और तलाक पूरी तरह स्वीकार्य और आसान परिवार संरचना मुख्य रूप से संयुक्त परिवार (लेकिन घर अलग-अलग हो सकते हैं) महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी – खेती, जंगल, घर सब में बराबर हिस्सा उत्तराधिकार पुत्र और पुत्री दोनों को समान अधिकार (लेकिन पुत्री विवाह के बाद कम दावा करती है) जमीन-जंगल का हिस्सा सबको मिलता है सामाजिक नियंत्रण सबसे बड़ा दंड: गाँव बहिष्कार (हुक्का-पानी बन्द) जुर्माना: मुर्गा, शराब, चावल या नकद लैंगिक समानता लड़कियाँ-लड़के दोनों दलागोड़ी में नाचते-गाते हैं, रात में एक साथ घूमते हैं → प्रेम-विवाह आम औरतें सरपंच, मनरेगा मेट, आँगनवाड़ी सेविका भी बन रही हैं माल पहाड़िया का समाज अभी भी कबीला-आधारित, मांझी-नायकी प्रधान, गोतार-निषेध विवाह वाला, अपेक्षाकृत लैंगिक समानतावादी और परम्परागत पंचायती ढांचे पर टिका हुआ है, जिसमें आधुनिकता बहुत धीरे-धीरे प्रवेश कर रही है। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य बंदना त्योहार। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा) जीवे उर्किया पूर्वज पूजा। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन) 1% साक्षरता, कुपोषण। माल पहाड़िया को पेंशन, छात्रवृत्ति, आवास, भोजन डिलीवरी और आजीविका योजनाओं से लाभ मिलता है, लेकिन पूर्ण कार्यान्वयन के लिए स्थानीय जागरूकता और निगरानी जरूरी है। सौरिया पहाड़िया जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास द्रविड़ियन, कुरुख से जुड़े। सोन घाटी से राजमहल। 1975 PTG। 2011 में 44,129।सौरिया पहाड़िया (Sauria Paharia), जिन्हें मलेर पहाड़िया (Maler Paharia) भी कहा जाता है, झारखंड की एक प्राचीन आदिम जनजाति (PVTG) है। यह जनजाति मुख्य रूप से राजमहल पहाड़ियों (Rajmahal Hills) के दुर्गम क्षेत्रों में निवास करती है, जहाँ वे प्राचीन काल से बसे हुए हैं। इनकी उत्पत्ति और इतिहास प्रागैतिहासिक प्रवास, द्रविड़ियन जड़ों और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। नीचे विस्तृत जानकारी दी गई है: उत्पत्ति (Origin) प्राचीन जड़ें: सौरिया पहाड़िया को प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉइड (Proto-Australoid) प्रजाति का प्रतिनिधित्व करने वाला समुदाय माना जाता है। इनकी उत्पत्ति द्रविड़ियन भाषा परिवार से जुड़ी हुई है, और इन्हें माल्टो (Malto) भाषा बोलने वाले माल्टो लोगों की एक उप-शाखा के रूप में देखा जाता है। प्रवास की परंपरा: कुड़ुख (Kurukh) परंपराओं के अनुसार, यह जनजाति मूल रूप से सोन घाटी (Son Valley) से विस्थापित हुई थी। जब वे अपने मूल स्थान से भागे, तो मुख्य समूह पलामू की ओर गया, जबकि एक छोटा समूह गंगा घाटी के नीचे बहाव का अनुसरण करते हुए राजमहल पहाड़ियों में बस गया। यह प्रवास नर्मदा नदी को पार करते हुए विंध्य पर्वत श्रृंखला से होकर हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, ये संताल परगना (Santhal Pargana) के आदि निवासी हैं, जो मुंडा जनजातियों से पहले इस क्षेत्र में बसे थे। नाम की व्युत्पत्ति: "सौरिया" शब्द सूर्य देवता (धर्मेर गोसाईं) से जुड़ा हो सकता है, जबकि "पहाड़िया" पहाड़ी जीवनशैली को दर्शाता है। प्राचीन यूनानी यात्री मेगस्थनीज (Megasthenes) ने इन्हें मल्लर (Maller) नाम से संदर्भित किया था, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार (302 ई.