परिचय काफी लंबे समय से हिल खड़िया जनजाति की स्थिति अस्पष्ट है। बिहार में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों की सूची में हिल खड़िया को अन्य खड़िया जनजातियों से अलग शामिल नहीं किया गया था। लेकिन 1961 में अनुसूचित क्षेत्र और अनुसूचित जनजाति आयोग (ढेबर आयोग) तथा 1969 में जनजातीय विकास कार्यक्रम (शैलू ओ टीम) पर एक अध्ययन दल की रिपोर्ट और 1980 में जनजातीय विकास के लिए कार्यरत एक दल की रिपोर्ट के आधार पर हिल खड़िया जनजाति को बिहार कि 9 आदिम जनजातियों में से एक के रूप में पहचाना गया है। विवाद यह है कि हिल खड़िया को क्या अन्य खड़िया जनजातियों का एक अंग या सावर जनजाति का एक अंग या फिर इसे एक अलग जनजाति के रूप में माना जाये। हिल खड़िया जनजाति की शाखाएँ पहले मुद्दे पर कुछ मानव विज्ञान शास्त्रियों विशेष कर इ. टी. डाल्टन हिल खड़िया जनजाति की तीन शाखाओं में से एक मानते हैं दो अन्य शाखाएँ हैं दूध खड़िया और धलकी खड़िया। वास्तव में 1941 की जनगणना में तीनों खड़िया जनजातियों की जनगणना अलग – अलग नहीं की गई थी जो 1981 में बढ़कर 1,41,771 हो गई। अत: बिहार की 30 जनजातियों में संख्या के आधार पर खड़िया का स्थान सातवां आता है। दुसरे मुद्दे पर एस. सी. राय. कहते हैं धालभूम की पहाड़ियों में रहने वाले कुछ वृद्ध हिल खड़िया अपने पूरे व पुरूष और स्त्री का नाम क्रमश: सब्बर बुरका और सब्बर बुरकी बताते हैं। शायद यह इस बात के संकेत हैं कि हिल खड़िया महान सावर जाती की ही एक शाखा है। टी. सी. दास भी महसूस करते हैं कि हिल खड़िया की पहचान कठिन है क्योंकि इनमें से अधिकतर अपना कुलनाम या उपनाम सावर रखते हैं। सावर बिहार की दूसरी जनजाति है। सरकार द्वारा विभिन्न भागों में बसाये गये हिल खड़िया अपने को सावर बताते हैं तथा कहते हैं सावर कोई दूसरा नहीं बल्कि खड़िया ही है। हिल खड़िया द्वारा अपना कुलनाम सावर बताने से जो भ्रम पैदा हुआ उसका अवर जनगणना आंकड़े पर भी नजर आता है। अनेक सरकारी आंकड़ों में हिल खड़िया और सावर को एक ही मान लिया गया है। तीसरे मुद्दे या मत के अनुसार यह माना जाता है कि सावर और खड़िया दो अलग अलग अनुसूचित जनजातियाँ हैं यह हो सकता है कि इनकी उत्पति का संबंध काफी निकट का हो। यहाँ यह उल्लेख उचित होगा कि अलग – अलग पहचान की गई अनेक जनजातियों की उत्पति का जब पता लगाया गया तो देखा गया कि उनकी उत्पति का स्रोत एक ही था। अनुसूचित जनजातियों की मान्यता प्राप्त सूची तथा शोध के विभिन्न दस्तावेज में सावर और खड़िया जनजातियों को एक दम अलग माना गया है। यह भी पाया गया है कि हिल खड़िया जनजाति की कुछ अपनी विशिष्टताएँ हैं जो उन्हें अन्य खड़िया जनजाति अलग करती हैं। हिल खड़िया अपने गांवों की व्यवस्था में अन्य खड़िया जनजातियों से अलग है। इनके यहाँ नाच तथा एक दुसरे से मिलने जुलने के स्थान अखरा नहीं होता है। इनके घर बनाने का तरीका, वस्त्र, आभूषण, पेशा, गोत्र तथा अन्य अनके सामाजिक रीति – रिवाज दूसरी खड़िया जाति से भिन्न है। दुसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जहाँ दूध खड़िया और धलकी खड़िया के रीति रिवाज तथा परम्पराओं में अनेक समानताएं हैं वही हिल खड़िया के रीति – रिवाज और परम्परायें उनसे अलग है। विद्वान एच.एच. रेस्ले भी हिल खड़िया को खड़िया जनजाति के छह उप जातियों में शामिल नहीं करते हैं। यह हो सकता है की सावर कुलनाम प्रयोग में लाने की वजह से भूलवश इनलोगों ने जनगणना में अपने को सावर जनजाति के साथ जोड़ दिया या फिर संभावना इस बात की भी हो सकती है चूंकि हिल खड़िया को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं किया गया था अत: अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली सुविधाएँ पाने के ख्याल से इन्होंने अपने आपको सावर जनजाति के साथ जोड़ दिया हो। कुछ भी हो ये दोनों ही बातें उन्हें सावर जनजाति का नहीं बना सकती हैं। उपरोक्त बातों को देखते हुए हमलोगों की मान्यता है कि आदिम जातियों के वर्गीकरण के उद्देश्य से हिल खड़िया को अलग जनजाति माना जाना चाहिए। हाँ यह अलग मामला है कि उसे अलग से सूचीबद्ध किया जाए या खड़िया या फिर सावरों के साथ। आबादी और निवास स्थल 1981 की जनगणना में हिल खड़िया को अलग नहीं गिना गया। अत: 1918 में इनकी जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं हो सकेगा। हिल खड़िया की आबादी के संबंध में कोई अधिकारिक संख्या नहीं प्राप्त हो सका। लेकिन 1961 और 1971 की जनगणना में इनकी आबादी क्रमशः 9,423 और 10,241 दर्ज की गई। संभवतः कुछ हिल खड़िया सावर और कुछ खड़िया के रूप में गिने जाते गए। 1984 में तत्कालीन संयुक्त जनजाति कल्याण आयुक्त कुमारी ए. वी. डीन द्वारा जब हिल खड़िया के लिए एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की गई तो उस दौरान हिल खड़िया की आबादी 9,370 पाई गई। हालाँकि 1983 में बेच मार्क सर्वे में इनकी आबादी 12,134 दर्ज की गई। हिल खड़िया परम्परागत रूप से पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूम सब डिवीजन में आने वाली पहाड़ियों और उसके आस - पास निवास करते आ रहे है इनमें कुछ घाटशिला और उसके पास के प्रखंडों में बस गये हैं। व्यवसाय या पेशा हिल खड़िया बिहार की सबसे पुरानी आदिम जनजाति है। बदलते परिवेश और वातावरण की वजह से इन लोगों ने स्थान बदल - बदल कर कृषि करने का अपना पुराना तरीका छोड़ दिया। यह जनजाति बहुत हद तक जंगल के उत्पाद जैसे – मधु (शहद), खाने के योग्य कंदमूल तथा जड़ीबूटियों पर निर्भर है। इसके अलावा ये लोग पास – पड़ोस की दूसरी जातियों के यहाँ कृषि मजदूर के रूप में भी काम करते हैं। जंगली जड़ीबूटियों आदि को निकालने के लिए ये लकड़ी की बनी एक औजार खन्ता कहा जाता है इस्तेमाल करते हैं। इनका अन्य पेशा है मछली मारना तथ शिकार करना। शिकार तथा मछली पकड़ने के लिए ये लोग क्रमशः तीर धनुष और घोंघी का प्रयोग करते हैं। अन्य खड़िया की तरह हिल खड़िया कृषक मजदूर के रूप में असम या अन्य राज्य में जाना पसंद नहीं करता है। वह कृषक मजदूर में आस पास के इलाकों में भी काम करता है। सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन हिल खड़िया का आवास स्थान अपेक्षाकृत छोटा होता है। अन्य खड़िया के विपरीत इनका अखरा की तरह सामूहिक नृत्य या मिलन स्थल, श्मशान नहीं होता है। इनका मकान एक कमरा का होता है जिसमें कोई खिड़की नहीं होती है। इसी कमरे को रसोई और सोने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इसी कमरा से सटा गाय तथा सूअर का स्थान बना होता है। एक इसाई खड़िया स्त्री ब्लाउज पहनती है लेकिन आम तौर पर ये एक वस्त्र से शरीर को ढके रहती है। दयनीय आर्थिक दशा के कारण घास के मनकों की माला, पीतल तथा कांच की चूड़ियों आदि को छोड़कर ये शायद ही दूसरा गहना पहन पाती है। किसी त्योहार या महत्वपूर्ण अवसरों पर हिल खड़िया स्त्री तथा युवतियां अपनी बालों को साल तथा अन्य फूलों से सजाती हैं। हिल खड़िया नाच गान के शौक़ीन होती है। अलग – अलग अवसरों पर ये अलग – अलग तरह के नृत्य करते हैं। इनके नृत्यों में किनबार हरियस जधूरा आदि शामिल हैं। नृत्य के साथ ये बांसूरी तथा नगाड़ा भी बजाते हैं। हिल खड़िया की पारिवारिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक होती है तथा पुत्र को पिता की ओर से सम्पति का अधिकार मिलता है। परिवार में पिता का स्थान सर्वोच्च होता है तथा सभी मामलों में उसकी सलाह ले जाती है बावजूद इसके परिवार चलाने में तथा उसके मामलों में स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनमें विधवा विवाह मान्य हैं। पुत्रियों को सम्पति में कोई हिस्सा नहीं दिया जाता है। गर्भवती की स्त्री की देखभाल तथा प्रसव करने वाली महिला को दाई बुरकी कहते हैं। हिल खड़िया अपनी मजबूत गोत्र व्यवस्था है। इनके गोत्र के नाम इस प्रकार है – गुगलू (स्वार्थी) भूइया (मच्छली), जारू (चूहा), बदया (कंद), टीसी (चिड़िया) और हेम्ब्रोम। शादी विवाह में गोत्र नाम महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है क्योंकि एक ही गोत्र वालों में विवाह वर्जित है। हिल खड़िया स्त्रियों का प्रसव दाई बुरकी कराती है तथा एक वर्ष या उससे भी अधिक समय तक बच्चे का नामकरण नहीं किया जाता है। बच्चे के नाम आप तौर पर उनके मृत पुरखों के नाम पर ही किया जाता है। युवावस्था को प्राप्त कर रही है विवाह के योग्य समझी जाती है। वर और कन्या के सिर को आपस में सटाकर तथा उसे धागे से लपेट दिया जाता है। यह क्रिया विवाह संपन्न होने तथा वर कन्या के एक होने की प्रतीक होती है। कन्या दहेज़ से बचने के लिए हिल खड़िया अदला बदली विवाह को अधिक प्राथमिकता देते हैं। इसमें के दुसरे की बहन की विवाह करती है। खड़िया जनजाति मृतक का सिर उत्तर दिशा में रखकर दफनाती है लेकिन एस.सी.राय ने अपनी अध्ययन के दौरान देखा की कोढ़, चेचक, हैजा तथा सर्प दंश से मरे लोगों का हिल खड़िया दाह संस्कार करते हैं। लेकिन इनमें इन दोनों यह भी देखा गया कि कोढ़, चेचक, हैजा या सर्प दंश से मृत लोगों के शव ये जंगलों में फेंक देते है ताकि जंगली जानवर इन्हें अपना आहार बना लें। हिल खड़िया गर्भवती स्त्री की मृत्यु होने पर उसे दफना देते हैं लेकिन इससे पूर्व मृत स्त्री का पति उसके पेट को चीर कर मृत बच्चे को बाहर निकाल देता है तथा दोनों के शव को एक ही स्थान पर एक साथ दफना दिए जाते हैं। मृत्यु के पश्चात् परिवार दस दिनों तक अपवित्रता मानता है। अपवित्रता समाप्त कराने के लिए हिल खड़िया दिहूरी (पुजारी) को बुलाता है जबकि दूध खड़िया और धेलकी खड़िया इस काम के लिए पाहन बुलाते हैं। ये लोग विभिन्न प्रकार को देवी देवताओं और आत्माओं की पूजा करते हैं। हिल खड़िया काफी लंबे समय तक एकाकी जीवन बिताते रहे लेकिन 50 के दशक के अंत से अन्य जनजातियों तथा मिशनरियों के संपर्क में आने लगे। इनके संपर्क में आने से हिल खड़िया का आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन भी प्रभावित हुआ। राज्य सरकार द्वारा इनके बत्तीस परिवारों को घाटशिला में पुनर्वास कराया गया। 1955 में इनके लिए गाँधी स्मारक खड़िया आवासीय स्कूल की स्थापना की गई। सरकार ने बलराम दास उर्फ़ ठक्कर बाबा नामक एक उत्साही कार्यकर्ता को इनके कल्याण तथा हितों की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी लेकिन ठक्कर बाबा की मृत्यु के बाद यह जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों पर आ गई जो अपनी जिम्मेदारी के प्रति उतने समर्पित नहीं रहे जितना कि उन्हें होना चाहिए था। स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार