परिचय झारखण्ड में प्रचलित वाद्यों का एक प्रकार है सुषिर वाद्य जिसे फूंक कर बजाया जाता है। उनमें आड़बांसी या बाँसुरी, सानाई, सिंगा, निशान, शंख, मदनभेरी आदि शामिल हैं। उनसे धुन निकाली जाती है। उन्हें गीतों के साथ बजाया भी जाता है। झारखण्ड में लोकप्रिय है बाँसुरी सुषिर वाद्यों में बाँसुरी या आड़बांसी झारखंड में सबसे अधिक लोकप्रिय है। डोंगी बांस से सबसे अच्छी बाँसुरी बनायी जाती है। यह बांस पतला और मजबूत होता है। बाँसुरी में कुल सात छेद होते हैं। सबसे उपर वाले छेद में फूंक भरी जाती है। कैसे बनती है बाँसुरी ? बाँसुरी अत्यंत लोकप्रिय सुषिर वाद्य यंत्र माना जाता है, क्योंकि यह प्राकृतिक बांस से बनायी जाती है, इसलिये लोग उसे बांस बाँसुरी भी कहते हैं। बाँसुरी बनाने की प्रक्रिया काफ़ी कठिन नहीं है, सब से पहले बाँसुरी के अंदर के गांठों को हटाया जाता है, फिर उस के शरीर पर कुल सात छेद खोदे जाते हैं। सब से पहला छेद मुंह से फूंकने के लिये छोड़ा जाता है, बाक़ी छेद अलग अलग आवाज़ निकले का काम देते हैं। बाँसुरी की अभिव्यक्त शक्ति अत्यंत विविधतापूर्ण है, उस से लम्बे, ऊंचे, चंचल, तेज़ व भारी प्रकारों के सूक्ष्म भाविक मधुर संगीत बजाया जाता है। लेकिन इतना ही नहीं, वह विभिन्न प्राकृतिक आवाज़ों की नक़ल करने में निपुण है, मिसाल के लिये उससे नाना प्रकार के पक्षियों की आवाज़ की हू-ब-हू नक्ल की जा सकती है। बाँसुरी बजाने की तकनीक बाँसुरी की बजाने की तकनीक कलाएं समृद्ध ही नहीं, उस की किस्में भी विविधतापूर्ण हैं, जैसे मोटी लम्बी बाँसुरी, पतली नाटी बाँसुरी, सात छेदों वाली बाँसुरी और ग्यारह छेदों वाली बाँसुरी आदि देखने को मिलते हैं और उस की बजाने की शैली भी भिन्न रूपों में पायी जाती है। बाँसुरी, वंसी, वेणु, वंशिका आदि कई सुंदर नामो से सुसज्जित है। प्राचीनकाल में लोक संगीत का प्रमुख वाद्य था बाँसुरी। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : संवाद