परिचय अनेकता में एकता ही भारतीय संस्कृति है और उस अनेकता के मूल में निश्चित रूप से भारत के विभिन्न प्रदेशों में स्थित जनजातियाँ हैं। भारत की जनजातियाँ विभिन्न क्षेत्रों में रहती हूए अपनी संस्कृति के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक विशिष्ट संस्कृति का रूप में देने में योगदान करती हैं। देश की संस्कृतियों पर एक दूसरे की छाप पड़ी। चूंकि जनजातियाँ अनेक थी स्वाभाविक है कि उनकी संस्कृति में भी विवधता थी। अत: इनकी वैविध्यमय संस्कृति ने जिस भारतीय संस्कृति को उभरने में योगदान किया, वह भी विविधता को धारण करने वाली हुई। भाषा के क्षेत्र में भी यही स्थिति हुई और आर्यों की भाषा से द्रविड़ों तथा अनके भाषा – भाषियों की भाषाएँ प्रभावित हुई तथा दूसरी और इनकी भाषाओँ से आर्यों की भाषाएँ भी पर्याप्त मात्रा में प्रभावित हुई। जनजाति की परिभाषा उपर्युक्त सन्दर्भ में एक प्रश्न उठता है कि आखिर जनजाति कहेंगे किसे। इस जनजाति शब्द को परिभाषित करने में मानवशास्त्रियों में काफी मतभेद पाया जाता है। मानवशास्त्रियों ने जनजातियों को परिभाषित करने में मुख्य आधार – तत्व माना है संस्कृति को, परंतु कभी – कभी ऐसा देखने में मिलता है कि किसी एक ही क्षेत्र में यद्यपि विविध जनजातियाँ रहती हैं, फिर भी उनकी संस्कृति में एकरूपता दृष्टिगत होती है। अत: जनजातियों को परिभाषित करने में केवल संस्कृति को ही आधार – तत्व मानना एकांगीपन कहा जायेगा। इसके लिए हमें संस्कृति के अतिरिक्त भौगोलिक, भाषिक तथा राजनितिक अवस्थाओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा। विभिन्न विद्वानों ने जनजाति शब्द के पर्याय के रूप में आदिम जाति, वन्य – जाति, आदिवासी, वनवासी, असाक्षर, निरक्षर, प्रागैतिहासिक, असभ्य जाति आदि नाम दिया है। परंतु इसमें से अधिकांश एक ही अर्थ को घोषित करने वाले हैं। परंतु इन्हें असभ्य, निरक्षर या असाक्षर आदि कहना आज पूर्णतया अनुचित और अव्यवहारिक है। यहाँ हमने जनजाति कहना हि उपयुक्त माना है। भारतीय मानवशास्त्री प्रोफेसर धीरेन्द्र नाथ मजुमदार ने जनजाति की व्याख्या करते हुए कहा है कि जनजाति परिवारों या परिवार समूहों के समुदाय का नाम है। इन परिवारों या परिवार – समूह का एक सामान्य नाम होता है ये एक ही भू – भाग में निवास करते हैं, एक ही भाषा बोलते हैं विवाह, उद्योग – धंधों में के ही प्रकार की बातों को निबिद्ध मानते हैं। एक- दूसरे के साथ व्यवहार के संबंध में भी उन्होंने अपने पुराने अनुभव के आधार पर कुछ निश्चित नियम बना लिए होते हैं। उक्त परिभाषाओं को देखने से स्पष्ट हो जाता है। कि विद्वानों में जनजाति की परिभाषा को लेकर काफी मतभेद है। फिर भी व्यक्तियों के ऐसे समूह को जो एक निश्चित भू – भाग के हों तथा एक निश्चित भाषा बोलते हों और अपने समूह में ही विवाह करते हों को जनजाति कहा जा सकता है। जब तक विभिन्न देशों में सम्प्रभु सरकार की स्थापना नहीं हुई थी तब तक इन जातियों का अपना राजनैतिक संगठन रहा होगा। परंतु आज जनजाति की परिभाषा करने में यह तत्व उपेक्षणीय है। जाति और जनजाति को पृथक कर पाना भी एक कठिन प्रश्न है, परन्तु जहाँ तक भारत का संबंध है। हम जाति उसे कह सकते हैं जिसमें वर्ण व्यवस्था नहीं हो। भारत की जनजातियों का वर्गीकरण भौगोलिक वर्गीकरण भारत की जनजातियों में भौगोलिक विभाजन करते हुए विभिन्न विद्वानों ने अपने - अपने दृष्टीकोण से भिन्न–भिन्न अभिमत प्रकट किए हैं। कुछेक विद्वान इन्हें दो क्षेत्रों में बांटते हैं तो कुछ तीन क्षेत्रों में और कुछ विद्वानों ने इन्हें चार भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया है। परंतु भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भारत की जनजातियों को पांच भागों में विभाजित करना उचित होगा। 1. पूर्वोत्तर क्षेत्र 2. मध्य क्षेत्र 3. दक्षिण क्षेत्र 4. पश्चिम क्षेत्र 5. द्वीप – समूह क्षेत्र 1. पूर्वोत्तर क्षेत्र - पूर्वोत्तर क्षेत्र में कश्मीर, शिमला, लेह, हिमाचल प्रदेश, बंगाल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, लूसाई की पहाड़ियां, मिसमी असाम, नेचा तथा सिक्किम का इलाका आता है। इस क्षेत्र में लिम्बू लेपचा, आका, दपला, अवस्मीरी मिश्मी, रामा, कचारी, गोरो, खासी, नागा, कुकी, चकमा, लूसाई, गुरड आदि प्रमुख जनजातियाँ होती है। 2. मध्य – क्षेत्र – क्षेत्र में बंगाल मध्य क्षेत्र में बंगाल, बिहार, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा का इलाका जा जाता है। सभी क्षेत्रों में जनजातियों की संख्या और उनके महत्व की दृष्टि से सबसे बड़ा है। इसके अंतर्गत, मध्य प्रदेश में गोंड, उड़ीसा के कांध और खड़िया, गंजाम के सावरा, गदब और बाँदा, बस्तर के मूरिया और मरिया, बिहार के उराँव, मुंडा, संथाल, हो विरहोर, सौरिया पहाड़िया, खड़िया, आदि जनजातियाँ हैं। 3. दक्षिण क्षेत्र – इस क्षेत्र में दक्षिणी आंध्र प्रदेश, कर्णाटक, तमिलनाडु, केरल आदि का हिस्सा आता है। इस क्षेत्र में निवास करने वाली प्रमुख जनजातियाँ है हैदराबाद में चेचू, निलगिरी के टोडा, वायनाड के परियां, ट्रावनकोर – कोचीन के कादर, कणीदर तथा कुरावन आदि। 4. पश्चिम क्षेत्र – उपर्युक्त तीन क्षेत्रों के अतिरिक्त पश्चिम क्षेत्र में भी कुछ जनजातियाँ है। उसमें राजस्थान के भील प्रमुख हैं। कुछ जनजातियाँ ऐसी हैं जो खाना बदोस का जीवन व्यतीत करती हैं। 5. द्वीप समूह क्षेत्र – अंडमान निकोबार आदि द्वीपों में रहने वाली जनजातियों को इसी क्षेत्रों में रखा जाएगा। 1955 के पहले तक इन्हें जनजाति के अंतर्गत नहीं रखा जाता था परंतु उसके बाद पिछड़ी जातियों के आयोग की अनुशंसा पर इन्हें भी जनजाति माल लिया गया। वर्तमान अंडमान निकोवार में अंडमानी, जखा, सोयपेन एवं आगे जनजाति आदि प्रमुख हैं। भाषागत वर्गीकरण भारत में हजारों बोली जाती हैं, जिन्हें चार भाषा परिवारों के अंतर्गत रखा जाता है। ये भाषा परिवार हैं – १. इंडो योरोपियन २. द्रविड़ ३. ओस्ट्रिक (आनेय) ४. तिब्बती – चीनी इंडो योरोपियन परिवार की भाषाएँ आर्य मूल की बोलियाँ बोलती हैं। परंतु आज अनके जनजातियां भी आपस में संपर्क भाषा के रूप में इन भाषाओँ का व्यवहार करने लगी हैं। इंडो योरोपियन के बाद जिस भाषा परिवार की मुख्य भाषाओँ के बोलने वालों की संख्या आती है, वह है द्रविड़ परिवार। इस परिवार की मूका भाषाएँ हैं। तामिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम। बिहार के उरांव लोगों की कुडूख भाषा इसी परिवार की एक मुख्य भाषा हैं। मध्य प्रदेश के गोंड, सावरा परजा, कोया, पनियान, चेंचू, कदार, मालसर तथा मलरेयान आदि भाषाएँ भी इसी परिवार की है। मुंडा, कोल, हो संथाल, खरिया, कोरवा, भूमिज, कुरकी, खासी आदि जनजातियों की भाषाएँ आस्ट्रिक (आग्नेय) परिवार की हैं। यद्यपि विभिन्न भाषाओँ का पारिवारिक वर्गीकरण किया जाता है। परंतु बहुत निश्चिततापूर्वक यह नहीं कहा जा सकता है कि किस जनजाति की भाषा पूर्णतया किस परिवार में आती है। झारखण्ड/ बिहार की जनजातियाँ बिहार राज्य के दक्षिणी हिस्से में ही अधिकांश जनजातियों का निवास स्थान है। छोटानागपुर प्लेटो के रांची, गुमला, लोहरदगा, हजारीबाग, धनबाद, सिहंभूम, पलामू, संथालपरगना, गिरिडीह आदि में जनजातियों की संख्या पर्याप्त मात्रा में है। इनके अतिरिक्त सासाराम, भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया और चंपारण में भी जनजातियों का निवास है। क्रम सं जनजाति जनसंख्या कुल जनजातीय जनसंख्या का प्रतिशत शिक्षा उसी जनजातीय समुदाय वर्ग में शिक्षा 1 असुर 7783 0.13 0.08 0.37 2 बैगा 3553 0.16 0.02 4.22 3 बंजारा 412 Neg. 0.01 12.38 4 बथ्यूदी 1595 0.03 0.02 16.93 5 बेदिया 60445 1.04 0.66 10.82 6 बिंझिया 10009 0.17 0.15 14.52 7 बिरहोर 4377 0.07 0.03 5.74 8 बिरजिया 4057 0.07 0.04 10.50 9 चेरो 52210 0.90 0.92 17.30 10 चिकबड़ाइक 40339 0.69 0.82 20.17 11 गोंड 96574 1.66 1.96 20.00 12 गोराइत 5206 0.09 0.09 16.61 13 हो 536524 9.23 9.62 17.71 14 कुरमाली 38652 0.66 0.52 13.30 15 खड़िया 141771 2.44 3.57 24.86 16 खरवार 222758 3.83 3.89 17.22 17 खोंड 1263 0.02 0.02 15.99 18 किसान 23420 0.40 0.32 13.41 19 कोरा 33951 0.58 0.32 9.28 20 कोरबा 21940 0.38 0.14 6.14 21 लोहरा 169090 2.91 2.18 12.71 22 महली 91868 1.59 1.18 12.74 23 माल पहाड़िया 79322 1.37 0.61 7.38 24 मुंडा 845887 14.56 18.98 22.16 25 उराँव 1048064 18.05 24.71 23.28 26 परहइया 24012 0.41 0.37 15.30 27 संथाल 2060732 35.47 26.19 12.55 28 सौरिया पहाड़िया 39269 0.68 0.28 6.87 29 सावर 3014 0.05 0.03 9.55 30 भूमिज 136110 2.35 2.26 16.45 31 अन्य जनजातियाँ 6660 0.11 0.03 3.94 जनजातियों की कुल जनसंख्या 5810867 100.00 100.00 16.99 जनजातियों में उराँव जनजाति का प्रतिशत 18.05 बिहार की उराँव जनजाति की भाषा द्रविड़ परिवार की कुडूख है और वे भेडिरेरेयन (द्रविड़) प्रजाति है। परंतु प्राय: अन्य सभी जनजातियाँ आस्ट्रिक भाषा परिवार की भाषाएँ बोलने वाली हैं तथा वे प्रोटोआस्ट्रिलायक प्रजाति के अंतर्गत आती है। सांस्कृतिक दृष्टि से बिहार की जनजातियों में काफी अंतर पाया जाता है। इन में उराँव, मुंडा तथा संथाल जनजातियों को छोड़कर अन्य प्राय: सभी जन - जातियाँ अभी भी पिछड़ी हुई हैं। बिरहोर तथा पहाड़ी खड़िया जनजाति के लोग अभी जंगली पशुओं तथा फलों के माध्यम से ही अपना जीवन यापन करते हैं। असुर, कोरवा, सौरिया पहाड़िया आदि झूम की खेती करते हैं। ये लोग बंजारों की तरह कभी – कभी अपना स्थान बदलते हैं। परंतु मुंडा, उराँव, संथाल और हो आदि स्थायी तौर पर रहते हुए कृषि एवं पशुपालन में लगे हुए हैं। इन लोगों के अच्छे मकान तथा गांव हैं इनके समाज में अब हर प्रकार के पेशा वाले लोग प्रर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं। बिहार के भिन्न – भिन्न जनजातियों के अलग – अलग गांव है तथा अनेक गांव ऐसे भी है जहाँ अनेक जनजातियाँ एक साथ मिलकर रहते हैं और उनके साथ आर्य जाति के लोग भी विद्यमान हैं। विभिन्न जनजातियों के गांव भिन्न – भिन्न प्रकार के हैं। कुछ जनजातियाँ ऐसी है जो किसी अन्य जनजाति के साथ अपने मिश्रित नहीं कर पाती है। अत: पूर्णतया अलग रहने में ही विश्वास रखते हैं। ऐसी जनजातियों में विरहोर, विरजिया, माल – पहाड़िया आदि प्रमुख हैं। सच पूछा जाए तो ये जातियाँ अभी भी बंजारा जातियां ही है और अपनी आवश्यकता के अनुरूप उन्हें जहाँ जैसे सुविधा प्राप्त हो जाती है वहां अपना निवास स्थान बना लेती है। इनके गांव झोपड़ियों के बने होते हैं और उनमें केवल एक ही कोठरी होती है। यद्यपि आज सरकार ने इन्हें सुविधा संपन्न करने के लिए बहुत ही कल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं। फिर भी वे अपने को अन्य जनजातियों के साथ मिश्रित नहीं कर पाते हैं। बिहार के छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में अनेक ऐसे निवास स्थान बनाए गये हैं जिनमें इनके लिए हर प्रकार की सुविधा प्रदान की गई है फिर भी ये वहाँ नहीं रहते हैं। दूसरी ओर उराँव, मुंडा, संथाल, हो आदि ऐसी जनजातियाँ हैं ओ स्थायी रूप से निवास करती हैं और आज ये राष्ट्र की मुख्य धारा के साथ जुड़ कर किसी भी अन्य जाति से कम नहीं है। इन जनजातियों के लोग प्रशासन, अध्यापन, राजनीति, इंजीनियरी, डॉक्टरी आदि सभी प्रमुख क्षेत्रों में अपने को योग्य सिद्ध कर रहे हैं। परंतु इनमें आर्य जातियों के ऊँच – नीच वाला दुर्गूण भी आने लगा है। इन उन्नत जनजातियों का रहन – सहन भी अब काफी उन्नत हो गया है। गाँवों में भी अनेक उन्नत जनजातीय लोगों के माकन ईंट आदि के बने हुए हैं। परंतु अन्य लोगों के माकन मिट्टी के बने होने पर भी काफी विस्तृत एवं हवादार है। इनका गाँव दूर से देख कर ही के पहचाना जा सकता है। इनके माकन के अगल – बगल कुछ क्यारी ऐसाहोता हैं जिसमें अपने लिए सब्जी इत्यादि लगाते है और मवेशियों के लिए भी अलग स्थान होता है। हो लोगों के मकान के कमरा में पूर्वजों के देवी स्थान होते हैं जिन्हें ये लोगो अपनी भाषा में आदिंग कहते हैं। सभी उन्नत जनजातियों के गाँव में अखाड़ा होता हैं। जहाँ लोग संध्या समय जा कर नाचते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक गाँव की अपनी अपनी सरना, जाहीरा और महादेव आदि के स्थान होते हैं। जहाँ अपने पूर्वजों एवं देवी देवताओं की पूजा, आराधना की जाती है। प्रत्येक गाँव के अलग - अलग शासन होते हैं, जिनमें मृत ब्यक्तियों को गाड़ा जाता है। बिहार की जनजतियों में उरांव बिहार की जनजातियों में उराँव जनजाति एक प्रमुख जनजाति है। बिहार में 30 से भी अधिक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनमें तीन - चार ही आज उन्नत अवस्था में हैं, उनमें संभवता: उराँव सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। बिहार की जनजातियों में संख्या के दृष्टिकोण से यद्यपि ये संथालों के बाद द्वितीय स्थान पर हैं परंतु जीवन स्तर तथा जागरूकता के दृष्टि से ये सर्वोपरि है। 1981 जनगणना अनुसार बिहार की जनजातियों की संख्या 5810867 है, उनमें उराँव जनजाति की संख्या 1048064 है। उराँव जनजाति के लोग मुख्य रूप से छोटानागपुर के राँची, गुमला, लोहरदगा और सिंहभूम जिला में निवास करते हैं। इनके अतिरिक्त पूर्णिया, सासाराम, पलामु, हजारीबाग आदि जिलों में भी छिटपुट रूप में उराँव लोग निवास करते हैं। यद्यपि उरांवों का मुख्य निवास स्थान बिहार है परंतु मध्य प्रदेश तथा उड़ीसा के अतिरिक्त भारत के कुछ अन्य प्रान्तों में भी ये विद्यमान हैं। उराँव जनजाति के लोग जहाँ कहीं भी रहते है उनकी पहचान अलग से हो जाती है और वे लोग कुडूख भाषा का ही प्रयोग करते हैं। परंतु अब विभिन्न प्रजातियों तथा जातियों के साथ ये लोग मनुष्यों की तरह ही लगते थे परंतु जंगलों में निवास करते थे इस कारण इन्हें आर्यों ने बानर कहा होगा। ये लोग दक्षिण भारत के पर्वतीय अंचल में रहा करते थे और जंगली जानवरों को मारकर इससे अपना जीवन - यापन करते थे। विभिन्न स्थानों पर निवास करने के कारण इनकी बोलचाल की भाषा में परिवर्तन हो गया है और ये लोग वहां के निवासियों की अन्य भाषा को अपना भाषा के साथ सम्मिलित करके उसी का व्यवहार करते हैं। उदहारण के लिए पांचपरगना के अंतर्गत बुंडू, तमाड़, सिल्ली, ईचागढ़ और अड़की इन पांच परगनों में निवास करने वाले उराँव भी पंचपरगनिया भाषा का प्रयोग करते हैं। इस भाषा पर कुडूख भाषा के अतिरिक्त मुंडारी, बंगला, उड़ीसा, और नागपुरिया का पूर्ण प्रभाव हैं परंतु राँची के पश्चिम भाग में निवास करने वाले तथा गुमला एवं लोहरदगा के उराँव कुडूख भाषा का प्रयोग करते हैं। कुछ उराँव के गाँवों में रहने वाले अन्य जाति के लोग भी संपर्क के कारण आपस में कुडूख भाषा ही बोलते हैं। एसे गांवों में रहने वाले अनेक मुसलमान अपने परिवार से भी कुडूख भाषा में ही बोलते है उस प्रकार जे गांवों में रहने वाले अनेक जाति के लोग यद्यपि अपने परिवार में कुडूख नहीं बोलते है परंतु उरांवों के साथ वार्तालाप करने के समय कुडूख के प्रयोग करते हैं। गांवों में घूमने वाले अनेक व्यवसायी उरांवों के साथ कुडूख भाषा में ही बोलते हैं। सामान्यत: उराँव बहुल हाटों (बाजारों) में कुडूख भाषा का ही प्रयोग होता है। अनेक टाना भगत एसे हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी कुडूख भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा का प्रयोग नहीं किया है। उराँव द्रविड़ प्रजाति (नस्ल) के हैं इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं होनी चाहिए। डॉ. गुहा ने अन्य जनजातियों की तरह उरांवों को भी प्रोटो – आस्ट्रेलायड प्रजाति के अंतर्गत स्वीकार किया है परंतु यह उचित नहीं जान पड़ता है। डॉ. मजुमदार तथा शरत चंद्र राय इन्हें द्रविड़ प्रजाति का ही मानते हैं। उराँव जनजाति का बिहार आदि निवास स्थान नहीं माना जाता है। अनके विद्वानों ने ऐस सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ये लोग दक्षिण भारत में रहा करते थे और जब रामचन्द्र ने रावण पर आक्रमण किया तो ये लोग बानर सेना के रूप में रामचन्द्र के सहयोगी बने। आज अधिकतर आलोचक यह स्वीकार करने लगे हैं कि बानर सेना पूँछ वाली कोई प्रजाति नहीं थी अपितु वे भी नर (मनुष्य) के तरह हि थे और उन्हें बानर अथवा नर कहा गया। ये लोग दक्षिण भारत के पर्वतीय अंचल में रहा करते थे और जंगली जानवरों को मारकर उससे अपना जीवन – यापन करते थे। इनके पास पत्थर और लकड़ी के हथियार होते थे, जिससे ये लोग शिकार खेलते थे और लड़ाई लड़ते थे बाद में ये लोग यात्रा करते हुए सोन नदी की तराई में आये और वहां स्थायी रूप में बसकर खेती आदि करने लगे। कुछ दिनों के बाद राजनितिक उथल - पुथल होने के कारण ये लोग रोहतास इत्यादि स्थानों से हटने लगे और कोयल नदी के किनारे किनारे ये लोग बढ़ते हुए छोटानागपुर में आकार बस गये। छोटानागपुर में उन दिनों मुंडा जनजातियों का निवास था परंतु अपने ज्ञान रुपी समृद्धि से इन्होंने मुंडाओं को भी खेती आदि करने का तरीका सिखाया। उराँव जनजाति सामाजिक राजनितिक दृष्टि से समृद्ध थी इस कारण मुंडा लोगों को वहां से हटने पर मजबूर किया और परिणाम स्वरुप मुंडा लोग छोटानागपुर में भी एक और सिमटते चले गए। उराँव जनजाति ने छोटे – छोटे गाँव बसाये और खेतों आदि में लग गए। आगे - आगे चलकर इन्होंने सामाजिक तथा राजनितिक संस्था के रूप में पाड़ह की स्थापना की। ये पाड़ह संस्थाएं एक राज्य की तरह अपने – अपने क्षेत्र में प्रशासन संबंधी कार्य करने लगी। प्राचीनकाल में भी उराँव जनजाति बिहार की अन्य जनजातियों की अपेक्षा हर दृष्टि से उन्नत थी और वर्तमान काल में भी यह जनजाति बिहार की अन्य जनजातियों से उन्नत बनी हुई है। सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से तो यह उन्नत है ही आर्थिक, शैक्षिणक तथा राजनैतिक दृष्टि से भी अन्य जनजातीय की तुलना में श्रेष्ठ है। उराँव राजनीति में, प्रशासन में, यांत्रिकी में, चिकित्सा, विज्ञान में तथा शिक्षा के क्षेत्र में उच्च पदों पर विद्यमान है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में जनजातियाँ प्रागैतिहासिक काल से ही निवास करती है और यह कह पाना आज असंभव से है कि कौन सी जनजाति भारत की आदि जनजाति है और कौन बाद में आई है। पूरे भारत में न्यूनाधिक रूप से जनजातियाँ निवास करती हैं जिस में बिहार का छोटानागपुर प्रमुख है। इसमें यद्यपि 30 से भी अधिक जनजातियाँ निवास करती है परंतु उनमें आज कुछ ही हर दृष्टि से उन्नत हो पाई है। इन जनजातियों में नि:संदेह उराँव जनजाति सर्वोपरि है। स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार