परिचय इस तथ्य से हमलोग भलिभांति परिचित हैं कि स्वतंत्रता के बाद से ही जनजातीय प्रशासन नीति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। जनजातीय प्रशासन को मुख्यत: दो कालों में विभक्त किया जा सकता है। एक काल तो ब्रिटिश समय का है तथा दूसरा काल स्वतंत्रता – प्राप्ति के बाद है। ब्रिटिश – काल में आधारभूत नीति यह थी कि इन जनजातियों के काम – काज में न्यूनतम हस्तक्षेप की जाए जिससे वे समय – समय पर भड़कते न रहे। इस काल में एकान्तीकरण की नीति अपनाई गई जिसके अंतर्गत इन्हें बाहरी दुनिया के संपर्क से अलग रखा गया। फलस्वरूप, इनका व्यक्तित्व सही रूप से विकसित नहीं हो सका। स्वतंत्रता के बाद जनजातियों के प्रति प्रशासन की नीति में परिवर्तन किए गये। एकान्तीकरण का नीति के स्थान पर, जनजातियों को भी भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया जिसके अंतर्गत इन्हें भारतीय समाज में सम्मिलित करने के लिए प्रयास जारी है इसमें भारतीय संविधान की उल्लेखनीय भूमिका रही है। संविधान में आधारभूत अधिकारों का परिगणन करते हुए भारत के प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास दिलाया गया कि धर्म, जाति, लिंग तथा जन्म के कारण किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। इसके अतिरिक्त, संविधान, के अनुच्छेद 46 भी जनजातियों की दृष्टि में बड़ा ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है। कि राज्य, जनता के दुर्बलतर विभागों की विशेषतया अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों की शिक्षा तथा आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करेगा। सामाजिक अन्याय तथा सब प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा। बिहार राज्य के अन्य अनुसूचित जनजातियों, कोरवा जनजाति के लोग भी अपने को भारतीय समाज का एक अंग समझने लगे हैं तथा यह मानते हैं कि सरकार उनके हितों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील है। स्वतंत्रता के बाद से ही कई पंचवर्षीय योजनाएं चलाई जा रही हैं जिसके अंतर्गत जनजातियों के समेकित विकास योजनाओं पर विशेष रूप से बल दिया गया। अन्य जनजातियों की तरह, कोरवा जनजाति के लोग भी आज बाहरी दुनिया के संपर्क में आ गये हैं और यह संपर्कता दिनों – दिन बढ़ती जा रही हैं। अब यह प्रश्न उठता है कि क्या संपर्कता के फलस्वरूप कोरवा संस्कृति को हानि पहुँच रही है। इसका उत्तर स्पष्ट है जिस पर आज कोई दो मत नहीं हो सकता। हम सभी जानते हैं कि संपर्कता ही विकास का मूल – मंत्र है। आज की पृष्ठभूमि में किसी भी जनजातीय क्षेत्र को बाहरी दुनिया के संपर्क से अलग रखकर राष्ट्रीय पार्क का रूप नहीं दिया जा सकता है। संपर्कता के फलस्वरूप, कोरवा जनजाति के व्यक्तित्व में उल्लेखनीय बदलाव आया है। लेखक सर्व, पालमू के कोरवा क्षेत्र में 1960 में गया था। चैनपुर प्रखंड के सरहुआ गाँव में तीन दिनों तक लेखक के सामने एक भी कोरवा बातचीत के लिए सामने नहीं आया। इसी गाँव में जब लेखक 1992 में गया था, तो स्थिति कुछ भिन्न थी। आसपास के गांवों के हजारों कोरवा उपस्थित होकर अनेक विषयों अर्थात विकास योजनाएं, प्रखंड कार्यायल में व्याप्त भ्रष्टाचार आदि में प्रकाश डाला जो दर्शाता है कि उनके व्यक्तित्व में कितना अंतर आया है। भू – भाग तथा जनसंख्या बिहार के अन्य अनुसूचित जनजातियों की तरह, कोरवा जनजाति के लोग भी छोटानागपुर में ही अधिकांश पाए जाते हैं जहां वर्षों से जंगलों और पहाड़ों में इनका निवास - स्थान रहा है। विभिन्न जनगणना वर्षों में कोरवा जनजाति की आबादी बिहार राज्य के विभिन्न भू – भागों में निम्नलिखित रूप से रहा है। आबादी, विभिन्न जनगणना वर्ष में भू – भाग 1872 1891 1901 1911 1931 1961 1971 1981 बिहार 5214 9710 11105 13720 13021 21162 18717 21940 पलामू 6369 9394 11863 11303 13056 14567 15766 रांची 5214 3341 1551 1807 1495 1801 2439 2412 सिंहभूम 160 50 223 647 438 1310 धनबाद 4894 234 298 हजारीबाग 195 21 गिरिडीह 49 शाहाबाद 314 रोहतास 217 सारण 2 1 भोजपुर 3 वैशाली 1 संथालपरगना 242 1095 पूर्णिया 1 36 मुंगेर 10 635 गया 1 भागलपुर 14 प. चंपारण 5 पटना 9 मुजफ्फरपुर 1 कटिहार 66 अन्य जगह 1139 विभिन्न जनगणनाओं में विभिन्न भू- भागों में आबादी का योग 5214 9710 11105 13720 13021 21162 18717 21940 आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार में, इस जनजाति की आबादी जो 1872 में 5214 था, बढ़कर 1981 में 21940 हो गयी। 1961 और 1971 के अवधि में कोरवा जनजाति की संख्या 21162 से घटकर 18717 हो गयी। लेकिन यह कमी कोई विशेष चिंता का विषय नहीं है क्योंकि 1981 में इनकी आबादी एक बार फिर बढ़ी। 1991 के जनगणना में इनकी स्थिति क्या थी, इसे जाना नहीं जा सकता क्योंकि इस जनगणना के आंकड़े उपलब्ध नहीं हुए हैं। इनके निवास स्थान के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि कोरवा समुदाय के लोग शुरू से आज तक पलामू में ही अधिक पाए जाते हैं और छोटानागपुर तथा संथालपरगना के अन्य स्थानों में इनकी आबादी कोई विशेष उल्लेखनीय नहीं है। शत प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि वर्षों से इनके पुर्वज पलामू के जंगलों और पहाड़ों में आकर रहने लगे तथा इनके पूर्वजों ने उसी स्थान को अपने निवास स्थान के लिए चयन किया जहाँ निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध थी – पहाड़ी स्थान जो घने जंगल से भरा हो जिसके फलस्वरूप इन्हें फल – फूल एकत्र करने में तथा शिकार के लिए पशु हर समय जीविका के लिए मिलता रहे। निवास स्थान के देवी – देवताओं की स्वीकृति प्राप्त हो सूचकों के अनुसार इनके पूर्वजों को वह स्थान, निवास के लिए सही नहीं था जहाँ देवी – देवीताओं के अप्रसन्नता के कारण बीमारी या मृत्यु दर में बढ़ोत्तरी हो। निवास स्थान के पास जल – स्रोत की कमी न हो। 65 प्रतिशत सूचकों ने बतलाया कि उपर्युक्त तीन सुविधाओं के अतिरिक्त, उनके पूर्वजों ने उसी स्थान को अपना निवास – स्थान बनाया था जहाँ उन्हें बाहरी लोगों से सुरक्षा मिल सके। अपने पूर्वजों द्वारा बसाये गांवों में आज भी वे प्रसन्न है। जब उनसे इस बात पर प्रकाश डालने को कहा गया कि क्या वे अन्य लोगों की तरह जंगलों एवं पहाड़ों के मूल – निवास को छोड़कर अपने विकास के लिए अन्य स्थानों में स्थायी रूप से बसना पसंद करेंगे? सभी सूचकों ने कहा कि जीविका के लिए भले ही वे अस्थायी रूप से कुछ समय के लिए चले जाएँ लेकिन अपने पूर्वजों द्वारा बनाये गाँव को वे किसी भी हाल में छोड़ना पसंद नहीं करेंगे। भाषा तथा प्रजाति बिहार राज्य के अन्य जनजाति अर्थात मुंडा, संथाल, भूमिज, बिरहोर, असुर आदि की तरह कोरवा जनजाति का भी आदि प्रजाति, प्रोटो – अस्ट्रेलॉयड, ही माना जाता है तथा कोरवा जनजाति की मूल- भाषा कोरवा है जो आस्ट्रिक परिवार भाषा बोलने वालों की संख्या 1961 जनगणना में सिर्फ 37.59 बतलाया गया है। इस आंकड़े से यह स्पष्ट होता है कि कोरवा जनजाति में सिर्फ 3759 ही लोग ऐसे हैं जो इस भाषा को बोलते हैं तथा अधिकांशत: बिहार के कोरवा लोगों द्वारा मूल – भाषा नहीं बोली जाती है। क्षेत्रीय अध्ययन के समय यह पता चला कि ये हिंदी बोलते हैं तथा समझते हैं तथा पलामू के कोरवा द्वारा भोजपुरी भी बोला जाता है। शत – प्रतिशत सूचकों के अनुसार ऐसी स्थिति इस वजह से उत्पन्न हुई है। क्योंकि वर्षों से ये अन्य भाषा अर्थात हिंदी, भोजपुरी बोलने वालों के संपर्क में रह रहे हैं। सामाजिक संरचना प्रत्येक समाज की तरह कोरवा समाज की भी अपनी संरचना है जो इनकी परम्परागत धरोहर है। सामाजिक संरचना को दूसरा नाम सामाजिक संगठन भी है जिसके अंतर्गत परिवार, नातेदारी आदि की व्याख्या करने पर भी सामाजिक संरचना के प्रत्येक हिस्सों को आका जा सकता है। परिवार कोरवा जनजाति मुख्यता दो शाखाओं में विभाजित है – क) डीह कोरवा ख) पहाड़िया कोरवा। मिर्जापुर, मध्यप्रदेश के कोरवा के बारे में डी. एन. मजुमदार बतलाते हैं कि कोरवा तीन भागों में विभक्त हैं क) डीह कोरवा ख) दंड कोरवा और ग) पहाड़िया कोरवा। जहाँ तक विवाह का संबंध है, प्रत्येक शाखा अपने ही शाखा में विवाह संबंध स्थापित करना पसंद करते हैं। 45 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि कोरवा जनजाति समुदाय के सभी लोग एक ही हैं और परम्परागत नियमों के अनुसार कोरवा के किसी शाखा के साथ विवाह संबंध स्थापित किया जा सकता है। कोरवा समाज में पितृ - सतात्म्क परिवार ही पाए जाते हैं। सभी कोरवा सूचकों ने बतलाया की आदि काल से ही इनका परिवार पितृ सतात्म्क तथा पितृ स्थायी रहा है और आज भी वंश परम्परा पिता के नाम से ही चलती है, संपति का अधिकार स्त्री को नहीं बल्कि पुरूष का होता है तथा स्त्री अपने माँ – पिता का घर छोड़कर, पति के घर जाकर रहती है। कोरवा समाज में पितृ सताम्त्क तथा पितृ स्थायी व्यवस्था होने के बावजूद भी महिलाओं की सामाजिक स्थिति ख़राब नहीं हैं, अधिकांशत: कोरवा परिवार एक विवाहि या वैयक्तिक व्यवस्था पर ही आधारित है और यह पाया गया है कि ऐसे परिवारों की स्त्री की सामाजिक स्थिति बहुत ही अच्छी है। 65 प्रतिशत महिला सूचकों ने बतलाया की उनका समाज पुरूष प्रधान है लेकिन परिवार में कोई भी काम बिना उनके सलाह लिए संपन्न नहीं होता है। इन सूचकों ने आगे बतलाया कि संपति पर उनका अधिकार नहीं है, लेकिन आभूषण, बर्तन आदि जो समान वे अपने पिता के घर से शादी के बाद पति के घर लाती है, उस पर उनका अधिकार है। इन लोगों का मत है कि स्त्री एवं पुरूष गाड़ी के दो पहिया है, यदि एक पहिया खराब हो जाए या उसका सही रूप नहीं आका जाए तो गाड़ी को सही रूप से नहीं खींचा जा सकता। इनका यह कथन कितना सत्य है, वह इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि 30 प्रतिशत परिवारों में यह पाया गया है कि पत्नी की मृत्यु के पश्चात परिवार के सारे आर्थिक कार्य ठप पड़ गए और परिवार के सामाजिक एवं आर्थिक कार्यों को सक्रिय करने के लिए, कोरवा पुरूषों द्वारा पुनः विवाह किया गया था। 10 प्रतिशत कोरवा परिवार का स्वरुप बहुपत्नी का था जिसके अंतर्गत एक कोरवा पुरूष को दो पत्नियाँ थी। शत – प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि उनकी आर्थिक स्थिति आज भी इतनी दयनीय है की वे एक पत्नी से अधिक रखने में असमर्थ है लेकिन पत्नी, यदि बाँझ होती है तो वंश बढ़ाने के लिए घर में रखने के साथ ही दूसरी पत्नी लायी जाती है। ऐसे परिवारों में पहली पत्नी की सामाजिक स्थिति पर कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। अन्य जनजातीय में परम्परागत परिवार के स्वरूप में परिवर्तन हो रहे हैं। पलामू जिले के खरवार, चेरो आदि ऐसे जनजातीय समुदाय हैं जहाँ यह पाया गया कि कुछ नवयुवक शहर में जाकर नौकरी करते हैं, अपने पत्नी तथा बच्चों के साथ वहीँ जाकर बस गये हैं। नौकरी से जो आय होती हैं, उसे वे अपने मूल निवास स्थान में रह रहे माता – पिता के साथ मिल कर खर्च नहीं करते है क्योंकि शहर में जो आय होती है, वह उनके अपने जीवन निर्वाह के लिए काफी नहीं है। कोरवा लोगों में सिर्फ पांच ही परिवारों में यह पाया गया की उनके परिवार के नवयुवक डाल्टेनगंज में नौकरी करते हैं। इन तथ्यों से पता चलता है कि अधिकांशत: कोरवा परिवारों का स्वरुप संयूक्त परिवार है जिसमें माता – पिता तथा विवाहित तथा अविवाहित लड़के एक साथ रहते है तथा सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र के सभी विषयों पर परिवार के बड़े अर्थात पिता का नियंत्रण होता है। नातेदारी कोरवा जनजाति के सामाजिक संरचना में नातेदारी व्यवस्था का बड़ा ही संस्कृतिक महत्व है क्योंकि इसे के द्वारा सामाजिक व्यवहार सही रूप से संचालित होते है। अन्य जातियों के तरह, कोरवा जनजाति में नातेदारी की दो रूप हैं। इनके संस्कृतिक में यह पाया गया है कि वैवाहिक संबंध ऐसे लोगों से स्थापित किया जाता है जिनके साथ खून का रिश्ता नहीं होता है। अत: पति पत्नी के रिश्ते के जुड़ते ही पति के रिश्तेदारों के साथ पत्नी का और पत्नी के रिश्तेदार के साथ पति का रिश्ता स्वत: जुड़ जाता और इस प्रकार के बिना खून के रिश्ते को सम्मिलित संबन्ध के नाम से जाना जाता है। दूसरा नाता माता पिता तथा उनकी सन्तान के बीच होता है जो एक ही खून का रिश्ता होता है जिसे समान रूधिर संबंध के नाम से जाना जाता है। शत – प्रतिशत सूचकों ने बतलाया की इनके बीच गोत्र को लोग भूल रहें है। अत: वैवाहिक संबंध जोड़ने के पहले यह पता लगाया जाता है कि दोनों पक्षों में खून का रिश्ता कभी था या नहीं। यदि खून का रिश्ता स्थापित हो जाता है रो वैवाहिक संबंध नहीं होगी। इन सूचकों ने आगे बतलाया कि विभिन्न रिश्तेदारों को आपस में प्रतिदिन वास्ता पड़ता है। परम्परागत सामाजिक नियमों के अंतर्गत कुछ नियामक व्यवहार बने हुए जो रिश्तेदारों के आपसी व्यवहारों को संचालित करती है तथा समाज को संगठित रखती है। अन्य जातियों के संगठित परिवारों की तरह इनके यहाँ भी नियामक व्यवहार के अंतर्गत परिहार तथा परिहास के व्यवहारों को सामाजिक स्वीकृत प्राप्त है। पुत्रवधू तथा सास – ससुर परिहार दामाद तथा सास – परिहार, भाई – बहन परिहार के अंतर्गत यह निर्धारित किया गया है कि इन रिश्तेदारों के बीच कैसा व्यवहार हो? कोरवा समाज में पुत्रवधू अपने ससुर के सामने सर पर अंचल रखकर जाती है। एक ही खाट पर साथ नहीं बैठती तथा उनके कमरे में सो नहीं सकती है। इसी तरह दामाद भी अपने सास तथा पत्नी के बड़े भाई से तथा स्त्री अपने पति के बड़े भाई से परिहार का व्यवहार रखती है। यह भी पाया गया है कि कोरवा संस्कृति में इस बात पर बल दिया जाता है कि जवान भाई – बहन आपस में कम मिले ताकि उनके बीच यौन संबंध न हो जाए। परिहास व्यवहार के अंतर्गत अपनी पत्नी की छोटी बहन तथा पति के छोटे भाई से हंसी मजाक की जाती है। कोरवा सूचकों ने बतलाया की अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद पत्नी की छोटी बहन तथा पति के मृत्यु के बाद पति के छोटे भाई से शादी की जा सकती है। गोत्र मुंडा, उराँव, हो, संथाल जनजातियों की तरह कोरवा जनजाति के लोग अपने नाम के साथ गोत्र के नाम का प्रयोग में नहीं लाते हैं। 65 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया की गोत्र के बारे में उनकी जानकारी बहुत कम है और इसीलिए इसे नाम के साथ वर्षों से इस्तेमाल नहीं किया जाता है। 35 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया की इनके बीच निम्नलिखित गोत्र हैं – हूटटर टीट्टी (चिड़िया), काशी (घास), सूइयाँ (चिड़िया), खप्पो, कोकट एवं बुचंग (चिड़िया)। सूचकों ने आगे बतलाया की गोत्र चिन्ह को ये लोग खाते नहीं है या उसे मारते नहीं है। इन सूचकों ने यह भी व्यक्त किया कि गोत्र के बारे में वे अपने बड़े बूढ़ों से सुनते है लेकिन किस परिस्थति में इसका महत्व कम हो गया था इसके बारे में वे भूल गये है, कहना मुश्किल हैं। लेकिन वे इस बात से परिचित हैं कि एक ही गोत्र में विवाह नहीं हो सकती है क्योंकि एक गोत्र के लोगों का आपस में खून का रिश्ता होता है। बिरादरी जनजातियों के जब अनेक गोत्र होते है तो कुछ गोत्र के लोग मिलकर चार या पांच समुदाय बना लेते हैं जिसे बिरादरी कहते हैं। इस तरह एक बिरादरी में कई गोत्र वाले रहते हैं, लेकिन एक ही बिरादरी में रहते हुए भी गोत्र के बाहर ही विवाह संबंध स्थापित की जा सकती है। 65 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने कहा कि बिरादरी के बारे में कहना मुश्किल है क्योंकि गोत्र के बारे में वे भुल चुके हैं। गोत्रर्ध का अर्थ है- आधा। गोत्र के आधार पर, जब समाज दो समूहों में बंटे होते हैं, तब इस प्रकार की व्यवस्था को गोत्रर्ध कहा जाता है। कोरवा सूचकों ने बतलाया की गोत्र उनके सामाजिक संरचना में आज महत्वहीन होकर रह गया है। अत: गोत्रर्ध व्यवस्था के बारे में वे कुछ भी नहीं कह सकते हैं, लेकिन इतना तो अवश्य ही है कि एक ही गोत्र में विवाह नहीं होगी। जीवन चक्र जन्म – अन्य जातियों की तरह कोरवा समाज में भी परिवाह, विवाह यह बच्चों को महत्व दिया जाता है। शत प्रतिशत कोरवा सूचकों ने कहा कि परम्परागत रीति – रिवाज के अनुसार एक स्त्री और पुरूष को विवाह के बाद ही बच्चे पैदा करने का सामाजिक अधिकार है। इस बात से ये भलीभांति अवगत है कि पति – पत्नी के बीच यौन संबंध के पश्चात् ही सन्तान उत्पन होते हैं। 45 प्रतिशत कोरवा सूचकों के अनुसार बच्चे ईश्वर की कृपा से उत्पन्न होते हैं। इन लोगों ने कहा कि यदि भगवान की इच्छा नहीं होती तो एक स्त्री को कभी भी सन्तान पैदा नहीं हो सकता और ऐसी स्त्री को बाँझ कहा जाता है तथा ऐसे बाँझ औरतों का इनके समाज में अच्छी स्थिति नहीं है और परम्परागत रीति रिवाज के अनुसार एक पुरूष अपनी बाँझ पत्नी के रहते, संतान के लिए विवाह कर सकता है। कोरवा समाज में गर्भवती स्त्री को कुछ निषेधों का पालन करना होता है। सूर्यास्त के बाद गर्भवती स्त्री अकेले जंगल, जल स्रोत अर्थात झरना, तालाब आदि जगहों में नहीं जातीं है क्योंकि उनका विश्वास है कि डाकिन - प्रेत आदि नुकसान पहुंचा सकते हैं। यदि सूर्य ग्रहण चन्द्र ग्रहण लगा होता है तो गर्भवती स्त्री को उसे देखना निषेध है क्योंकि उनका यह विश्वास है कि ऐसा करने से अपंग बच्चे पैदा होते हैं। बच्चे का जन्म घर के जिस स्थान में होता है, उसे प्रसौती घर या सेवरी घर के नाम से जाना जाता है। जैसे ही गर्भवती स्त्री को प्रसव - दर्द आरंभ होता है, चमार जाती की स्त्री जिसे डगरीन के नाम से जाना जाता है, बुलाया जाता है यह डगरीन कोरवा गांव के ही या आस – पास के गाँव के ही रहने वाली होती है। परिवार के अन्य महिलाओं की सहायता से, डगरीन, बच्चे को जन्म दिलवाती है। जन्म के बाद बच्चे के नार को डगरीन द्वारा हसुआ से काटा जाता है तथा इसे घर के बाहर ऐसी जगह गाड़ दिया जाता है जहाँ किसी की इस पर नजर न पड़े। 30 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि कभी – कभी प्रसव दर्द के बाद भी बच्चा जन्म नहीं लेता है। ऐसी हालत में यह समझा जाता है कि किसी देवता या प्रेत आदि के अप्रसन्नता के फलस्वरूप ऐसा हो रहा है। अत: गाँव के ओझा को बुलाकर पता किया जाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन ओझा या डगरीन के प्रयास के बाद भी बच्चे का जन्म नहीं होता है तथा ऐसे कुछ गर्भवती स्त्रियों की मृत्यु हो जाती है यह पाया गया है कि ऐसे कठिन प्रसव स्थिति में भी वे देवी – देवीताओं तथा भूत – प्रेत को कारण समझकर, ओझा की सहायता से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। 5 सूचकों ने बतलाया कि उन्हें यह पता चला है। कि सरकारी अस्पताल में डॉ. लोग ऑपरेशन कर बच्चे को जन्म दिलवा देते हैं, लेकिन इस ज्ञान के बावजूद भी वे अभी तक अस्पताल इसके लिए नहीं गये हैं क्योंकि अधिकांश कोरवा यह मानते हैं कि परम्परागत प्रसव रीति - रिवाज को तोड़ने से ईश्वर अप्रसन्न हो जायेंगे और फलस्वरूप परिवार को क्षति पहुंचेगी। जन्म का छुत छ: दिनों तक का होता है। इस अवधि में उस परिवार के यहाँ कोई नहीं खाता है या पानी नहीं पीता है। छट्ठी का उत्सव: छ: दिनों पर मनाया जाता है। इस दिन, एक हजाम जो बुलाया जाता है जो परिवार के पुरूष का बाल काटता है, दाढ़ी बनाता है तथा नाखून काटता है। बच्चे के पिता या माता की बहन द्वारा बच्चे के आँखों में काजल लगाया जाता है। इसी दिन जन्म छूत की समाप्ति हो जाती है। छट्ठी – उत्सव में परिवार तथा गाँव के अन्य रिश्तेदार के लिए भोज का प्रबंध किया जाता है। विवाह जन्म के बाद, बच्चों का विकास ऐसे वातावरण में होता है जिसमें रहकर वह अपने संस्कृतिक, अलिखित रीति – रिवाजों के बारे में शिक्षा प्राप्त करता है। इस क्षेत्र में उसके परिवार तथा पड़ोसियों का भी महत्वपूर्ण भूमिका है। विवाह के महत्व तथा भूमिका के संबंध में कोरवा लोग पूर्ण रूप से परिचित हैं। विवाह महत्व तथा भूमिका के बारे में 80 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने निम्नलिखित विचार व्यक्त किए – विवाह की आवश्यकता इसलिए हुई क्योंकि इसके द्वारा यौन संबंध को नियंत्रित किया जाता है। इस संबंध द्वारा समाज को अव्यवस्थित होने से बचाया जा सका है। सामाजिक एवं आर्थिक आवश्यकता, परिवार के सदस्य होकर ही पूरा किया जा सकता है। परिवार का गठन, पति – पत्नी और बच्चे से होता है। सामाजिक रीति रिवाज के अनुसार, हर परिवार का यह कर्तव्य है कि कोरवा समाज को कायम रखने के लिए, संतान उत्पन्न करें तथा संतान को विवाह के बाद ही सामाजिक मान्यता प्रदान की जा सकती है। कोरवा जनजाति में अन्तर्विवाह की प्रथा प्रचलित है अर्थात अपनी ही जाति में शादी करते हैं, दूसरी में नहीं। इस तथ्य से पहले ही अवगत कराया जा चूका है कि इनके बीच एक – विवाह की प्रथा है जिसके अंतर्गत अधिकांशत: कोरवा परिवारों में एक पुरूष तथा एक स्त्री के नियम का पालन किया जा रहा है। कुछ ही कोरवा परिवारों में पाया गया कि पत्नी के बाँझ होने के चलते दूसरी लाई गई। इसके अतिरिक्त यह भी पाया गया कि पति के मृत्यु के बाद पति के छोटे भाई से तथा पत्नी की मृत्यु के बाद छोटी बहन से भी शादी की जाती है। जहाँ तक विवाह पद्धतियों का प्रश्न है, अधिकांशत: विवाह माता – पिता के द्वारा ही किया जाता है। लेकिन कभी – कभी ऐसा होता है कि माता – पिता के सहमति के बिना प्रेम – वश युवा – युवती विवाह करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर वे एक दुसरे के साथ भाग जाते हैं और प्रेम – विवाह कर लेते हैं। पलायन – विवाह के अतिरिक्त यह पाया गया कि अधिकांशत: कोरवा लोगों में आज भी पत्नी – मूल्य की प्रथा प्रचलित है। आजकल पत्नी – मूल्य निर्धारित करते समय बढ़ा - चढ़ा कर मांग की जाती है। इसके अंतर्गत, नगद 5 रूपया से 100 रूपया तक ली जाती है तथा इसके अतिरिक्त पत्नी की माँ के लिए एक साड़ी, पत्नी के भाई के लिए एक धोती तथा मिठाई दी जाती है। विवाह - रस्म लड़की के घर में संपन्न की जाती है। अधिकांशत: कोरवा लोगों ने बतलाया कि उनके परम्परागत रीति – रिवाज के अनुसार, चढ़के शादी में विवाह रस्म लड़की के घर में संपन्न की जाती है। परंपरागत रीति – रिवाज के अनुसार विवाह के सभी रस्म मड़वा में संपन्न की जाती है। परिवार के महिलाओं द्वारा या नऊआ द्वारा लड़के को लड़की की मांग सिन्दूर लगाने को कहा जाता है। जिसके पश्चात सभी उपस्थित बड़े लोग, वर एवं वधू को आशीष देते हैं। इनके अतिरिक्त सरंचना में तलाक की प्रथा भी प्रचलित है, लेकिन अधिकांशत: कोरवा सूचकों ने बतलाया कि आजकल तलाक, शायद ही किया जाता है। मृत्यु 65 प्रतिशत सूचकों ने बतलाया कि जन्म के बाद किसी की मृत्यु कब होगी, इसे ईश्वर द्वारा तय किया जाता है। उनका मत है कि निर्धारित समय जब समाप्त हो जाती है, किसी स्त्री या पुरूष की मृत्यु हो जाती है, अर्थात ईश्वर उसे वापस बुला लेता है। उनलोगों ने आगे बतलाया कि मनुष्य के शरीर में आत्मा होती है। ईश्वर के मर्जी से ही आत्मा को पुन: वापस कर दिया जाता है और वह किसी नये शरीर में प्रवेश कर जन्म लेता है। मृत्यु कई रूप में किसी को प्रभावित करती है। कुछ लोगों को मृत्यु के पहले कोई रोग लग जाता है और वह भगवान का प्यारा हो जाता है। कोई किसी दुर्घटना में स्वर्गवास हो जाता है तो कोई बुढ़ापा के कारण मृत्यु को प्राप्त करता है। 35 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि जब कोई रोग से पीड़ित होता है तो ओझा की सहायता प्राप्त किया जाता है। ओझा यह पता लगाता है कि बीमारी किस कारण से हुआ है। यह जानने बाद, रोगी को चंगा करने के लिए जड़ीबूटी देता है या अप्रसन्न देवता को प्रसन्न करने के लिए खस्सी या लाल मुर्गा का बलि चढ़ाता है। लेकिन ये सारे प्रयास असफल हो जाते हैं यदि ईश्वर द्वारा निर्धारित समय समाप्त हो जाता है जसके फलस्वरूप रोगी का मृत्यु हो जाता है। मृतक को अधिकांशत: लोग गाड़ देते हैं तथा इसके साथ ही जलाने की प्रथा भी प्रचलित है। मृत्यु के बाद इस दिनों का छुतका लगता है। इस अवधि में दाढ़ी – हजामत नहीं बनाया जाता है, इनके परिवार में कोई भोजन नहीं कर सकता है। तथा धार्मिक कार्य वर्जित हैं। दसवां रस्म के अंतर्गत, नाउआ को बुलाकर दाढ़ी हजामत बनवाया जाता है तथा स्त्री, पुरूष एवं बच्चे स्नान करते हैं इसी दिन भोज भी आयोजित की जाती है जिसके पश्चात छुतका समाप्त हो जाता है। आर्थिक संगठन वर्षो से कोरवा जनजाति के लोग छोटानागपुर के पहाड़ों और जंगलों में बसे हुए हैं। जंगल के इस प्राकृतिक वातावरण में वर्षों से रहते हुए, इन्हें यह पता है कि प्रकृति में पाई जाने वाली वस्तुओं को वह किस प्रकार प्राप्त करके उपयोग करे ताकि उसका भौतिक – शरीर बना रहे हैं। जंगलों में घूम – घूम कर फल – फूल एकत्र करना, पशुपालन, खेती करना, हाट – बाजार जाकर छोटे – छोटे व्यापार करना शहरों में तथा राज्य के बाहर जाकर अस्थायी रूप से वास कर श्रम करना। यह सभी भौतिक शरीर के बनाये रखने के भिन्न – भिन्न अर्थ व्यवस्थायें हैं जिन्हें अन्य जनजातियों की तरह, कोरवा जनजाति के लोगों ने भी अपनी जीविका के लिए खोज निकाला है। शत – प्रतिशत कोरवा सूचकों का कथन है कि वर्षों से वे अपने प्राकृतिक साधनों का उपयोग करने के लिए प्रयत्नशील है तथा इस प्रयास में उन्हें कई बाधाएं झेलने पड़े हैं और फलस्वरूप आज भी इनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है कोरवा लोग आज भी कमाया - खाया के सिद्धांत पर अपने को संतुष्ट रख रहे हैं तथा बचत तत्व का शत – प्रतिशत अभाव है। जहाँ तक इनके आर्थिक स्वरुप का प्रश्न है, इनकी आर्थिक व्यवस्था भिन्न – भिन्न अर्थ व्यवस्था का सम्मिश्रण है। वे फल – फूल एकत्र करते हैं, कृषि करते हैं तथा आस – पास के शहरी क्षेत्रों में जाकर जीविका के लिए मजदूरी करते हैं। फल – मूल एकत्र करना पलामू तथा गढ़वा जिला में अधिकांशत: कोरवा, जंगलों और पहाड़ों में वर्षों में रहते आये हैं। उनका कहना है कि उनके क्षेत्र में फल कंद – मूल आदि इतनी मात्रा में प्राप्त होता है कि समय – समय पर हुए आकाल के समय भी इन्हें कठिनाई नहीं हुई और इन्हें भोजन प्राप्त होता रहा। आज भी, ये अपने पूर्वजों की तरह फल – फूल पर अपनी जीविका के लिए मुख्य रूप से निर्भर हैं। फल - फूल एकत्र करने का काम मुख्यत: महिलाओं द्वारा की जाती है जो पूरे वर्ष इनकी जीविका का साधन है। शत – प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि फल – फूल के अतिरिक्त शिकार भी इनकी जीविका का साधन वर्षों से रहा है। इन सूचकों ने आगे बतलाया कि इनके पूर्वजों को आज की तरह आर्थिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता था क्योंकि वे जंगल के राजा थे तथा जंगल के खाद्य पदार्थों को तथा जानवरों के शिकार करने से कोई उन्हें रोकने वाला नहीं था। जंगल इतना घना था तथा आने – जाने की सुविधाएँ आज की तरह नहीं थी, जिसके फलस्वरूप जंगल विभाग के कर्मचारी, कोरवा क्षेत्र में पहुँच ही नहीं पाते थी, जिसके फलस्वरूप इनके पूर्वज जंगल के राह से कम नहीं थे। इनके पूर्वजों का आर्थिक जीवन तथा स्वास्थ्य आज की तरह खराब नहीं था। आज बाहरी दुनिया से उनका संपर्क बढ़ गया है जंगल के कर्मचारी उनके क्षेत्र में छा गये हैं जिनके द्वारा सरकार के जंगल – नियमों का पालन करवाया जा रहा है, जिसके कारण उनकी आर्थिक जीवन ऐसी बन कर रह गई है कि पूर्वजों की तरह वे आज जंगल के राजा नहीं रह गये हैं। शिकार करना मना है और इसी कारण उनके घरों में तीर धनुष शायद ही पाया जाता है। शिकारी जीवन भूतकाल का विषय बन कर रह गया है जिसके कारण मांसहारी भोजन नहीं प्राप्त होने के वजह से अपने पूर्वजों की तरह स्वस्थ नहीं है। 70 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने जंगल (जो उनके जीविका का मुख्य साधन वर्षो से रहा है) के विषय में जो कहा वह गौर करने लायक है। इन्होंने बतलाया कि जंगल – बचाव की समस्या उस समय उतनी क्यों नहीं थी, जब बाहरी दुनिया के संपर्क से अलग रहकर इनके पूर्वज जंगल के लकड़ी, पशु तथा खाने के पदार्थों को इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र थे। इस छूट के बावजूद भी, घने जंगल थे, पशु की तथा फल आदि की कमी नहीं होती थी। लेकिन आज जंगल सुरक्षा पर राशि खर्च करने पर जंगल तथा जंगल के पशु खत्म होते जा रहे और इसके लिए अन्य जनजातियों की तरह कोरवा लोगों को ही क्या उत्तरदायी ठहराया जाना किया ठीक है? सूचकों ने कहा। पशुपालन जीविका के साधनों में पशुपालन का भी स्थान है। मुर्गी, सुअर, बकरी, गाय आदि के तरफ वे अपनी जीविका के लिए आकर्षित हैं, लेकिन उनकी आर्थिक संरचना आज भी ऐसी है जिसमें बचत का कोई स्थान नहीं है। जिसके फलस्वरूप पशुपालन अधिकांशत: लोगों द्वारा नहीं की जाती है। यह पाया गया कि 20 प्रतिशत कोरवा सूचकों के पास बकरियां, मुर्गियां थी। 5 प्रतिशत सूचकों के पास गाय थी तथा दो परिवारों के पास सुअर था। शत प्रतिशत ने यह व्यक्त किया की सरकार की तरफ से बकरी, मुर्गी तथा गाय मुफ्त में वितरित की जाने चाहिए। सुअर के बारे में इन लोगों ने बतलाया की इनकी संस्कृति पर हिन्दूओं का प्रभाव अधिक पड़ा है। क्योंकि वर्षों से हिन्दू इनके पड़ोसी रहे हैं। अत: इनका कथन है की सुअर पालने से सामाजिक स्तर प्रभावित होगा और उच्च जाती के लोग इन्हें तुच्छ दृष्टि से देखेंगे। जिस कोरवा परिवार के पास बकरी, मुर्गी आदि है वे समय पड़ने पर उसे बाजारों में जाकर बेच देते हैं और प्राप्त राशि से अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। गढ़वा के रंका प्रखंड के एक कोरवा गाँव में यह पाया गया कि सरकार द्वारा चार कोरवा परिवारों को एक - एक गाय दी गई। लेखक ने स्वयं देखा की इन गायों को पाकर कोरवा परिवार की महिलाऐं इस तरह से आपस में मिलकर प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी जैसे उनके घर में पर्व त्यौहार हो। इन महिलाओं द्वारा गायों की मांग में लाल लगाया गया जिसे देखने से ऐसा प्रतीत होता था जैसे गाय की मांग पर सिन्दूर लगाया गया हो। उनकी रुचि को तथा उनकी दयनीय आर्थिक दशा को देखते हुए अधिकांश परिवारों को गाय, बकरी, मुर्गी आदि सरकार की ओर से मुफ्त दी जाय लेकिन साथ ही ये व्यवस्था भी की जाए की इन वितरित पशुओं को उठाकर शोषक लोग ना ले जाए तथा इन्हीं प्रशिक्षित किया जाए की इन पशुओं से आर्थिक स्थिति में किस तरह से सुधार लाया जा सकता है । यदि ऐसा किया जाता है तो इनकी आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। कृषि यह पहले ही कहा जा चुका है कि कोरवा का आर्थिक संरचना का रूप मिश्रित है उनका झुकाव स्थिर खेती की ओर रहा है। 65 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया की इनकी पूर्वजों द्वारा बेवरा खेती की जाती थी। इसके अंतर्गत 2 या 3 एकड़ जंगल – जमीन को चुना जाता था। उस जमीन के सारे लकड़ियों को काट कर सूखने के लिए छोड़ दिया जाता था तथा 2 या 3 माह के बाद लकड़ियों को जला दिया जाता था तथा जले हुए लकड़ी के राख को जमीन पर फैला दिया जाता था जिससे जमीन की उत्पादन शक्ति बढ़े। इस तरह से तैयार किए गये जमीन में 2 या 3 वर्ष तक मुख्य रूप से मकई उपजाया जाता था जिसके बाद जमीन की उत्पादन शक्ति समाप्त हो जाती थी और अन्य जगहों में जाकर जंगल काटकर कृषि खेत उसी तरह तैयार की जाती थी सरकार द्वारा इस तरह की खेती को वर्जित कर दिया गया है और इसे अब नहीं की जाती है। 55 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि कृषि जमीन में आनाज पैदा करना मुश्किल है क्योंकि अपनी गरीबी के कारण उन्हें बीज, हल, बैल आदि जुटाने में कठिनाई होती है। पानी के आभाव में भी कृषि कार्य ठप रहता है। इन सूचकों ने आगे कहा कि खेत मरम्मति, बीज, हल - बैल, सिंचाई की व्यवस्था यदि सरकार द्वारा नि: शुल्क की जाय तो उनका झुकाव स्थिर कृषि की ओर बढ़ेगा तथा उनकी आमदनी बढ़ेगी। कुछ कोरवा लोग, अपनी कृषि जमीन को मकई, सावां, तील, मडुवा, कटका, जिन्होर, गूंद्ली, बोदी आदि पैदा करते हैं मजदूरी कृषि मजदूर के रूप में ये वर्षों से काम रहे हैं। 90 प्रतिशत कोरवा सूचकों ने यह बतलाया की स्वंत्रता के पहले स्थानीय जमींदार लोग, इनसे बेगारी करवाया करते थे। बेगारी प्रथा के अनुसार कोरवा स्त्री - पुरूष से काम तो करवाया जाता था, लेकिन मजदूरी नहीं दी जाती थी। यदि कोई कोरवा मजदूरी मांग बैठता था या काम करने से इंकार करता था तो उसे हंटर से मारा जाता था जिसके चलते शायद ही कोई बेगारी के लिए ना करने के हिम्मत रखता था। जमींदारी खत्म होने के बाद बेगारी प्रथा भी स्वत: समाप्त हो गई। लेकिन बेगारी से ख़राब प्रथा बंधुवा मजदूर का था, जिसे हाल ही में सरकार के द्वारा समाप्त किया जा चुका है। बंधुवा मजदूरी प्रथा के अनुसार कर्ज लेते समय कर्ज लेने वाला तथा देने वाला द्वारा यह इकरार किया जाता था कि जब तक कर्ज अदा नहीं कर दिया जाएगा, कर्ज लेने वाला किसी अन्य जगह काम नहीं कर सकता था। वह महाजन के साथ बंध जाता था और सिर्फ उनके आदेश के अनुसार उन्हीं के यहाँ काम करने के लिए बाध्य था। बंधुवा मजदूर को अपनी जीविका के लिए एक छोटा धान का खेत दिया जाता था जिसे प्लाहथ के नाम से जाना जाता है। कोरवा सूचकों ने बतलाया कि अपनी गरीबी के कारण शायद ही कोई कर्ज की अदायगी कर पाता था जिसके चलते किसी बंधुवा मजदूर के मृत्यु के बाद, उसके लड़के को भी बंधुवा मजदूर बनना पड़ता था। बंधुवा मजदूर की प्रथा समाप्त कर दी गई है और सरकार द्वारा महाजनों से स्वतंत्र किए गये बंधुवा मजदूरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है। मजदूरी आज भी इनकी जीविका का एक मुख्य साधन है। कृषि कार्य के समय इन्हें आस – पास के कृषकों को यहाँ मजदूरी कार्य मिलती है और इसके अतिरिक्त, कुछ कोरवा लोग बंगाल भी अस्थायी रूप से चले जाते हैं और कृषि, मजदूरी कर के पैसा कमाने का प्रयास करते हैं। इनके आर्थिक जीवन में स्थानीय बाजारों का भी बड़ा महत्व हैं। जनजाति क्षेत्र में बाजार, सप्ताह में एक या दो दिन लगते हैं। कोरवा अपनी गरीबी के कारण इन बाजारों में जाकर पैसा खर्च करने में असमर्थ है लेकिन इसके बावजूद भी नमक, तेल चावल आदि यथा संभव क्रय करते हैं। अधिकांशत: सिर्फ घूमने के लिए इन बाजारों में आते हैं जहाँ अन्य लोगों से इनका सम्पर्क होता है। सरकार द्वारा इस राज्य के 30 अनुसूचित जनजातियों में असुर, बिरहोर, विरजिया, परहिया, पहाड़ी खड़िया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, के अतिरिक्त कोरवा जनजाति को भी उस सूची में सम्मिलित किया है जिन्हें गरीबी रेखा से नीचे आंका गया है। सरकार की नजर में आज भी इनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है जिसके फलस्वरूप सरकार द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है जल्द से जल्द इन्हें गरीबी रेखा से उपर उठाया जाय जिसके लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही है। धर्म 1981 के जनगणना में कोरवा की कुल आबादी 21940 है जिसमें 20959 कोरवा को हिन्दू धर्म के अंतर्गत बतलाया गया है। सर्वेक्षण के समय पता चला कि वर्षो से इनके पड़ोसी हिन्दू रहे हैं जिसके फलस्वरूप कोरवा संस्कृति पर इनका प्रभाव पड़ा है अत:1981 के जनगणना आंकड़ों के आधार पर यदि यह कहा जाय कि अधिकांशत: कोरवा हिन्दू धर्म के मानने वाले है तो यह ठीक प्रतीत नहीं होता। आज भी कोरवा लोग अपने परंपरागत धर्म में विश्वास रखते हैं। उनका विश्वास है कि उनके निवास स्थान के आप – पास अनके देवी देवता है जिन्हें यदि प्रसन्न नहीं रखा जाय तो उन्हें नुकसान पहुँच सकता है। इन पारलौकिक शक्ति में विश्वास ही धर्म है। अन्य जनजातियों की तरह कोरवा लोगों को भी जीववाद में विश्वास है। इनका विश्वास है कि उनका वातावरण जीवात्माओं से भरा है। इन जीवात्माओं को परंपरागत विधि विधान से यदि प्रसन्न नहीं किया जाए तो हानि पहुंचेगी। 55 प्रतिशत सूचकों ने बतलाया की वर्षो से वे पूर्वजों की पूजा करते आयें हैं। प्रत्येक घर के धार्मिंक स्थानों में पूर्वजों को देवताओं के बीच स्थान दिया जाता है तथा सभी धार्मिक पूजा के समय अन्य देवी देवताओं के साथ पूर्वजों को भी याद किया जाता है तथा निर्धारित विधि – विधान से उन्हें प्रसन्न किया जाता है ताकि हानि नहीं हो। इनके द्वारा प्रकृति की भी पूजा की जाती है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी आदि सर्वशक्तिमान होते हैं। अन्य जनजातियों की तरह सूर्य को सिंगबोंगा को सर्वशक्तिमान भगवान मानते हैं। कोरवा जनजाति को लोग जिन देवी देवताओं में विश्वास रखते हैं उनमें कुछ नाम निम्नलिखित हैं पारलौकिक शक्तियों का नाम पूजने का उदेश्य सूर्य सभी भलाई के लिए इंद्र वर्षा के लिए जिसे अच्छा फसल हो धरती माय अच्छे फसल के लिए महादेव पार्वती पूरे समुदाय के भलाई के लिए डीहवा या गंवलेह गाँव के भलाई के लिए रक्सेल गाँव तथा मवेशी के भलाई के लिए दरहा खराब पारलौकिक शक्ति से बचाव हेतु चाँड़ी परिवार की भलाई हेतु सोखा परिवार की भलाई हेतु गोरेया परिवार की भलाई हेतु सतबहीनी परिवार की भलाई हेतु पारलौकिक शक्तियों को प्रसन्न करने का काम बैगा का है जो गाँव का पुरोहित का काम करता है। बैगा, कोरवा जनजाति का भी तथा अन्य जनजाति का भी हो सकता है। गाँव में जो जनजाति पहले आ कर बसा था, नियमत: उसी जनजाति से बैगा होता है। अच्छे पारलौकिक शक्तियों के साथ – साथ उनके भौगोलिक वातावरण में कई दुष्ट पारलौकिक शक्तियां भी होती हैं जिन्हें प्रसन्न करना उतना आसान नहीं होता है। इन्हें बैगा भी प्रसन्न करता है या अधिकांशत: डायन द्वारा ये ज्यादा प्रसन्न होते है। इन दुष्ट पारलौकिक शक्तिओं के कुछ नाम निम्नलिखित हैं – रैइया चकरे बईमत सुईया बईमत रैइया पंजी बाल कुँअर बाल साधक बाल टिंगा मुरखोरी भूत दाहा डाकिन ब्रह्मा पिचाश बरम डाकिनी हरसंधारिन दानों मारी भवानी डायन का समाज में अच्छा स्थान नहीं है। लोगों का विश्वास है कि इनके द्वारा ज्यादा नुकसान ही पहूंचाया जाता है। डायन की शक्ति, उनके आँख में या जीभ में होता है। लोगों का विश्वास है कि किसी भी नुकसान को पहूँचाने के लिए इन्हें कुछ विशेष नहीं करना पड़ता है, सिर्फ देख लेने से किसी की छति हो जाती है। कोई – कोई डायन, यदि किसी फसल को नुकसान पहूंचाना चाहती है, तो सिर्फ उसका यह बोलना ही काफी है कि काश, यह फसल मर जाता और वह फसल नष्ट हो जाता है। डायन के प्रति इनका आक्रोश होता है कि यदि यह पता लग जाये की किसी की मृत्यु या किसी का नुकसान किसी डायन के चलते हुआ है तो उस डायन को मारा पीटा जाता है और कभी – कभी तो उसे जान से भी मार दिया जाता है। कोरवा जनजाति के लोग वर्ष भर में कई पर्व त्यौहार मनाते हैं। यह प्रयास किया जाता है कि परंपरागत विधि – विधान से पूजा करके पारलौकिक शक्तियों को प्रसन्न रखा जा सके ताकि गाँव का, उनका स्वयं तथा सभी लोगों का भलाई हो। कुछ पर्व त्यौहार निम्नलिखित हैं – चैतनवमी पूजा यह चैत माह में मनाया जाता है। इसे प्रत्येक परिवार द्वारा तथा गाँव के तरफ से बैगा द्वारा मनाया जाता है। इस पूजा को हिन्दू पड़ोसियों के प्रभाव में आकर मनाया जाता है। गाँव के देवी स्थान में गाँव के सभी लोगों के लोग पूजा करने जाते हैं जहाँ बैगा द्वारा देवी को आटा की रोटी चढ़ाया जाता है तथा उनसे गाँव के भलाई के लिए प्रार्थना की जाती है। प्रत्येक परिवार के मुखिया द्वारा भी इस दिन घर के धार्मिक स्थल में पूजा की जाती है तथा देवी को प्रसन्न करने के लिए मुर्गा चढ़ाया जाता है। सरहुली पूजा बैशाख माह में मनाया जाता है। बैगा द्वारा यह पूजा किया जाता है। जब तक यह पूजा नहीं हो जाती, कोई हल नहीं छूता है इस दिन कोरवा लोग अपने समर्थ के अनुसार खाना खाते हैं, हड़िया पीते हैं तथा जहाँ उनके देवता गंवहेल का निवास स्थान होता है, वहां रात भर जदूरा नृत्य करते हैं। यह पूजा गाँव, परिवार तथा अच्छे फसल के लिए किया जाता है। कर्मा पूजा भादो माह में इसे अन्य जनजातीय की तरह मनाया जाता है। इसे परिवार के भलाई के लिए मनाया जाता है। परिवार के अविवाहित लड़कियों द्वारा जंगल से करम डाल लाया जाता है जिसे घर के आंगन में गाड़ दिया जाता है। उनका विश्वास है कि बहुत वर्ष पहले किसी परिवार में सात भाई थे। एक दिन ये सातो भाई जब खेत में काम कर रहे थे तो उनकी पत्नियों ने आंगन में स्वत: उग आये एक करम डाल को देखा जिसे देखकर ये महिलाऐं खुशी से वहां पर नाच गाने लगी। नाचने गाने में वे अपने पतियों को खाना पहूंचाना भूल गई। बढ़ा भाई जब घर में आया तो सभी महिलाओं को नाचते हुए देखकर गुस्से करम डाल को उखाड़ कर फेंक दिया। करम डाल स्वयं वहां से किसी नदी में जाकर बह गई। उसी दिन इस परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होते गई। अंत में जब उन्हें यह पता चला कि उनके हालत करम रानी को अप्रसन्न करने के कारण हुई है, तो ये सातो भाई करम रानी की खोज में निकल पड़े तथा उन्हें मनाकर घर ला कर पुन: आंगन में आदर से स्थान देकर, विधिवत पूजा किया तथा रात भर वहां नाच गान किया। दुसरे दिन करम रानी को आदर पूर्वक पास के जलस्रोत में विसर्जन कर दिया गया। इनका विश्वास है कि उसी दिन से कोरवा लोग अच्छा से रहते हैं। कोरवा जनजाति के लोगों ने बतलाया की वे अपने परंपरागत देवी देवीताओं को पर्व त्योहारों के समय पूजा करते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी उनकी आर्थिक दशा ख़राब होती जा रही है। भगवान शायद उनकी परीक्षा ले रहा है जब इस परीक्षा में वे सफल हो जायेंगे तो उनकी आर्थिक स्थिति स्वत: खुशहाल हो जायेगा। राजनीतिक संगठन छोटानागपुर के जनजातीय लोगों की तरह कोरवा जनजाति की अपनी जाति पंचायत है जिसका मुख्य कार्य परंपरागत सामाजिक प्रथाओं का पालन करवाना है। शत – प्रतिशत कोरवा स्त्री अपने समाज में रहकर, इन प्रथाओं से परिचित होती है। ये सामाजिक प्रथाएँ पीढ़ी – दर – पीढ़ी चलती रहती है और इन प्रथाओं को जन – मत प्राप्त होने के कारण कोई भी इसे तोड़ने का हिम्मत नहीं करता क्योंकि वे जानते हैं कि इसे तोड़ने से समाज द्वारा अर्थात जाति पंचायत द्वारा उन्हें दंडित किया जाएगा। सामाजिक दंड कर डर उनके व्यवहार को नियंत्रण में रखता है और यही कारण है कि कोरवा समाज आज अन्य लोगों के समाज की तरह व्यस्थित है। शत – प्रतिशत कोरवा सूचक जो आज जातियों तथा जनजातियों के संपर्क में हैं, इस बात से अवगत हैं कि सरकार क्या है। इन लोगों को ये पता है कि सरकार द्वारा जिस कानून बनाया जाता है और जिसे तोड़ने पर सरकार द्वारा दंड दिया जाता है, उसी तरह उनकी जाति – पंचायत भी अपने जाति के बीच बड़ा ही महत्व का है। इन लोगों ने आगे बतलाया के परंपरागत प्रथाएँ लिखित तो नहीं हैं लेकिन शायद ही ऐसा कोई कोरवा स्त्री पुरूष होगा जिसे सामजिक प्रथाओं या विधान के बारे में पता नहीं हो। इन प्रथाओं का इनलोगों द्वारा उसी तरह पालन किया जाता है जिस तरह सरकार द्वारा बनाई गई कानूनों का पालन करना होता है। इनके परंपरागत प्रथाओं को यदि हम विधान के नाम से भी संबोधित करें, तो गलत नहीं होगा। कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक विधान का उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है जिससे यह पता चलेगा कि कोरवा समाज किस वजह से व्यवस्थित है। यौन संबंध सामाजिक कानून – सामाजिक प्रथा या कानून के अंतर्गत, अपने जाति के बाहर के साथ, बड़े भाई का पत्नी, पति के बड़े भाई, पत्नी की बड़ी बहन तथा भाई - बहन के बीच यह संबंध वर्जित है। जैसे जैसे कोरवा स्त्री – पुरूष बड़े होते हैं, उनके मन में यह बैठा दिया जाता है कि यदि इस सामाजिक कानून कोई तोड़ेगा तो भगवान तो उसे सजा देगा ही, उसे समाज द्वारा भी बहिष्कार किया जाएगा। दंड के इस प्रावधान से इन नियम को तोड़ने का साहस किसी के द्वारा कम ही किया जाता है। सम्पति कानून – वंश, पिता के नाम से ही चलता है क्योंकि इनका समाज पितृसत्तात्मक है। अत: संपति पर स्त्रियों का दावा नहीं होता है। विधवा स्त्रियाँ सिर्फ गुजारा के ही हक़दार होती है। अविवाहित लड़कियों की शादी जब तक नहीं हो जाती है तब तक पिता के घर में जीवन – निर्वाह के लिए दावेदार होती हैं। जमीन को लड़कों के बीच बराबर बांटा जाता है लेकिन इसे पिता के मृत्यु के बाद ही किया जाता है। इनके यहाँ घर दामाद की भी प्रथा है जिसके अनुसार शादी के बाद, एक कोरवा युवक अपनी पत्नी के घर में रहता है तथा जीविका के लिए, उसे अचल सम्पति में से कुछ हिस्सा दिया जाता है। जिसे कोरवा दंपति को सन्तान नहीं होता, वे किसी बच्चे को गोद ले सकते हैं। सामाजिक कानून के अंतर्गत, गोद की प्रथा को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। ऐसे गोद लिए हुए बच्चे को अचल संपति पर अधिकार है। जब किसी भी सामाजिक कानूनों को तोड़ा जाता है तो इसे जाती पंचायत के पास न्याय के के प्रस्तुत किया जाता है। जाति पंचायत के प्रधान जिसे महतो के नाम से जाना जाता है, न्याय करने के लिए पंचायत के बैठक के लिए तिथि निर्धारित करता है जिसकी सूचना कहतो द्वारा सभी को दे दी जाती है। निर्धारित तिथि के दिन पंचायत की बैठक में जाति के सभी वयस्क पुरूष भाग लेते हैं तथा पंचायत में दोनों पक्षों को अपना पक्ष प्रस्तुत किया जाता है और गवाह ईश्वर का नाम लेकर यह शपथ लेता है कि यदि वह असत्य कहेगा तो ईश्वर उसे दंडित करेगा। दोनों पक्षों को सुनकर महतो द्वारा उपस्थित कोरवा पुरूषों से विचार – विमर्श किया जाता है तथा जनमत के अनुसार न्याय किया जाता है। दंड के रूप में जाति – बहिष्कार किया जाता है, कोड़े से मारने का हुक्म दिया जाता है या पांच रूपया से सौ रूपया रूपया तक दंड दिया जाता है। शत – प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया कि जब तक वे एकांत में रहते थे, बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं था इनकी जाति – पंचायत बड़ा ही प्रभावी था। लेकिन जैसे – जैसे सम्पर्क बढ़ता गया तथा स्वतंत्रता के बाद सरकारी पंचायत की स्थापना एवं सरकारी पंचायत के गठन के लिए चुनाव आदि व्यवस्थाओं से इनकी जाति पंचायत काफी प्रभावित हुआ है। कोरवा लोग का सभी काम सहयोग पर आधारित था, सभी का विचार एक था, सभी कामों में एक मत होता था। लेकिन सरकारी पंचायत ने इनकी एकता को प्रभावित किया है। लेकिन साथ ही राजनैतिक चेतना को बढ़ाकर इनके व्यक्तित्व को विकसित भी किया है। पंचायत तथा विधानसभा एवं लोक सभा चुनाव के समय, कोरवा स्त्री – पुरूष जिनका बोटर सूची में नाम है, उनका राजनैतिक महत्व बढ़ जाता है। पूरे गाँव के कोरवा, विभिन्न राजनैतिक दल अर्थात कोई कांग्रेस तथा कोई जनता दल तथा कोई भारतीय जनता पार्टी आदि के तरफ से चुनाव में भाग लेते हैं। विभिन्न दलों के सदस्य होने के नाते, इनके विचारों में एकरूपता का अभाव होने लगा है। संपर्कता तथा सरकार द्वारा चुनाव व्यवस्था से इनके बीच राजनैतिक जागृति आई है। यह एक शुभ लक्षण है लेकिन साथ ही यह सही है कि इनकी अपनी जाति पंचायत आज उतना प्रभावी नहीं रह गया है जितना पहले था। परन्तु सर्वेक्षण के आधार पर उतना प्रभावी नहीं रहा गया है जितना प्रथाओं का उल्लंघन करने का हिम्मत आज भी शायद ही कोई करता है और जाति पंचायत अर्थात समाज के बड़े - बूढ़े लोगों का नियंत्रण अभी भी उतना कम नहीं हुआ है और आज भी इन्हीं के द्वारा परम्परागत विधानों को बड़े होते बच्चे को सिखलाया जाता है। परिवर्तन अन्य जनजातियों की तरह कोरवा संस्कृति के मूल - संस्कृति में भी परिवर्तन हो रहे हैं। इनकी मूल – संस्कृति में जो परिवर्तन हो रहा हैं, उसके कई कारण हैं। प्रमुख कारणों के विश्लेषण करने पर निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है – संस्कृति संपर्क जब एक से ज्यादा समाज के लोग आपस में संपर्क में आते हैं तो एक दूसरे के समाज पर प्रभाव पड़ता है। पर संस्कृति ग्रहण की इस प्रक्रिया के फलस्वरूप ही कोरवा के मूल संस्कृति में कुछ – कुछ परिवर्तन हुए हैं। शत – प्रतिशत कोरवा सूचकों ने बतलाया की वर्षों पहले उनके पूर्वज जब पलामू में आकर बसे थे तो उस समय इनका निवास स्थान जंगलों से ढंका हुआ था और आने – जाने की सुविधाएँ शून्य थी। एकांत में जब अनेक पूर्वज रहते थे तो इनकी मूल संस्कृति अछूती थी। सूचकों ने आगे बतलाया कि जैसे – जैसे उनके निवास स्थान के आसपास अन्य हिन्दू जातियों के लोग बसने लगे, कोरवा और हिन्दू जातियों के बीच संपर्कता बढ़ती चली गई और उसी का परिणाम है कि कोरवा और हिन्दू जातियां आपस में एक – दूसरों के संस्कृतिक विशेषताओं को ग्रहण कर रहे हैं। इसी संपर्कता के फलस्वरूप कोरवा जनजाति के व्यक्तित्व में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। परिणामत: आज का कोरवा पहले की तरह शर्मीला नहीं है। आज वे किसी को देखकर जंगल में जाकर छिप नहीं जाते हैं। बल्कि सरकारी कर्मचारियों से, पड़ोसियों से तथा बाहर से आने वाले मेहमानों से खुलकर सभी विषयों पर बातचीत करते हैं। अपने पड़ोसियों हिन्दू जातियों के संपर्क में आकर इनकी संस्कृति पर हिन्दूओं का प्रभाव पड़ा है। कल्याणकारी योजनाएं स्वंतत्रता के बाद से ही सरकार द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है कि इनके लिए विकास का कार्यक्रम चलाकर इनकी गरीबी को दूर किया जाए। आने – जाने अर्थात सड़क आदि की सुविधाएँ पर विशेष बल दिया गया है तथा आज अधिकांशत: कोरवा गांवों में पैदल तो जाया ही जा सकता है। कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि कुछ ऐसी प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं हैं जिसके द्वारा इनकी मूल – संस्कृति प्रभावित हुई है। जहाँ तक कल्याणकारी योजनाओं के संबंध हैं, यह कहना शायद असत्य न होगा कि संपर्कता के कारण उनका झुकाव परिवर्तन की ओर है। अधिकांशत: कोरवा सूचकों ने बतलाया कि सरकार द्वारा संचालित सभी योजनाएं यदि सही रूप से चलाया जाए तो उनकी गरीबी स्वत: समाप्त हो जाएगी। लेकिन सरकार में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनके भ्रष्ट व्यवहार के फलस्वरूप विकास पर दी गई शत - प्रतिशत राशि इन तक नहीं पहुँच पाती है। कोरवा सूचकों के इस मत से कोई भी वह व्यक्ति असहमत नहीं होना चाहेगा जिसे आज की स्थिति का सही ज्ञान है। सरकार द्वारा जो योजनाएं बनाई जाती है, वह काफी महत्व का है। यदि आवंटित राशि का 50 प्रतिशत राशि भी सही रूप से कोरवा तक पहुँच पाए तो कोरवा जनजाति के लोग गरीबी रेखा से कब ही उपर चले जाते। अभी भी देर नहीं हुआ है। आज भी कोरवा के विकास के लिए सरकार के पास पैसे की कमी नहीं है। आज जरूरत इस बात की है कि ऐसे पदाधिकारी जिनके हाथ में शक्ति है, कोरवा विकास योजनाओं का निरीक्षण बिना पूर्व सूचना के किया करें। इससे यह लाभ होगा कि यह पता चल सकेगा कि योजना सही रूप से चलाई जा रही है या नहीं। उदाहरण के लिए शिक्षा योजना को ही लें। पहाड़ों एवं जंगलों में जो स्कूल चल रहे हैं, वह महीने भर में कुछ ही दिन चलते हैं शिक्षक अधिकतर गायब रहते हैं। यदि उच्च पदाधिकारियों द्वारा बिना पूर्व सूचना का निरीक्षण किया जाए तो शिक्षकों के बीच भय उत्पन्न होगा और जब भय होगा तो स्कूल स्वत: सही रूप से चलने लगेगा। शिक्षा योजना की जब बात चली है तो इस संबंध में उल्लेखनीय है कि 1981 जनगणना का आंकड़ा जो उपलब्ध हैं, वह उत्साहवर्द्धक नहीं है। इस आंकड़े से यह पता चलता है कि 86 कोरवा मिडिल, 60 कोरवा मैट्रिक, 5 कोरवा ने हायर सेकेंडरी तथा 2 कोरवा लोगों ने तकनीकी डिप्लोमा पास किया है। इन आंकड़ों से कोई भी शायद ही प्रभावित होगा क्योंकि कोरवा क्षेत्रों में वर्षो से स्कूल चल रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही जनजातीय क्षेत्रों में स्कूल चलाए जा रहे हैं। संपर्कता के चलते इनका झुकाव शिक्षा की ओर बढ़ रहा है। स्नातक डिग्री प्राप्त करने में लगभग 15 वर्ष लगते हैं। स्वतंत्रता के बाद यदि 100 कोरवा बच्चों की भी जिम्मेदारी हम ले लेते या इसी जिम्मेदारी नीति के अंतर्गत कोरवा बच्चों को सही मार्गदर्शन देने वाला कोई विकास पदाधिकारी होता है तो आज कई कोरवा स्नातक होते, इन्हें अच्छी नौकरी मिलता तथा इनके परिवार की गरीबी स्वत: समाप्त होती। अत: यह आवश्यक है कि विकास योजनाओं को सही रूप से चलाने के लिए एक उच्च स्तरीय मोनिटरिंग सेल तथा मूल्यांकन सेल का गठन किया जाए अन्यथा विकास कार्यक्रमों का सही लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा। इस पर दो मत नहीं है कि सभी विकास योजनाओं का उद्देश्य अच्छा है, विकास कार्यक्रमों को चलाने के लिए पैसे की कमी नहीं है। अत; हमें यह देखना है कि अधिकांश राशि योजनाओं पर ही खर्च हो और तभी ही योंजनाओं का लक्ष्य सही रूप से प्राप्त किया जा सकता है अर्थात कोरवा को गरीबी रेखा से उपर लाने में हमें सफलता मिलेगी। स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार