<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify; ">परिचय</h3> <p style="text-align: justify; ">बिहार का इतिहास हमेशा गौरवशाली रहा है और बिहारवासियों में राष्ट्रीयता की भावना किसी न किसी रूप में हमेशा विद्यामान रही है। प्राचीन काल से ही बिहार सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक चेतना का केंद्र बिन्दु रहा है। सन 1857 ई. की क्रांति जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, उसमें बिहार का प्रमुख योगदान रहा है। इस क्रांति की प्रथम चिनगारी प्रज्वलित करने वाला सिपाही मंगल पाण्डेय बिहार का ही निवासी था। इसी प्रकार सन 1857 की क्रांति में बिहार के बाबू कुँवर सिंह तथा उनके अनुज बाबू अमर सिंह, ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय, बिरसा मुंडा, शेख भिखारी नीलांबर – पीतांबर एवं टिकैत उमराँव सिंह आदि ने अपने – अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व परिचय दिया। सन 1887 ई. की क्रांति में सभी वर्गों का सहयोग प्राप्त था। यहाँ कई छोटे – छोटे राज्य थे कभी स्वतंत्र रह चुके थे। अन्य क्षेत्रों की तरह छोटानागपुर भी अंग्रेजों के राजनैतिक, आर्थिक एवं धार्मिक शोषण के कारण भीतर ही भीतर सुलग रहे थे। इस मौके पर उन्हीं राजाओं ने तत्कालीन विक्षुब्ध परिस्थिति का लाभ उठाना चाहा, फलस्वरूप देश में विद्रोह का शंखनाद होते ही यह क्षेत्र जाग उठा। सलगी हजारीबाग के लाल जगतपाल सिहं कुँवर सिंह के जितने भी संबंधी थे उन्होंने पूरे झारखंड क्षेत्र में उनके संदेश – पत्रों का प्रसार किया। इधर ठाकुर विश्वनाथ शाही, पाण्डेय गणपत राय, रामगढ़ बटालियन के जमादार माधो सिंह, डोरंडा बटालियन के जयमंगल पाण्डेय अदि ने सुनियोजित ढंग से विद्रोह संचालन की गुप्त मंत्रणा की, जगह – जगह के लोग जी जान से मदद करने के लिए आतुर थे ही, सिल्ली, झालदा से देशी बंदूकें बन – बन कर आ रही थी। योजना अनुसार झारखण्ड क्षेत्र से अंग्रेजों को नेस्तनाबूद करे विद्रोही कुँवर सिंह से जा मिलेंगे।</p> <h3 style="text-align: justify; ">जीवनी</h3> <p style="text-align: justify; ">अमर शहीद पाण्डेय गणपत राय का जन्म सन, 1809 ई. में हुआ था। इनके जन्म स्थान के संबंध में एक मत नहीं है। प्राप्त साक्ष्य के अनुसार पाण्डेय तारकेश्वरनाथ राय के द्वारा इनका जन्म लोहरदगा के भंडरा थाना अंतर्गत भौरा नामक गाँव में हुआ था, जबकि सिद्धनाथ दूबे के अनुसार वर्तमान गुमला के पालकोट थाना अंतर्गत खूखरा परगना के पतिया ग्राम में हुआ था पाण्डेय गणपत राय के पिता का नाम रामकिशनु राय एवं चाचा का नाम सदाशिव राय था। सदाशिव राय (छोटानागपुर महाराजा) पालकोट गुमला में दीवान थे। पाण्डेय गणपत राय बचपन में अपने चाचा सदाशिव राय के साथ रहते थे यहाँ दरबारी पंडित एवं मौलवियों से हिंदी एवं अरबी की शिक्षा मिली थी।</p> <p style="text-align: justify; ">इन दरबारी पंडित एवं मौलवियों से शिक्षा के साथ – साथ दरबारी रीति रिवाजों से भी परिचित होने का अवसर मिला, फलस्वरूप पाण्डेय गणपत राय बचपन से ही समा चतुर एवं मेधावी स्वभाव के थे। इनका व्यक्तित्व प्रखर था तथा शासन करने की कला भी मालूम थी।</p> <p style="text-align: justify; ">एक बार की घटना है कि 15 - 16 वर्ष के उम्र में पाण्डेय गणपत राय अपने चाचा के साथ गया जिला के गदवा गांव में बारात गये थे। तत्कालीन रीति रिवाज के अनुसार बारात आगमन के पश्चात जनवासे में प्रश्नोत्तरी हुआ करती थी। पाण्डेय गणपत राय के स्वभाव से लोग पूर्व परिचित थे इसलिए बारात में जनवासे में प्रश्नोत्तरी के समय बारातियों ने पाण्डेय गणपत राय को आगे बढ़ा दिया। प्रश्नोत्तरी समाप्त हुआ और पाण्डेय गणपत राय की तर्क वितर्क को देखकर लड़की वाले अधिक प्रभावित हुए तथा इन्हें शादी करने के लिए विवश करने लगे। बात यहीं समाप्त नहीं हुई बल्कि इन्हें शादी करने के लिए तैयार होना पड़ा। परिणामत: तत्काल उनका तिलक एवं उसी रात उसी मंडप में विवाह भी संपन्न हो गया। जो पाण्डेय गणपत राय एक बाराती बनकर गये थे। दुसरे दिन अपनी दुल्हन के साथ लौटे।</p> <p style="text-align: justify; ">भाग्यवश पाण्डेय गणपत राय की पहली पत्नी से कोई संतान नहीं हुई। इस निराशा भरी जिन्दगी में इन्हेंक पत्नी से प्रेरणा मिली और सन 1837 ई. में इन्होंने सुगंध कुँवर से दूसरी विवाह की। सुगन्ध कुँवर पलामू जिला के बगलाडीह करार गाँव के श्री मोहन सिंह की पुत्री थी। सुगंध कुँवर के दो पुत्र एवं तीन पुत्रियाँ हुई। पाण्डेय गणपत राय के बड़े पुत्र का नाम नवाब एवं छोटे श्वेताभ रखा गया था। नवाब का कुछ ही समय बाद बचपन में ही मृत्यु हो गई थी इसलिए पाण्डेय गणपत राय अपने छोटे पुत्र श्वेताभ पर विशेष ध्यान देने लगे।</p> <p style="text-align: justify; ">कुछ समय बाद सदाशिव राय की मृत्यु हो गई। उसके बाद पाण्डेय गणपत राय को (छोटानागपुर) पालकोट गुमला के दीवान बनने का अवसर मिला पाण्डेय गणपत राय दीवान बनने के बाद अपने जमींदारी का मुख्यालय वर्तमान गुमला जिला के पालकोट थाना के अंतर्गत ग्राम पतिया में बनाये। इसका परिवार अपने सुविधा के अनुसार पतिया एवं कभी भंडरा (लोहरदगा) के भौरों गाँव में रहते थे। दीवानी मिलनी के बाद पाण्डेय गणपत राय की ख्याति और बढ़ गई थी जिससे दोस्त और दुश्मन दोनों बढ़ गये थे। इन्हीं दोस्त और दुश्मनों में से कुछ लोग पाण्डेय गणपत राय के अंत के कारण बने। पाण्डेय गणपत राय का सरल स्वभाव एवं मिलनसार होने के कारण साधारण लोग भी इनसे मिलने में थोड़ा भी भय एवं संकोच नहीं रखते थे। इनका रहन सहन एवं सरल स्वभाव होते हुए भी प्रशासनिक तौर पर काफी दबदबा रहता था क्योंकि इनका बचपन अपने दीवान चाचा के साथ गुजरा था और अपने चाचा के प्रशासनिक कार्यों को देखने का अवसर मिला था। पाण्डेय गणपत राय का शारीरिक संरचना साधारण, एकहरा बदन, सांवला रंग, औसत कद पर उसकी धोती, कुर्ता, टोपी एवं शालीमशाही जूते खूब फबते थे। हाथ में छड़ी लेकर जब घुमने निकलते थे तो उनके साथ उनकी पालकी एवं सोलह कहार भी साथ चलते थे। अथार्त सरल स्वभाव होने के बाद भी पाण्डेय गणपत राय को अस्त व्यस्त रहन सहन बिल्कुल पसंद नहीं था। छोटी छोटी बातों का भी वे ख्याल रखते थे। इन सभी कार्यों के अतिरिक्त अपने परिवार की देखभाल पर विशेष ध्यान दिया करते थे।</p> <h3 style="text-align: justify; ">आन्दोलन में सक्रियता</h3> <p style="text-align: justify; ">इस प्रकार समय बीतता गया और 1877 ई. भी आ गया। 10 मई 1857 ई. को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली गोली चली थी, जो धुआं की तरह बवंडर बनकर सारे देश में फैली तो बिहार का झारखण्ड क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। मातृभूमि की आजादी के लिए एस क्षेत्र के भी कितने सपूतों ने अपनी कुर्बानी दे दी। इनमें कुछ लोग अपने अपने क्षेत्र का नेतृत्व किया और कुछ लोग उनके नेतृत्व में क्रांति के लिए सहयोग किया। अतः एस पहला स्वतंत्रता संग्राम में इन सपूतों का योगदान कम नहीं रहा है क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात 1857 की क्रांति से ही होता है। यह बात सत्य है कि लगभग 100 वर्षों के बाद ही देश आजाद हुआ। तत्कालीन छोटानागपुर क्षेत्र से एस क्रांति का नेतृत्व बद्कागढ़ स्टेट के स्वामी ठाकुर विश्वनाथ पाण्डेय गणपत राय कर रहे थे। 30 जुलाई 1857 ई. को आठवीं देशी सेना ने हजारीबाग में विद्रोह कर दिया और 1 अगस्त को डोरंडा छावनी (रांची) में सेना ने विद्रोह का बिगुल फूँक दिया और 2 अगस्त को पूरा रांची विद्रोहियो के अधिकार में आ गया था। अतः बीस दिनों तक रांची का शासन विद्रोहियो के हाथ में था। एस विद्रोह में असफलता के कारण छोटानागपुर का कमिश्नर डाल्टन अपने अधिकारियों के साथ पिठोरिया होते हुए हजारीबाग भाग निकला और हजारीबाग से पुनः बगोदर की तरफ भाग निकला था। विद्रोहियों ने योजनाबद्ध रूप से रांची कचहरी, थाना एवं जेल को लूट लिया था। इस घटनाक्रम के बाद विद्रोहियों के बीच नेतृत्व का अभाव था जिसका नेतृत्व ठाकुर विश्वनाथ शाही ने किया और उनके सेनापति के रूप में पाण्डेय गणपतराय मिले थे। अतः बीस दिनों तक रांची का शासन का बागडोर इन्हीं सपूतों के नेतृत्व में विद्रोहियों के हाथ में रहा।</p> <p style="text-align: justify; ">सितंबर के अंत में बाबु कुंवर सिंह से संपर्क करने के उद्देश्य से विद्रोही चंदवा, बालूमाथ होते हुए चतरा(हजारीबाग) आए थे जिसकी सूचना गोरी सरकार को मिल गई थी और 2 अक्टूबर 1857 को मेजर इंगलिश ने गोरी सरकार को पत्र लिखा है कि 2 अक्टूबर को रामगढ़ बटालियन के साथ मेरी कई बार भिडंत हुई, मैंने उन्हें परास्त किया तथा 4 तोप 45 गाड़ी गोली बारुद बरामद किया। इस लड़ाई में मेरे 45 आदमी हताहत हुए। मेरे चारों ओर बागी सिपाहियों और लुटेरों से भरे जंगल है। मैं इस योग्य नें की इतने सामान और घायल के साथ वापस आ सकूं, अतः एक सौ आदमी भेजने की कृपा करें (हजारीबाग ओल्ड रेकडर्स – पृ.10) इस घटनाक्रम के बाद विद्रोही पुनः आक्रमण कर दिए क्योंकि 4 अक्टूबर को मेजर इंग्लिश ने जेनरल मैंसफील्ड को लिखा आज मैंने शहर के पश्चिम में स्थित बागियों में 9 बजे धावा और उनकी छवनी दखल कर ली। यहाँ से मुझे 4 तोप, दस हाथी और बहुत से गोला बारूद मिले। इस लड़ाई में हमलोगों को बहुत सी हानि उठानी पड़ी। 53वीं सेना के 36 और 6 सिपाही हताहत हो गये (हजारीबाग ओल्ड रेकडर्स – पृ. 102) वे दोनों तार अपनी कहानी स्वयं कहते है कि इस लड़ाई में कितना हानि पहुंची होगी।</p> <p style="text-align: justify; ">4 अक्टूबर को हजारीबाग के सहायक कमिश्नर ने एक पत्र कैप्टन डाल्टन को लिखा था, जिसमें उन्होंने इस लड़ाई की चर्चा करते हुए लिखा है – मुझे मालूम पड़ता है की विद्रोहियों ने (कुँवर सिंह के दामाद लाल जगत पाल की सहायता से) कुँवर सिंह से संबंध बना लिया है। ऐसा पड़ता है कि ठाकुर विश्वनाथ शाही और पाण्डेय गणपत राय लड़ाई की आरंभ होते ही भाग गये (हजारीबाग ओल्ड रेकडर्स पृ. 105)। इस प्रकार चतरा में विद्रोहियों को तितर - बितर कर दिया गया और विद्रोहियों के पास से जो भी खजाना था वह अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया। अंतत: विश्वनाथ शाही और पाण्डेय गणपत राय दोनों रांची लौट गये। इस तरह गोरी सरकार के अथक प्रयास के बाद भी ठाकुर विश्वनाथ शाही और पाण्डेय गणपत राय चंगुल में नहीं आ रहे थे। इन दोनों में विद्रोही नेताओं को अपने चंगुल में करने के उद्देश्य से दिसम्बर 1857 में गोरी सरकार इनकी जमींदारी और सम्पति जब्त कर ली। जमींदारी और सम्पति जब्त होने के बाद इन्हें आर्थिक कठिनाईयों का सामना तो अवश्य करना पड़ा फिर भी दोनों जाबांज घबराए नहीं और गोरे शासन के चंगुल में नहीं आये। उपयुक्त घटनाक्रम के बाद क्रांति को आगे बढ़ाने के लिए इन्हें नए सिरे से संगठन करने की आवश्यकता पड़ गई क्योंकि जमींदारी एवं सम्पति सब जब्त कर ली गई थी तथा कई बार गोरे शासन से मुठभेड़ में इनके खजाने एवं अस्त्र लूट लिए गये थे। अत: नए संगठनात्मक कार्य करते - करते मार्च 1857 आ गया। इनके पास लूटपाट दे सिवा पैसा इकट्ठा करने का दूसरा कोई विकल्प नहीं था इसलिए बरवे थाना को लूट लिया गया। लोहरदगा के खजाने को भी लूटने का निश्चय किया गया लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली ठाकुर विश्वनाथ शाही गिरफ्तार कर लिए गये लेकिन पाण्डेय गणपत राय अपने गाँव भौंरों (भंडरा) लौट गये। मेजर नेशन को पाण्डेय गणपत राय की उपस्थिति का पता लग गया था इसलिए 100 सिपाहियों के साथ भौंरों (भंडरा) गाँव पहुँच गया और पाण्डेय गणपत राय के घर को घेर लिया। मेजर नेशन द्वारा घेराबंदी किये जाने के बाद पाण्डेय गणपत राय चरवाहे का भेष धारण कर घर से बाहर निकल गये। मेजर नेशन द्वारा घर के तलाशी के बाद पाण्डेय गणपत राय उसके हाथ नहीं लगे तब वह हाथ मलता हुआ वापस चला गया। इधर पाण्डेय गणपत राय मेजर नेशन के आँखों में धूल झोंक कर 20 1858 को अपनी पुरोहित उदयनाथ पाठक के साथ रातों – रात लोहरदगा की ओर बड़े। रात बिताने के उद्देश्य से वे कैंबो के अपने बडाईक मित्र के घर जाना चाहते थे। रात अँधेरी थी इसलिए वे रास्ते भूल कर कैम्बो के बदले परहेपाट पहुँच गये। परेहपाट में महेश शाही नामक जमींदार थे जो गोरी सरकार के पक्षधर थे। पाण्डेय गणपत राय के पहुँचने के बाद एक तरफ तो इनकी अच्छी खातिरदारी की और दूसरी उनकी उपस्थति का समाचार गोरी शासन लोहरदगा को भेज दिया। पाण्डेय गणपत राय की उपस्थिति का समाचार मिलते ही मेजर नेशन सुबह अपनी गोरी सेना के साथ परेहपाट पहुँच गया और बड़े ही सुनियोजित ढंग से पाण्डेय गणपत राय को गिरफ्तार कर लिया। पाण्डेय गणपत राय की गिरफ़्तारी के बाद 21 अप्रैल 1858 ई. को रांची कमिश्नर डाल्टन ने इन्हें फांसी की सजा सूना दी और उसी दिन रांची पोस्ट ऑफिस के पास कदम के पेड़ पर उन्हें फांसी दे दी गई। ठाकुर विश्वनाथ शाही को भी पांच दिन पूर्व इसी कदम के वृक्ष पर फांसी दी गई थी। यह सूखा वृक्ष संस्थान के संग्रहालय में रखा गया जिसे दर्शक आज भी देख सकते हैं। यह फांसी स्थल वर्तमान में जिला स्कूल रांची के पास शहीद स्मारक के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार छोटानागपुर क्षेत्र से 1857 ई. में क्रांति का नेतृत्व करने वाले ठाकुर विश्वनाथ शाही एवं उनके सेनापति पाण्डेय गणपत राय को फांसी देकर गोरी सरकार राहत की साँस ली। पाण्डेय गणपत राय अपनी विधवा पत्नी, एक विवाहिता एवं दो अविवाहित पुत्री तथा एक मात्र 11 वर्षीय पुत्र श्वेताभ राय को अपने जन्मांध भाई पाण्डेय धणपत राय के पास छोड़ कर सदा के लिए विदा ले ली लेकिन इस क्षेत्र के लोगों को आज भी इनकी कार्यों पर गर्व हैं।<strong></strong></p> <p style="text-align: justify; ">स्त्रोत: जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, झारखण्ड सरकार</p> </div>