पू.) में इनके निवास का प्रमाण है। इतिहास (History) प्राचीन और मध्यकालीन काल: सौरिया पहाड़िया ने हमेशा अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। मुगल काल में अकबर के सेनापति मान सिंह और अफगान सरदार शेरशाह सूरी ने इन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन पहाड़ी भूगोल के कारण असफल रहे। मराठों ने भी इन्हें अधीन न कर सका। ये झूम खेती (Shifting Cultivation) और वन उत्पादों पर निर्भर थे, जो उनकी आर्थिक स्वावलंबन को दर्शाता है। ब्रिटिश काल और विद्रोह: अंग्रेजों के आने से पहले ये क्षेत्रीय रूप से स्वायत्त थे। 18वीं शताब्दी में 1778 में छोटानागपुर के पहाड़िया सरदारों का विद्रोह इनके नेतृत्व में हुआ। ब्रिटिशों ने वन संसाधनों का शोषण शुरू किया, जिससे संघर्ष बढ़ा। Damin-i-koh (1832-33) क्षेत्र का निर्माण संथालों और पहाड़ियाओं के बीच शत्रुता को नियंत्रित करने के लिए किया गया, लेकिन पहाड़ियाओं ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। 19वीं शताब्दी में संताल हूल (1855) के दौरान भी ये शामिल थे। आधुनिक काल: स्वतंत्र भारत में इन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिला, और 2006 में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में चिन्हित किया गया। c8bb55 2011 की जनगणना में इनकी आबादी 46,222 थी (2001 में 61,121 से कमी), जो विलुप्ति के खतरे को दर्शाती है। आज ये गरीबी, कुपोषण और मानव तस्करी का शिकार हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखे हुए हैं। संक्षेप में एक वाक्य: सौरिया पहाड़िया की उत्पत्ति सोन घाटी के द्रविड़ियन प्रवास से जुड़ी है, और इनका इतिहास राजमहल पहाड़ियों में मुगलों, मराठों व ब्रिटिशों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है, जो आज PVTG के रूप में संरक्षण की मांग करता है। निवास क्षेत्र एवं जिले- साहिबगंज, पाकुड़, दुमका। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो)- मलर भाषा, ओरांव से निकट। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि)- राजमहल पहाड़ियां। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज)- झूम खेती (झुम)। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा)- देमानो पुजारी। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य- बंदना, नृत्य। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा)-गोसाईन आत्माएं। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन)- वन हानि, गरीबी। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ- PVTG योजनाएं। सवर (सबर/सावर) जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास- प्राचीन शिकारी, 1871 क्रिमिनल ट्राइब एक्ट। 1975 PTG। 2011 में 5,587। निवास क्षेत्र एवं जिले- रांची, गुमला, खूंटी, लोहरदगा। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो)- सावरा भाषा। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि)- दक्षिणी जंगल। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज)- शिकार, वन उपज। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा) - अलगथलग गांव। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य- लोक त्योहार। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा)- एनीमिज्म। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन)- सामाजिक कलंक, नक्सल प्रभाव। सोरिया (सबर) जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास-सबर का उप- समूह, प्राचीन। 1975 PTG। आबादी ~1,000। निवास क्षेत्र एवं जिले- पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो)- सोरिया भाषा। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि)- जंगल क्षेत्र। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज)- संग्रहण। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा)- छोटे समूह। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य- स्थानीय त्योहार। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा)- प्रकृति पूजा। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन)- विलुप्ति खतरा। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ- संरक्षण योजनाएं। परहैया (बैगा परहैया) जनजाति उत्पत्ति एवं इतिहास - बैगा उप-समूह, 2007 में PVTG। 2011 में 24,145। निवास क्षेत्र एवं जिले - पलामू, गढ़वा, लातेहार। भाषा (और लिपि, अगर कोई हो) - स्थानीय बोलियां। भौगोलिक विशेषता (जंगल, पहाड़, गुफा आदि) - पठारी जंगल। आजीविका का मुख्य साधन (शिकार, संग्रहण, झूम खेती, लघु वन उपज) - झूम, संग्रहण। सामाजिक संरचना (गोटियार, कुल, विवाह प्रथा) - कुल प्रथा। प्रमुख त्योहार एवं नृत्य - स्थानीय। धार्मिक विश्वास (प्रकृति पूजा, सरना, पूर्वज पूजा) - पूर्वज पूजा। वर्तमान चुनौतियाँ (जनसंख्या में कमी, शिक्षा, स्वास्थ्य, विस्थापन) - निम्न विकास। सरकारी योजनाएँ एवं लाभ-PVTG अभिकरण। झारखंड की PVTG की सामान्य विशेषताएँ झारखंड की सभी 9 आदिम जनजातियाँ (PVTG) निम्नलिखित पाँच मूलभूत विशेषताओं के कारण केंद्र सरकार द्वारा “विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह” घोषित की गई हैं। ये विशेषताएँ इन समुदायों को अन्य अनुसूचित जनजातियों से अलग करती हैं: बहुत कम एवं घटती जनसंख्याअधिकांश PVTG की जनसंख्या 50,000 से कम है। बिरजिया, सवर और सोरिया जैसी जनजातियाँ तो विलुप्ति के कगार पर हैं। 2011-2025 के बीच कई समुदायों में प्रजनन दर 1.5 से भी कम दर्ज की गई है। प्राक-कृषि तकनीक (Pre-agricultural technology level)ये समुदाय आज भी शिकार, संग्रहण, झूम खेती (shifting cultivation) और लघु वन उपज पर निर्भर हैं। हल चलाना या उन्नत कृषि औज़ारों का प्रयोग इनमें बहुत कम या न के बराबर है। स्थायी निवास की कमी या अर्ध-घुमंतू जीवनबिरहोर, सवर और सोरिया अभी भी “टांडा” (अस्थायी बस्ती) बनाकर रहते हैं। बिरहोर को तो “उथलू बिरहोर” (घुमंतू) और “जंगी बिरहोर” (स्थायी) में बाँटा गया है। पक्के मकान और स्थायी बसावट इनमें न्यूनतम है। अत्यंत निम्न साक्षरता दर (कई में 10% से कम)2011 की जनगणना के अनुसार:• मल पहाड़िया – 28.4%• बिरहोर – 18.7%• असुर – 32.6%शेष PVTG में साक्षरता 5–15% के बीच है। महिला साक्षरता तो कई जगह 2–5% से भी कम है। प्रकृति पर पूर्ण निर्भरता एवं अलगावजंगल, पहाड़ और नदियाँ इनकी आजीविका, धर्म और संस्कृति का आधार हैं। मुख्यधारा के बाजार, सड़क और स्वास्थ्य-शिक्षा सुविधाओं से ये आज भी दूर हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने के कारण विकास योजनाएँ पहुँचने में बाधा आती है। इन पाँच विशेषताओं के कारण ही केंद्र सरकार ने 1975-76 में दुलो समिति की सिफारिश पर इन 9 समुदायों को पहले PTG और फिर 2006 से Particularly Vulnerable Tribal Groups (PVTG) का दर्जा दिया, ताकि इनके अस्तित्व और संस्कृति को विशेष संरक्षण मिल सके। केंद्र एवं झारखंड सरकार की प्रमुख योजनाएँ (2025 तक) झारखंड की 9 आदिम जनजातियों (PVTG) के संरक्षण एवं विकास के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा कई विशेष योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। 2025 तक इन योजनाओं में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिसमें आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका एवं वन अधिकारों पर फोकस है। नीचे प्रमुख योजनाओं का विवरण दिया गया है: PVTG के लिए विशेष केंद्रीय सहायता योजना (SCA to PVTG) विवरण: यह केंद्र प्रायोजित योजना आदिम जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (SCSTRTI) के माध्यम से संचालित होती है। इसमें आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आजीविका पर फोकस है। 2025 तक, योजना के तहत संरक्षण-कम-विकास (CCD) योजनाएँ राज्यवार तैयार की जाती हैं। अपडेट: बजट आवंटन ₹24,000 करोड़ (PM PVTG Development Mission के अंतर्गत), जिसमें 75 PVTG को कवर किया गया। झारखंड में SCA से ₹50 करोड़+ आवंटित, जिससे 1,000+ परिवारों को लाभ। प्रगति: 80% बस्तियों में बुनियादी सुविधाएँ पहुँचीं। झारखंड में PVTG विकास अभिकरण (9 जनजातियों के लिए अलग-अलग) विवरण: प्रत्येक PVTG के लिए अलग विकास अभिकरण स्थापित, जो स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर योजनाएँ लागू करता है। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा एवं आजीविका पर जोर। अपडेट: 9 अभिकरण सक्रिय, जिन्होंने 'डाकिया योजना' के माध्यम से दवाएँ, पोषण एवं आवश्यक वस्तुएँ घर-घर पहुँचाईं। NITI Aayog के 'Super 60' मिशन के तहत 1,276 'डिड़ी का दुकान' शुरू, महिलाओं को स्वरोजगार। प्रगति: 386 गाँवों में पहली बार दुकानें। आवास: बिरसा मुंडा आवास योजना (PVTG को प्राथमिकता) विवरण: PVTG बस्तियों में पक्के मकान निर्माण के लिए राज्य योजना, जिसमें केंद्र की PMAY-G से एकीकरण। अपडेट: 4.9 लाख घरों का लक्ष्य (PM JANMAN के तहत), झारखंड में 50,000+ PVTG परिवार लाभान्वित। Aawas+ ऐप से सर्वे पूरा, सत्यापन 90%। प्रगति: 70% निर्माण कार्य समाप्त, सौर ऊर्जा एकीकरण। शिक्षा: एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, प्री-मैट्रिक/पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति विवरण: EMRS में कक्षा 6-12 तक मुफ्त शिक्षा; e-Kalyan पोर्टल से छात्रवृत्ति। PVTG छात्रों को 5% आरक्षण। अपडेट: झारखंड में 90 EMRS स्वीकृत (51 कार्यरत), ₹23,915 लाख फंड जारी। छात्रवृत्ति: 2025-26 के लिए आवेदन दिसंबर-मई, 15 लाख+ लाभार्थी। प्रगति: ड्रॉपआउट दर 5 गुना कम, TGT गेस्ट टीचर भर्ती शुरू। स्वास्थ्य: PVTG के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट विवरण: दूरस्थ PVTG बस्तियों में स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए वाहन-आधारित इकाइयाँ। अपडेट: गुमला में 6 MMU संचालित (Dumri, Chainpur, Bishunpur), सिकल सेल स्क्रीनिंग 100%। PM Janman के तहत 5 वैन शुरू, OPD, लैब एवं दवाएँ उपलब्ध। प्रगति: 10 ब्लॉकों में मासिक दौरा, कुपोषण दर 20% घटी।3537 वन अधिकार पत्र (FRA 2006) की स्थिति विवरण: वनवासी समुदायों को व्यक्तिगत एवं सामुदायिक वन अधिकार प्रदान करने वाला अधिनियम। PVTG को हैबिटेट अधिकार। अपडेट: राष्ट्रीय स्तर पर 51.23 लाख दावे प्राप्त, 25.11 लाख शीर्षक वितरित (2.32 करोड़ एकड़ भूमि)। झारखंड में 80% FRC गठित, 15 लाख+ लाभार्थी। प्रगति: 2023 अभियान से 60,000 पट्टे जारी, लेकिन 40% दावे लंबित। निष्कर्ष: इन योजनाओं से PVTG की साक्षरता, स्वास्थ्य एवं आजीविका में सुधार हुआ है, लेकिन कार्यान्वयन में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। 2025 तक 100% संतृप्ति लक्ष्य। स्रोत: जनजातीय कल्याण मंत्रालय एवं झारखंड सरकार रिपोर्ट। वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियाँ झारखंड की PVTG समुदायों की वर्तमान स्थिति में कुछ सुधार के संकेत दिख रहे हैं, लेकिन जनसंख्या वृद्धि, शिक्षा-स्वास्थ्य, नक्सल प्रभाव, जलवायु परिवर्तन एवं विकास की चुनौतियाँ बनी हुई हैं। 2024-25 में केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं से लाभ पहुँचा है, फिर भी कई क्षेत्रों में कार्यान्वयन की कमी है। नीचे प्रमुख पहलुओं का विवरण दिया गया है: जनसंख्या में कमी के कारण (बिरजिया, सोरिया, परहैया सबसे ज्यादा खतरे में) 2024-25 के सर्वे के अनुसार, PVTG की कुल जनसंख्या स्थिर है लेकिन कई समुदायों में कमी जारी है। बिरजिया (~7,000), सोरिया (~1,000) एवं परहैया (~25,000) सबसे संकटग्रस्त हैं, जो कुल PVTG आबादी का <5% हैं।10 मुख्य कारण: कम प्रजनन दर (1.5 से नीचे) एवं उच्च शिशु मृत्यु दर (NCDs एवं कुपोषण से)। आर्थिक दबाव से प्रवास एवं अंतर्जातीय विवाह, जो सांस्कृतिक पहचान को कमजोर कर रहा है। वन संसाधनों की कमी एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपस्थिति से वृद्धावस्था मृत्यु बढ़ी। शिक्षा एवं स्वास्थ्य की स्थिति शिक्षा: साक्षरता दर औसतन 20-30% है (मल पहाड़िया में 28%, बिरहोर में 18%)।27 आवासीय स्कूलों में शिक्षक कमी एवं दूरी से ड्रॉपआउट उच्च। हालांकि, EMRS में 5% आरक्षण से 15,000+ PVTG छात्र लाभान्वित। स्वास्थ्य: NCDs (मधुमेह, हृदय रोग) में वृद्धि, पारंपरिक रूप से कम लेकिन अब 30% मामलों में।3 कुपोषण दर 40%+, स्वास्थ्य-खोज व्यवहार कम। MMU से सुधार, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँच सीमित। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाली PVTG (बिरहोर, कोरवा) 2025 तक नक्सल प्रभावित जिले 9 रह गए (गुमला, लातेहार, चाईबासा प्रमुख), जहाँ बिरहोर एवं कोरवा निवास करते हैं।313234 चुनौतियाँ: सुरक्षा जोखिम से योजनाओं का कार्यान्वयन बाधित (NIA छापेमारी से डर) बिरहोर (घुमंतू) एवं कोरवा (शिकारी) के लिए सांस्कृतिक हस्तक्षेप की कमी, जो ह्रास का कारण।3336 मतदान एवं सेवाओं तक पहुँच में सुधार, लेकिन विकास धीमा। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव PVTG समुदाय जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर हैं, जहाँ अनियमित वर्षा एवं वन क्षरण से आजीविका प्रभावित।212327 प्रमुख प्रभाव: झूम खेती एवं वन उपज (शहद, जड़ी-बूटियाँ) में 20-30% कमी, खाद्य असुरक्षा बढ़ी। स्वास्थ्य: गर्मी से संबंधित रोग एवं कुपोषण में वृद्धि, विशेषकर बच्चों एवं बुजुर्गों में। आदिवासी ज्ञान (जैसे ट्यूबर संग्रहण) से अनुकूलन, लेकिन नीतिगत सहायता की कमी। 2025 में विस्थापन एवं संसाधन संघर्ष बढ़ने की आशंका। संरक्षण के लिए नए प्रयास (2024-25 में शुरू हुई योजनाएँ) 2024-25 में PVTG संरक्षण को गति मिली: प्रधानमंत्री PVTG विकास मिशन (PM JANMAN): 4.9 लाख घरों का लक्ष्य, झारखंड में 50,000+ परिवार लाभान्वित। राष्ट्रीय सिकल सेल उन्मूलन मिशन: PVTG में आनुवंशिक रोगों पर फोकस, 100% स्क्रीनिंग। पीएम जुगां (PM JUGA): 2 अक्टूबर 2024 शुरू, 63,000 गाँवों में 5 करोड़ आदिवासियों के लिए अंतिम मील डिलीवरी। राष्ट्रीय फेलोशिप योजना: 25 स्लॉट PVTG छात्रों के लिए आरक्षित। वन संरक्षण संशोधन अधिनियम 2023: सामुदायिक वन संसाधनों का संरक्षण, 2024-25 में लागू। फंड रिलीज: 2024-25 में SCA to PVTG के तहत अतिरिक्त ₹50 करोड़।012 ये प्रयास सतत निगरानी की मांग करते हैं। PVTG की स्थिति में सुधार संभव, लेकिन एकीकृत प्रयास आवश्यक। स्रोत: जनजातीय कल्याण मंत्रालय, NITI Aayog रिपोर्ट एवं राज्य सर्वे। निष्कर्ष झारखंड की 9 आदिम जनजातियाँ (PVTG) — असुर, बिरजिया, बिरहोर, कोरवा, मल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, सवर, सोरिया और परहैया — राज्य की सबसे प्राचीन एवं मूल सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनका प्रकृति-आधारित जीवन, मौखिक परंपराएँ, अनूठी भाषाएँ और पारंपरिक ज्ञान भारत की जैव-सांस्कृतिक विविधता का अनमोल हिस्सा हैं। इनकी घटती जनसंख्या, अत्यंत निम्न साक्षरता, स्वास्थ्य संकट और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इनके अस्तित्व को गंभीर खतरे में डाल रहा है। सोरिया, बिरजिया और बिरहोर जैसी जनजातियाँ तो विलुप्ति के कगार पर हैं। इसलिए इनके संरक्षण, सशक्तीकरण और सतत विकास की तत्काल एवं ठोस आवश्यकता है। प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान (PM-JANMAN), PVTG विकास मिशन और राज्य सरकार की योजनाएँ सकारात्मक दिशा में कदम हैं, लेकिन इन्हें तेजी से जमीनी स्तर पर लागू करना होगा। अंत में — इन 9 जनजातियों का संरक्षण केवल सरकारी दायित्व नहीं, बल्कि हम सबकी साझी जिम्मेदारी है। संदर्भ झारखंड राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थान (SCSTRTI), रांची – PVTG हेबिटेशन सर्वे रिपोर्ट 2024 Ministry of Tribal Affairs, Government of India – Annual Report 2023-24 & SCA to PVTG Progress Report 2024-25 Pradhan Mantri PVTG Development Mission (PM-JANMAN) – Official Dashboard & Progress Reports 2024-25 झारखंड सरकार, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग – आधिकारिक वेबसाइट (welfare.jharkhand.gov.in) Census of India 2011 – Primary Census Abstract: Scheduled Tribes & Particularly Vulnerable Tribal Groups Data Tribal Research Institute, Ranchi – “Status of PVTGs in Jharkhand” (2023-24) झारखंड एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय एवं PVTG छात्रवृत्ति पोर्टल (ekalyan.jharkhand.gov.in) Forest Rights Act 2006 – State-wise Implementation Report, Ministry of Tribal Affairs, 2024 NITI Aayog – Aspirational Districts & PVTG Development Reports 2024-25 झारखंड राज्य PVTG विकास अभिकरण (9 जनजातियों के लिए अलग-अलग वार्षिक रिपोर्ट) नोट: इस पेज में दिए गए सभी आँकड़े एवं जानकारी उपरोक्त आधिकारिक स्रोतों पर आधारित हैं। नवीनतम अपडेट के लिए संबंधित सरकारी वेबसाइट्स अवश्य देखें।