परिचय पूरे देश में बिहार तीसरा राज्य है जो आदिवासी बाहुल है। सबसे अधिक संख्या मध्य प्रदेश में और दूसरा राज्य उड़ीसा है। जहाँ जनजातिगण की संख्या अधिक है। परंतु पूरे देश में इनकी जनजातियाँ बंटी हुई है और यही कारण है कि पूरे भारतवर्ष की जनसंख्या में चार करोड़ से अधिक जनजाति हैं। आदिवासी का महत्व इस बात में भी है कि वे संख्या में कितने है और कहाँ बसे हैं। भारत सरकार की अनुसूचित सूचियों के जातियों के अंदर 351 प्रमुख जनजाति, 247 उपसमूह और प्रभाग हैं। ये जनजातियाँ भारतीय जनसंख्या के 8 प्रतिशत के बराबर है और देश के 20 प्रतिशत इलाके पर उनका नियंत्रण है। इनका क्षेत्र ज्यादातर पहाड़ी है। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सीमा क्षेत्रों में भी जानजातिगण रहते हैं। इस प्रकार वे हमारे प्रहरी हैं। आदिवासी लोग हालाँकि उनमें से कुछ आदिम तरीके से आखेट, मछली और पशुओं का शिकार करके उपेक्षाकृत आदिम तरीके से अपना गुजर – बसर करते हैं, लेकिन वे उद्योगों, बागानों और खेती में भी काफी संख्या में काम करते हैं। वे किसान दस्तकार और शिल्पी है जो सुन्दर और उपयोगी तथा शानदार चीजें बना रहे है। उनका एक वर्ग देश भर में बुर्जूआ मध्यवर्ग भी है। ये लोग अपने परंपरागत शिल्प के अलावे अन्य व्यवसाय भी करते हैं। व्यवासायिक खिलाड़ी और सैनिकों के रूप में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया है। अत: भारत वर्ष के जनजातीय क्षेत्र को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया है जिसका ब्यौरा नीचे की तालिका में प्रस्तुत हैं:- क्षेत्रफल तालिका – 1 क्र. सं क्षेत्र जनसंख्या एवं प्रतिशत 1 उत्तर तथा पूर्वी क्षेत्र – इस क्षेत्र में असम, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल का दार्जलिंग जिला आता है। 45.96 लाख (12.09) 2 मध्यवर्ती क्षेत्र – पश्चिम बंगाल (दार्जलिंग जिला छोड़ कर) बिहार, मध्यप्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र, नागपुर और ओसमाना बाद डिवीजन उड़ीसा तथा आंध्रप्रदेश के विशाखापत्तनम और श्रीकाकुलम जिला इस क्षेत्र में आते हैं। 221.13 लाख (58.33) 3 दक्षिण क्षेत्र – आंध्र प्रदेश (विशाखापत्तनम और श्रीकाकुलम जिला छोड़कर) केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, और लक्ष्यद्वीप इस क्षेत्र में आते हैं। 19.86(5.23) 4 पश्चिम क्षेत्र – पश्चिम महाराष्ट्र (बाम्बे और पूना डिवीजन) गुजरात,राजस्थान, गोवा दमन और दियु, दादरा और नगर हवेली अन्य अंडमान और निकोबार द्वीप समूह 0.18 लाख (0.05) 1971 की जनगणना के अनुसार इस तालिका में बिहार राज्य मध्यवर्ती क्षेत्र में पड़ता है जहां तीस (30) प्रकार की जनजातियाँ पाई जाती है, जिसके सूची नीचे तालिका में है। बिहार की जनजातियों क्र. सं. जनजाति का नाम जनसंख्या 1 असुर 7,783 2 बैगा 3,551 3 वनजारा 411 4 वथूड़ी 1,595 5 वेदिय 60,446 6 भूमिज 1,36,109 7 विजिया 10,009 8 विरहोर 4,377 9 विरजिया 4,057 10 चेरो 52,210 11 चिक – बड़ाईक 40,339 12 गोड़ाईत 5,206 13 हो 5,36,523 14 करमाली 38,651 15 खरीया 1,41,771 16 खरवार 2,22,758 17 खोंड 1,264 18 किसान 23,420 19 कोरा 33,952 20 कोरवा 21,940 21 लोहरा 1,69,089 22 महली 91,868 23 मालपहाड़िया 79,322 24 मुंडा 8,45,887 25 उराँव 10,54,066 26 परहिया 24,012 27 संथाल 20,60,730 28 सौरिया पहाड़िया 39,269 29 सवर 3,014 30 अन्य 662 जनजाति कौन है मानवशास्त्रियों ने जनजातियों के बारे में अनेक विचार व्यक्त किये हैं जिनमें मुख्य रूप से रिवर्स, रैड्क्लिफ ब्राउन, इवान्स प्रिचर्ड, डॉ. डी. एन. मजूमदार, डा. एल. पी. विद्यार्थी, डॉ. सच्चीदानंद, डॉ. नरमदेश्वर प्रसाद, प्रो. एस. सी. दूबे, डॉ. अमीर हसन इत्यादि के नाम उल्लेखनीय है। सभी मानवशास्त्रियों ने अपने – अपने दृष्टिकोण एवं विषय के आधार पर परिभाषा लिखे हैं। परंतु लेखक (मनोवैज्ञानिक हैं) ने जनजातियों को सर्वप्रथम मानवजाति की संज्ञा दी है। जनजातिगण सर्वप्रथम एक मनुष्य है और बाद में कुछ और है। संभवता: परिभाषा के मतभेद को ध्यान में रखते हुए भारत के संविधान में अनुसूचित जातियों की परिभाषा इस प्रकार दी गई है। ये ऐसी जनजातियाँ या ऐसे जन समाज अथवा ऐसी जनजातियों का जनसमाजों के अंग पल हैं जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत इस संविधान की दृष्टि से अनुसूचित आदिम जातियों की संज्ञा दी गई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 की धारा (1) के द्वारा प्राप्त अधिकारों के अनुसार राष्ट्रपति ने 412 जनजातियों को अनुसूचित जनजातियाँ घोषित की 7.76 प्रतिशत है। बिहार के जनजाति के प्रकार बिहार के तीन जनजातियों के कल्याण हेतु डॉ. एल. पी. विद्यार्थी प्रख्यात मानवशास्त्री ने पांच वर्गों में विभाजित किया है। डॉ. विद्यार्थी ने विभाजन का मापदंड इनके संस्कृति आर्थिक व्यवासायिक बिन्दुओं को ध्यान में रखकर किया था। ताकि जनसाधारण, सामाजिक कार्य कर्त्तागण और विशेषकर सरकारी प्राधिकारियों के कल्याणकारी योजनाओं को क्रियान्वित करने में मदद मिले। डॉ. विद्यार्थी ने सचमुच अपना जीवन जनजातियों के लिए समर्पित कर दिया था और बिहार ही में नहीं बल्कि उनकी गरिमा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की थी। उनके द्वारा बिहार में अवस्थित जनजातियों का विभाजन निम्नलिखित तालिका में दर्शाया गया है। साथ में उनकी जनसंख्या सामाजिक, आर्थिक स्तर पर भी संक्षिप्त टिप्पणी दी गई है। डॉ. विद्यार्थी के अनुसार बिहार के जनजातियों का वर्गीकरण 1. अवस्थित एवं कृषि प्रधान जनजातिगण जैसे – मुंडा, उराँव, संथाल, हो आदि। इस वर्ग के जनजातिगण अपेक्षाकृत विकसित हैं और मुख्य व्यवसाय खेती करना है। 2. घूमंत जनजातिगण जिनका कहीं एक जगह ठिकाना नहीं होता और जीविका का साधन वनों में जाकर कंद – मूल, पशु – पक्षी को मार कर खाना है जैसे विरहोर विरजिया आदि। इस वर्ग के लोग अत्यधिक पिछड़े हैं और विकास के क्रम भी अभी तक पीछे हैं। इस वर्ग के जनजातिगण मधुमक्खी के छत्ते से शुद्ध मधु निकाल कर व्यवसाय भी करते हैं जो उनके जीविका का साधन होता है सातवीं पंचवर्षीय योजना जो अभी - अभी समाप्त हुआ है ने इस जनजाति वर्ग के विकास को प्राथमिकता दी थी। गैर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित अविकसित या विकासशील कहना अधिक उचित होता है। जिस – जिस दिन ये भी अवस्थित हो जायेंगे और कृषि आदि का काम करने लगेंगे जिस वर्तमान सरकार ने बल दिया है। निश्चित ही रंग लाएगा और प्रिमिटिव दायरे से बहार आ जायेंगे। 3. झुम तरीके से पहाड़ों पर खेती करने वाले जनजातिगण जैसे सौरिया पहाड़िया माल पहाड़िया आदि। सरकार की कल्याण नीति ने सफल क्रियान्वयन पश्चात भी पहाड़ों पर से उतर कर यह नीचे समतल भूमि पर आने को तैयार नहीं होते। 4. व्यवसाय गुणों से भरपुर जनजातिगण जैसे असुर, लोहरा आदि। ये लोग कामागात श्रेणी के होते है जो कच्चा लोहा बनाते हैं, लोहे के औजार आदि बनाते है और कपड़ा बुनते हैं। यदि मूल गुण के अनुसार कच्चे माल और आधुनिक तकनीकी का प्रशिक्षण आदि उपलब्ध हो तो व्यवसाय क्षेत्र में इनकी दशा बहूत विकसित हो सकती है। 5. रांची और आस पास के औद्योगिकिकरण की क्रांति ने श्रम श्रेणी को जन्म दिया है। व्यवस्थापित जनजातिगण श्रम वर्ग में शामिल हो गये हैं परंतु असंगठित होने के कारण महाजनों, सेठ – साहूकार और चतुर वर्ग के चंगुल के शिकार बन जाते हैं और ऋण ग्रस्तता के चलते बाद में बंधुआ मजदूर बन जाते हैं। उपरोक्त वर्गीकरण से कल्याणकारी योजना सही ढंग से क्रियान्वित होने पर निश्चित ही जनजातियों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति सुधार जायेगा। खेद इस बात है कि एक ही नीति से जनजातियों का कल्याण करने का प्रयास किया जाता है जो कदापि सफल नहीं होगा। लेखक की यह अनुशंसा है कि प्रत्येक वर्ग की विशेषता को ध्यान में रखकर मानवीय ढंग से विकास कार्यक्रम चलाया जाय तभी उपलब्धी सकरात्मक होगी। बिहार का भू – भाग बिहार के इतिहास के कई बिन्दु अभी तक विद्वानों की पहुँच से अलग है। इतिहासकारों का शोध प्रयास अपने ढंग से अलग है। विधि अलग है और विषयवस्तु भी अलग हो जाता है। परंतु बिहार का दक्षिणी भू – भाग छोटानागपुर का इतिहास जनजाति लेकर विशेष महत्व रखता है। जिसके कारण अनेक सामाजिक शास्त्रियों ने बिहार की इस क्षेत्र की विशेषताओं के अतिरिक्त इस भू – भाग के वासियों के अध्ययन पर केन्द्रित रहे हैं। बिहार इस भू – भाग का उतार – चढ़ाव विशेष कर जनजातियों के परिपेक्ष्य में महत्व रहता है। इतिहासकारों ने तो झारखण्ड आदिवासी जनता कहकर एक राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन विषय बनाया। जनजातिगण अथवा सदान जन समूह को भी केंद्र मानकर बिहार के इस भू – भाग का एक अलग इतिहास है। इस बिन्दुओं पर विचार और शोध की आश्यकता है। छोटानागपुर का इतिहास मानो एक ज्ञान की खान है जो मानवशास्त्रियों के लिए हर दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। बिहार का यह भाग पठारीय भाग है और इसके अंतर्गत अब पांच के वजाय आठ जिले आते हैं। रांची, लोहरदगा, गुमला, पूर्वी सिंगभूम। इसके अतिरिक्त दक्षिणी छोटानागपुर के अंतर्गत हजारीबाग, पलामू और धनबाद के अन्य जिले हैं। जिनमें पलामू, धनबाद, हजारीबाग का विभाजन होकर गिरिडीह, बोकारो, गढ़वा जिले बन गये है। पूरे छोटानागपुर की सीमा लगभग 22 डिग्री उत्तरी अक्षांश से 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 93 डिग्री पूर्वी देशांतर से 87 डिग्री पूर्वी देशांतर तक विस्तृत है। इसका क्षेत्रफल 25, 293 वर्ग मील है। प्राकृतिक रचना छोटानागपुर के मध्य में संसार के सबसे प्राचीन चट्टान ग्रेनाईट इत्यादि उपलब्ध है। भूगर्भशास्री इसे प्रो. कैम्ब्रिगन अथवा आकईन युग की चट्टान मानते है जो करीब वर्षों पुरानी हैं। फलत: यह कहना है की यह भाग प्राचीनकाल ही से वनवासी अथवा आदिवासी लोगों के आवास का गह्वाड़ा रहा है यह कहना उचित होगा कि संपूर्ण छोटानागपुर जंगल और पहाड़ों से भरा हुआ है और पठारी क्षेत्र कहलाता है और इसकी उंचाई समुद्र तल से 500 से 1000 फीट तक है। इससे सीढ़ी के उपर दूर – दूर तक समतल सा दिख पड़ने वाला रांची जिले का विस्तृत पठार, जिसके औसत ऊँचाई समुद्र तल से 2000 फीट है। यही कारण है की रांची बिहार का ग्रीष्म का राजधानी था और बिहार का राजधानी पटना का कार्यलय होता था। बिहार कुल क्षेत्रफल 1.74 लाख वर्ग किलोमीटर में जनजातियों की अच्छी खासी जनसंख्या है। बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। 674 लाख हेक्टेयर के भौगोलिक क्षेत्र में 115 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि है किन्तु अभी कुल 85 लाख हेक्टेयर में ही खेती होती है। इस कम खेती का मुख्य कारण बृहद एवं मध्यम सिंचाई की खास कमी है। अधिकतम सिंचाई क्षमता का अनुमान 92.50 लाख हेक्टेयर है। कुल सिंचाई क्षमता का सृजन 26.09 लाख हेक्टेयर (अर्थात कुल सिंचाई क्षमता का 28.3 प्रतिशत) और छोटानागपुर क्षेत्र के अधिकांश भाग पहाड़ और जंगली होने के कारण तो सिंचाई की कमी मुख्य है। परंतू जलवायु के विशेषता के कारण इस क्षेत्र में उत्तरी बिहार की अपेक्षा वर्षा पहले ही प्रारंभ हो जाने के कारण प्राकृतिक सिंचाई सुविधा हो जाती थी और यही कारण है कि इस भू – भाग में एक फलता फसल की विशेषता थी जैसे दोन और टांड दोनों प्रकार के जमीन में चावल की खेती अधिक होती है और चावल पैदावार भी बहुत होती है। परंतु अधिकांश क्षेत्र में मोटे चावल की उपलब्ध होते हैं। जब से बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयास एवं अनुसंधान से अन्य फसलों के होने का संभावना साकार किया है। छोटानागपुर क्षेत्र में भी क्रान्तिकारी उम्मीद बंध गई है फलस्वरूप शोराधान धान के अतिरिक्त उत्तरी बिहार जैसे मक्का, गेहूं आदि के खेती में विशेष रुचि रखने लगे हैं। अत: एक फसला से बहुफसला की ओर यह प्रगति सराहनीय है जिससे निश्चित रूप से इस क्षेत्र की वासियों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ रहा है। विदित हो रांची के आस पास जैसे चुटिया, छोटा एवं बड़ा घाघरा में हरी सब्जियां अब बराबर उपलब्ध रहती है। यह खेती भालको जैसे यांत्रिक सूत्रों के द्वारा संभव हुआ है। परंतु जनजातियों की अपेक्षा गैर जनजाति के लोग आर्थिक रूप से संपन्न उक्त सुविधा का लाभ उठाते हैं जनजातिगण परंपरागत ढंग से अर्थात जमीन में कूएँ खोद कर सिंचाई का काम करते हैं। यह कथा अनुमानित नहीं है बल्कि लेखक के द्वारा पूर्व में शोध के अंतर्गत प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है। रांची के आसपास उपलब्ध झरना भी सिंचाई के लिए अच्छा साधन है। यही कारण है की राज्य सरकार ने जलधारा योजना चालू की है। बिहार में गैर जनजातियों की भांति जनजाति समुदाय में भी भिन्न – भिन्न प्रकार की जातियां हैं। गैर जनजातियों के विपरीत जनजातिगण के विभिन्न जातियों में छुआ – छूत धार्मिक कार्यक्रम और अन्य विशेषताओं में भिन्नता के बावजूद समानता है। जनजातियों में ऊँच – नीच की प्रथा नहीं है केवल बिहार में ही नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष के जिन राज्यों में जनजातियों पाई जाती हैं उनमें लेखक के अनुसार निम्नांकित तीन विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। जनजातिगण और सामान्य विशेषता 1. स्वतंत्रता के प्रिय 2. हंसमुख रहना एवं 3. नशे का सेवन करना उल्लेखित तीन विशेषताओं में से उनके नशे के सेवन का अन्य जातियों ने आड़ लेकर उनके शोषण के लिए हरबा अपनाया है जबकि बिहार के जनजाति अपने परंपरागत हड़िया जो चावल और बशावर बनाने के लिए रानू जैसी पदार्थ का उपयोग करते हैं अत्यंत सामाजिक अवसरों पर उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं जो बहुत अधिक नशा नहीं रहता है। परंतु चतुर एवं स्वार्थी लोगों ने भोले – भोले, सीधे – साधे और साफ दिल आदिवासियों को भट्टी द्वारा निर्मित नशीले पदार्थ का सेवन का आदि बनाकर उनको हर प्रकार से शोषित किया है जैसे जमीन से बेदखली (भूमि की बिक्री) निम्नस्तरीय कार्य करवाया बंधुवा मजदूर बनाना और कृषि श्रमिकों को सरकार द्वारा निर्धारित मजदूरी से भी वंचित किया जाना है। जनजातियों का भूमि एवं जंगलात से जन्मजन्मान्तर का संबंध है और उक्त कारणों के चलते उनमें रोष का होना एक स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। अदिवासिगण कर्मठ, सहनशील एवं आत्मसम्मान रखते है वह समझते सब कुछ हैं प्रतिकूल उत्तेजनाओं के कारण स्वतंत्रता प्राप्त के 44 वर्षों के बाद भी उनकी भूल – मूल अथवा बुनियादी आवश्यकताओं की भी पूर्ती जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से अधिकांशत: वंचित रहना। अभी भी रांची के आसपास ही प्रतीत हुआ है। जनजातिगण में अंधविश्वास कहा जाता है। परन्तु क्या विकसित देश में भी यह फोबिया, प्रेजुडिस या अंधविश्वास नहीं हैं। भले विदेशों में ही काले – गोरे का भेज भाव, वंशानुक्रम वरियता एवं अंधविश्वास मिलते हैं भले ही अपेक्षाकृत कम हो, कारण अस्पष्ट है सामाजिक आर्थिक स्थिति शिक्षा इत्यादि, जनजाति कल्याण का सच्चा एवं उचित अध्याय का आरंभ पांचवीं वर्ष योजना से कहा जाता है। पंचम वर्षीय योजना (1974 – 79) ने उपयोजना का सिद्धांत निकाला और जनजातियों को विशेष रूप से लाभान्वित करने के लिए केंद्रीय आय का आवंटन अलग से प्राप्त होने लगा। उपयोजना एवं उपयोजना क्षेत्र में 50 प्रतिशत जनजाति होते हैं। प्रो. एस. सी. दूबे की अध्यक्षता में गठित समिति ने (1972) जनजातिय विकास के लिए पांच सूत्री कार्यक्रम निर्मित किए। इसके पूर्व भारतीय संविधान के धारा 342 एवं अनुच्छेद 46 एवं दो शिड्यूल (पांचवी और छठा) द्वारा अनके सुविधाओं का उल्लेख किया गया। इसके अनुकूल क्रियान्वयन हेतु भारत के लिए पहले प्रधान मंत्री स्वर्गीय पंडित नेहरू जी ने जनजातियों के विकास के लिए पंचशील को नीति बनाई थी जिसमें जनजातियों के विकास के लिए अस्पष्ट पांच बिन्दु रखे गए थे। पहला बिन्दु या नीति जनजातियों के विकास को उनकी अभिरूचि के अनुकूल उनके सहयोग से कल्याणकारी योजना को चलाने पर बल देता है और अंतिम नीति ये है कि जनजाति विकास को आंकड़ों से आंका जाए चूंकि आंकड़े चाहे जनगणना के क्यों न हो, दोषपूर्ण हो सकते हैं। लोहरा जनजाति की संख्या धार्मिक एवं आर्थिक स्थिति लोहरा जनजाति एक बड़ी जनजाति है जिसकी संख्या एक लाख से अधिक है। 1981 की जनगणना के अनुसार बिहार में कुल जनसंख्या 1,69,089 है, परंतु अन्य जनजातियों की तरह इनका भी केन्द्रीकरण रांची, सिंहभूम, पलामू, हजारीबाग और संथालपरगना के जिलों में मिलती हैं, छिट - पुट रूप से ही अन्य जिलों में मिलते हैं। लोहरा की पूरी जनसंख्या का 95.71 प्रतिशत उपरोक्त जिलों में मिलते हैं। निम्न तालिका में लोहरा जाति, उनकी जनसंख्या पुरूष और स्त्री के साथ देखी जा सकती है। तालिका क्र.सं. जिला का नाम पुरूष स्त्री योग 1 रांची 49,213 47,861 97,029 2 सिंहभूम 12,450 11,880 24,330 3 पलामू 5,378 5,289 10,667 4 हजारीबाग 1,158 1,078 2,236 5 संथालपरगना 14,238 13,356 27,596 कुल 82,437 79,419 5,61,856 (1981 जनगणना के अनुसार) लोहरा जनजाति के जीवन पर भी धर्म का बड़ा प्रभाव है। धर्म अस्पष्ट को व्यक्त करता है। अविश्वसनीय को महत्व देता है और मनुष्य में भाईचारा पैदा करता है। प्राय: देखा जाता है कि जनजातियों के बीच एक आदमी के दिल में दूसरे आदमी के प्रति भय समा जाता है। साथ ही प्रकृति में होने वाली अद्भूत चीजों को देखकर उनके मन में भी समा जाता है। धर्म का स्वरूप रीति – रिवाज में ही प्रकट होता है। भिन्न – भिन्न लोग धर्म की व्याख्या अपने – अपने ढंग से करते हैं। कोई अनेक देवी देवताओं की, कोई एक देवता की उपासना करता है, कोई आत्मा में विश्वास करता है, कोई प्रकृति वाद ही कहना ठीक होगा। जनजातियों के जीवन में धर्म के साथ ही जादू – टोने के भी बढ़ा महत्व है। यह धर्म से कुछ इस तरह मिला हुआ कि दोनों में अंतर करना कठिन है। जादू दो प्रकार का होता है, एक तो वह जिससे की दुसरे के जादू को काट दिया जाए और दूसरा जो किसी को हानि पंहुचाने के लिए किया जाए। इस तरह हम पाते हैं की अन्य जातियों की तरह लोहरा जाति भी देवी – देवीताओं, जादू – टोना और टेबू आदि में विश्वास रखते हैं। लेखक ने रांची स्थित लोहरा कोचा गाँव के क्षेत्रीय भ्रमण में लोहरा समुदाय के व्यक्तियों से बातचीत के क्रम में उनके धर्म विश्वास और रस्म रीति – रिवाज की समीक्षा किया। लोहरा कोचा में लोहरा जाति के 200 से अधिक परिवार रहते हैं, जिनमें 75 प्रतिशत शिक्षित मिले, ऐसा आंकड़ा रांची नगर में रहने के कारण है। इनके शादी के समय पाहन ही शादी कराते हैं और नाचगान में डमकच झूमर बजाते हैं। करमा, जीतिया और सरहुल त्यौहार के रूप में मनाते हैं। करमा में कर्म पेड़, जीतिया में पीपल वृक्ष और सरहुल में सखुआ में पत्ते और लाल मुर्गे की बलि देते हैं। पहले लोहरा लोग मुर्दा को अपने जमीन में गाड़ते थे परंतू अब मसना में गाड़ते हैं। यह मसना कांटा टोली त्रिल धोरा में जो नामकुम पूल के पास है। लोहरा जाति भी जनि शिकार करते हैं। रांची में लोहरा कहलाने के लिए मानते हैं। लोहरा जाति की अपनी खास भाषा नहीं है। टूटी – फूटी हिंदी तथा आस पास की आदम जातियों की भाषा बोलते हैं। उनका पेशा मुख्यतः लोहे के औजार और हथियार बनाना तथा मरम्मत करना, उनकी अपनी कोई बस्ती नहीं होती है वह उराँव मुंडा एवं गैर जनजाति के साथ मिलजुल कर रहते हैं और अपने कार्य कुशलता से मदद पहुँचाकर रोजी कमाते हैं। काठ का नाद बनाते हैं, इनकी महिलाऐं प्रसूति के समय दाई का काम भी करती है। यही कारण है कि उपेक्षाकृत अन्य जनजातियों से इनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति बहुत निम्न है और कल्याण के लिए अधिक पात्र हैं। लोहरा जनजाति और अन्य जनजातियों से समीपता उपरोक्त वर्णित तथ्य से स्पष्ट हो गया है कि लोहरा जनजाति की अपनी विशेषताएँ हैं। पेशा के संबंध में अन्य जनजातियों से अधिक कुशल है और व्यवसायिक धंधों में विशेष रूप रुचि रखते हैं। परन्तु एक बात और है जो इनको अन्य जनजातियों से अलग करती हैं। इनका न अपना गाँव है और न कोई पंचायत। इनके घर जहाँ – तहां मिलते हैं और विराह के बाद अपने माता – पिता से अलग हो जाते हैं और अपना घर के अंदर कई रसोई घर हो जाते हैं। इनका घर खर – बांस, छप्पर, घास आदि का बनता है, जो जंगल के बीच आसानी से उपलब्ध होता है। इनके घर में कोई खिड़की नहीं होती है। दिन के समय दरवाजे से रोशनी आती है। दरवाजे में लोहे के कब्जे लगे रहते हैं और जब बाहर जाते हैं तो ताला बंद कर जाते हैं। लड़का और लकड़ियाँ तीन वर्ष तक कोई कपड़ा नहीं पहनते हैं, उसके बाद कमर तक जो कपड़ा पहनते हैं, वह करिया कहलाता है। पुरूष लोग धोती – कुर्ता पहनते हैं। महिलाएं साड़ी का व्यवहार करती हैं। गाँव में ब्लाउज नहीं पहनती हैं, इनका कोई अखाड़ा नहीं होता है, लेकिन नाच – गान के लिए वे दुसरे अखाड़ा में जाते हैं। इनका गाँव मिश्रित होता है जिसमें मुंडा, उराँव और गैर जनजाति लोग रहते हैं लोहरागिरी इनका मुख्य व्यवसाय है और ये हसुवा, टांगी, तीर – धनुष बनाते हैं। ये सामग्री पड़ोस के लोग क्रय करते हैं अथवा बाजार हाट में जाकर बेचते हैं, प्रो. सच्चीदानंद के अनुसार हर खेत के लिए एक लोहरा को एक कत चार पैला दोन अगहन में तीन पैला गूंदली, अगस्त में और तीन पैला गोड़ा धान खेत में मिलता है। उनके अनुसार लोहरा जाति का खेत भी है, परंतु उनकी रुचि खेती में नहीं है। अपने मुख्य व्यवसाय के अतिरिक्त बचे समय में शिकार करते हैं। दुसरे जनजातियों एवं गैर जनजातियों के साथ रहने से इनको विकास का अच्छा अवसर मिल जाता है। इन लोगों में भो गोत्र प्रथा है, जैसे सांड, सौन, मगहिया तुतली, कछुआ और धान, तिर्की। शादी विवाह एक गोत्र में नहीं होता है। साधारणत: एक से अधिक विवाह नहीं होती है।, परंतु बाँझ एवं बदचलनी के कारण दूसरा विवाह करते हैं। अत: कोई भी लोहरा अपने गोत्र में विवाह नहीं कर सकता है। लोहरा एक कर्मकार जनजाति ये बात स्पष्ट है कि लोहरा एक कामगार जनजाति है। जो अपने और अपने साथ रहने वाले लोगों की आवश्यकता पूरी करते हैं। इसी पेशे की समानता की कारण लोहार जाति के लोग भी अपने को लोहरा होने का दावा करते हैं। रांची जिला के गजेरीयर में स्पष्ट लिखा है कि लोहरा उत्तरी बिहार से आये हैं, परन्तु उन्हें कनौजिया लोहरा कौल लोहरा या नागपुरिया लोहरा या छिर लोहरा कहते हैं। नागपुरिया लोहरा पुन: दो भाग में विभाजित है। एक सतकमार और दूसरा लोहरा। सतकमार लोगों पुन: दो भाग में विभाजित है। एक सतकमार और दूसरा लोहरा। सतकमार लोगों ने अपने जाति व्यवसाय को छोड़कर कृषि में लग गये हैं और सतकमार और लोहरा में शादी नहीं होती है। ऐसी स्थिति में मात्र व्यवासायिक समानता जैसे लोहारगिरी के कारण लोहार और लोहरा को समान मानना, पुन: शोध का विषय है। लोहरा खाने- पीने में बहुत कम निषेध मानते हैं। लोहरा, मुंडा, उराँव जाति के लोगों द्वारा पकाए हुए भोजन को खाते हैं और मरे हुए जानवर का भी मांस भी खाते हैं। लोहरा कोचा गाँव के अनेक लोगों से पूछताछ के क्रम में मालूम हुआ कि वे छोटानागपुर संथालपरगना में अवस्थित लोहार, कर्मकार और कमार तीनों को एक मानते हैं। उनका कहना है कि हम भी सभी तीनों जाति के लोग लोहरा हैं. और जनजाति का दर्जा मिलना चाहिए। ये बात सत्य है कि कमार, कर्मकार और लोहार पेशा एक ही करते हैं, अर्थात लोहारगिरी और आपस में शादी ब्याह भी करते हैं। इन लोगों का कहना है कि उत्तरी बिहार के लोहार से हमलोग भिन्न हैं और जनजाति हैं। जिस तरह लोहरा जनजाति हैं, उसी तरह कमार, कर्मकार और लोहार जनजाति हैं। इस विवादित प्रश्न का उत्तर पुन: शोध से किया जा सकता है। और इसका शोध प्रतिवेदन अलग से सरकार के विचारार्थ प्रस्तुत किया जा सकता है। चूंकि अभी तक लोहार और लोहरा को एक नहीं माना गया है। लोहार पिछड़ी जाति में अंकित है और लोहरा अनूसूचित जनजाति है। छोटानागपुर, संथालपरगना आदिवासी ( लोहरा) समाज कल्याण समिति, रांची ने अपने मांग के समर्थन में विशाल रैली एवं सम्मेलन आयोजित किए हैं और छोटानागपुर के लोहार कर्मकार को लोहरा जनजाति की मान्यता मांगते हैं। उनके अनुसार उत्तरी बिहार के लोहार जनजाति नहीं हैं। अत: लेखक के अनुसार इस विवादित प्रश्न का विधिवत शोध के बाद ही निकल सकता है। चूंकि अनेक पिछड़ी जाति जनजाति होने का दावा कर रह हैं और सबकी मांग पूरी नहीं की जा सकती है। भारत सरकार की कुछ विशेष मापदंड है, जिनका शोध अध्ययन में व्यवहार होता है। संस्थान द्वारा गौड़ जाति, बेदिया जाति, पुराण जाति के मांग को लेकर अध्ययन प्रतिवेदन प्रस्तुत किये गये हैं। लोहरा जनजाति का भविष्य अधिसूचित लोहरा जनजाति बिहार की एक महत्वपूर्ण जनजाति है। जिनकी जनसंख्या डेढ़ लाख से अधिक है। इतनी बड़ी जनसंखया होने के नाते यह जनजाति मुंडा, उराँव, संथाल की तुलना में करीब – करीब बराबर है रस्म रीति – रिवाज, विश्वास सामाजिक आर्थिक संघठन के दृष्टिकोण से काफी महत्व रखते हैं। पुस्तिका में वर्णित रहन – सहन एवं पेशा के परिप्रेक्ष्य में लोहरा बड़ी सहयोगी और मिलनसार है। दुसरे जनजातियों एवं गैर जनजातियों के साथ रहने से इनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति में निश्चित सुधार हुआ है। कहावत है की खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है। यही कारण है कि अन्य जनजातियों एवं गैर जनजातियों के समीप रहने से इनमें क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। अब मरने के बाद मसना में क्रिया - कर्म करते है और मरे जानवर का मांस आदि भी नहीं खाते हैं। विकसित जातियों की भांति शिक्षा में विशेष रूची रखते है और अच्छी खासी जनसंख्या में उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त किये है और अच्छे - अच्छे पदों पर कार्यरत हैं लेखक ने श्री गोपाल राम, जो एच. इ. सी. पदाधिकारी है और अपने लोहरा समाज कल्याण समिति के केन्द्रीय अध्यक्ष हैं,ने बताया की लोहरा समाज कल्याण समिति शिक्षा, सहकारिता एवं संगठित होने के लिए श्रम अधिनियम आदि का संकलन कर रहे हैं, ताकि लोहरा जनजाति अधिक जागरूक हो सके। लेखक ने लोहरा कोचा गाँव में पाया कि प्रत्येक घर में लोग शिक्षित हैं, विशेषकर युवा लोग पुराने लोग अपने परंपरागत व्यवासय अर्थात लोहरागिरी में व्यस्त रहने के बाद भी शिक्षा, परिवार कल्याण संगठन आदि मुख्य तथ्यों पर ध्यान देते हैं। इन सब तथ्यों से इनका भविष्य उज्ज्वल सिद्ध होता है। व्यवसाय कुशलता के कारण आर्थिक स्थिति भी अच्छी है और दुसरे जातियों के व्यवहार्थ लोहरागिरी से औजार आदि बनाकर मदद करते हैं, जिससे उनकी बीच इनकी मान्यता अधिक है और शिक्षा एवं आधुनिक शिक्षा से विस्तृत जानकारी प्रयत्न करके अपने व्यवसाय में नए डिज़ाइन एवं आकर के वस्तुयें बनायेंगे। जिसे अधिक मजदूरी प्राप्त होगी। शिक्षित व्यक्तियों के लिए रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। कल्याण विभाग द्वारा कल्याणकारी योजनाएं इनको लाभान्वित करेंगी। आई. आर. डी. पी., एन. आर. आई. आदि कार्यक्रमों से अधिक लाभान्वित होने के लिए गाँव के प्रमुख मुख्य से संपर्क करने से वर्तमान कल्याणकारी योजना का जानकारी प्राप्त करेंगे। जनप्रतिनिधिगण (प्रमुख मुख्य) जिनका प्रशिक्षण संवैधानिक प्रावधान एवं भूमि संबंधी नियमों के जानकारी प्राप्त करने पर संस्थान में चालू वर्ष में (1993) दो सत्रों में हुआ है और आशा है कि दुसरे सत्र भी आयोजित होंगे। जिसे आम ग्रामीण वासियों को अपने अधिकार एवं बचाव अधिनियम के जानकारी प्राप्त होगी। लोहरा जनजाति की आर्थिक स्थिति सुधर रही है और वे अब भूमिहीन नहीं हैं। उनके पास जमीन होगी और जमीन संबंधी क़ानून से अवगत होना अत्यंत आवश्यक है। अत: हर दृष्टिकोण से इनका भविष्य उज्ज्वल है। स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार