भूमिका संथाल भी मुंडा कुल से ही आते हैं। यह आग्नेय परिवार का सबसे बड़ा अंग है। भाषा-संस्कृति पर्याप्त समानताओं के होते हुए भी इनमें मौलिक भेद है। नृत्य संगीत में किंचित परिवर्तन स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इनके नृत्य भी सालों भर ऋतु परिवर्तन के साथ पर्वों उत्सवों के अनुसार चलते रहते हैं। मात्र सावन भादों के महीने कृषि कर्म की व्यवस्तता के कारण नृत्य संगीत बंद रहता है। इनके मुख्य नृत्य हैं - डाहरा, दोड़ा, दोंगेड, आषाढ़िया, शिकारी, दसंय, सोहराई दोसमी, सकरात आदि। इनके नृत्य भी आकर्षक सुंदर, मनोहारी और दिलकश होते हैं। डाहार नृत्य इसे लांगड़े नृत्य भी कहा जाता है। यह माघ महीने का नृत्य है। माघ बांगा पर्व के अवसर पर इसे नाचा जाता है। पूजा के निमित्ता किसी भी स्थल का चयन किया जा सकता है। इस नृत्य के मुख्य वाद्य हैं मांदर, नगाड़ा, (टमक) तुरही, ढांक, चोड़चोड़ी, घंटी आदि। महिला-पुरुष दोनों सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं। यह नृत्य गांव के अखरा में ही संपन्न होता है। बाहा नृत्य फाल्गुन महीने में डाहार या लांगड़े नृत्य होता है। यह बाहा पर्व (सरहुल) के उपलक्ष्य में किया जाता है। स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से इसमें भी नृत्य करते हैं। इसका नृत्यस्थल जाहेर या सरना होता है। इसमें भी उपर्युक्त वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है। डाहार का बाहा नाच में महिलाओं का तथा बाहादोन नृत्य पुरुष वर्ग का नृत्य होता है। लांगड़ी गीत सदैव अखरा में ही होता है। दोहा नृत्य इस दाराम दा: नृत्य कहते हैं। यह वैशाख् महीने में विवाह संस्कार के समय का नृत्य-संगीत है। जिसके घर में शादी होती है उसे के आंगन में यह नृत्य-संगीत चलता है। वही वाद्य यंत्र इसमें भी बजाए जाते हैं। वर तथा कन्या दोनों के आंगन में विवाह संपन्न होने तक नृत्य चलता रहता है। इसमें टोका चाल, वरयात, दाराम: दा: सिंदरदान के गीत चलते हैं। दोंगेड़ नृत्य यह पूर्णत: पुरुष प्रधान नृत्य है। सामूहिक रूप में शिकार के अवसर पर जंगल की तराई में नृत्य-संगीत संपन्न करते हैं। इसमें भी तीव्र वाद्य यंत्र का उपयोग होता है। नृत्य के पूर्व पर्वतों पर पुरोहितों द्वारा पहले पूजा की जाती है। यह जेठ मास का नृत्य है। इसी अवसर पर सिगराई नृत्य भी पुरुष वर्ग द्वारा तीन चार की संख्या में चलता है। आषाढ़िया नृत्य आषाढ़ मास में जाहेर स्थल पर तीव्र वाद्य यंत्रों द्वारा पारंपरिक रूप में लांगड़े संगीत द्वारा नृत्य होता है। शिकारी नृत्य भादो मास के अंत में किसी वृक्ष के नीचे निश्चित तिथि को तीव्र पारंपरिक वाद्य के साथ केवल पुरुष वर्ग द्वारा शिकारी नृत्य-संगीत चलता है। इस जानताड़ा पर्व के अवसर पर नाचा-गाया जाता है। दसंय नृत्य दशहरे के अवसर पर गुरू-गृह में गुरू-चेलों के मध्य यह नृत्य होता है। मूल यह मात्र विद्या का सिध्दि प्राप्ति के प्रशिक्षण अवसर का नृत्य संगीत है। इसमें भुआड़, नगाड़ा, ढांक, तरहो, बांसुरी, बनम आदि का बजना अनिवार्य होता है। इस नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता है कि पुरुष वर्ग ही इस महिलाओं के आभूषण-वेशभूषा धारण कर नृत्य करते हैं। सोहराय नृत्य यह मूलत: मवेशियों के लिए मनाया जाने वाला त्योहार के समय का नृत्य है। गाय तथा गोशाले में इसमें पूजा होती है। गांव के चौराहे तथा घर के आंगनों में मांदर, नगाड़ा (टमक) घंटी, ढांक आदि बजा कर नृत्य किया जाता है। महिलाओं चुमावड़ी गीत गाती हैं। इस नृत्य के अवसर पर तो पुरुष गाय जमाव गी बाते हैं और नाचते हैं। इस अवसर पर स्त्रियां और पुरुष सामूहिक रूप से गाय जगाव तथा लांगड़े नृत्य-संगीत प्रस्तुत करते हैं। छोसमी नृत्य यह अगहन के महीने में नाचा जाता है। इसका नृत्यस्थल जाहेर होता है। इसमें मांदर, घंटी, नगाड़ा, टमक आदि बजते हैं। इसमें भी लांगड़े गीत गाया जाता है तथा वैसे ही नृत्य प्रस्तुत होता है। सकरात नृत्य पूस मास में अपने-अपने घर के चौखट पर पूजा करने के उपरांत मांदर, नगाड़ा, टमक, घंटी आदि के साथ पुरुषों द्वारा ही घर-घर जाकर नृत्य किया जाता है। अखरा में भी वृत्ताकार सामूहिक रूप से एक दूसरे से जुड़ कर स्त्री-पुरुष नृत्य करते हैं। संताली के नृत्य गीत महिलाओं से किंचित भिन्न होते हैं। किसी-किसी नृत्य में महिलाएं एक दूसरे के हाथों से मुट्ठी जोड़ कर मात्रा हाथों को हिलाते हुए साधे कदमों की विशेष चाल पर वृत्ताकार घूमते हुए नृत्य करती हैं। किसी-किसी नृत्य में नाचने वाले गीत नहीं गाते, मात्र बाजा बजाता है। संताली नृत्य के पद संचालन कलात्मक होते हैं। इनकी वेशभूषा भी कलात्मक होती है। कभी नृत्य में ये घूमते: उछलते, कभी जुड़ते, कभी टूटते हैं। कई-कई मुद्राओं में हर गति के नृत्य ये करते हैं। इनके नृत्य संगीत में अजब आकर्षण होता है। ये नृत्य बरबस लोगों को अपनी ओर खींच लेते हैं। स्रोत व सामग्रीदाता: संवाद, झारखण्ड