परिचय बीड़ी बनाने का काम समूचे भारत में फैला हुआ है और इसमें महिलाओं एवं बच्चियां बहुतायत से जुडी हैं। नीति निर्माताओं एवं प्रशासकों का ध्यान अभी तक इस ओर नहीं गया है। लाखों की संख्या में ग्रामीण और शहरी गरीब महिला कामगार अपना परिवार इससे पालती हैं। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में बीड़ी बनाने वाला देश का सबसे बड़ा उद्योग है। जिसमें लगभग २.5 लाख कामगार काम करते हैं। जो कांट्रेक्टर की दया पर जीते है और न्यूनतम मजदूरी से भी कम मेहनाता पाते हैं। गरीब परिवारों में भी 75 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जो सरकारी ग़रीबी रेखा के नीचे आते हैं और जिनकी आय का प्रमुख स्रोत बीड़ी बनाना ही है। हालाँकि इस प्रणाली को गैर क़ानूनी घोषित किया जा चूका है पर फिर भी अभी तक जारी है। लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं इस रोजगार में जुटी हैं जो कांट्रेक्टर द्वारा दिए गए कच्चे माल को घर ले जाती है (या उनके घर माल ठेकेदार द्वारा पहुंचा दिया जाता है) और प्रति दर के हिसाब से कार्य करती है। बीड़ी बनाने की प्रक्रिया सरल है और बहुत कम कौशल की आवश्यकता है अतः कुछ बच्चे एवं अपाहिज लोग भी बीड़ी बनाने का काम करते हैं। समस्त कच्चे माल का उत्पादन भारत में ही किया जाता है। ग्रामीण परिवारों द्वारा इसे पूरक आय के रूप में देखा जाता है। बीड़ी बनाने के लिए तीन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। तेंदू की पत्तियों को धोकर सुखाना और उचित आकार में काटना। फिर उन्हीं पत्तियों पर तम्बाकू की अपेक्षित मात्रा फैलाना और उन्हें शंकु का आकार देना। दोनों छोर्रों को एक तिनके की सहायता से मोड़कर पतले छोर को धागे से बांधना। 25 बीड़ी के बंडलों के बनने उन्हें कांट्रेक्टर को सौप देना। कांट्रेक्टर उन्हें फर्म को भेजता है जहाँ वे 24 घंटें के लिए भट्टी में नियत तापमान पर रखी जाती है। भट्टी में से निकाले जाने पर उन्हें हल्के कागज में लपेटा जाता और लेबल लगाया जाता है और फिर फुटकर इकाइयों को भेज दिया जाता है। इस उद्योग में घरेलू व कामगारों के निम्न जीवन स्तर तथा दोषपूर्ण उत्पादन प्रक्रिया के परिणामस्वरुप ही उद्योग असंगठित है। इनमें 90 प्रतिशत महिलाएं है। वास्तव में देखा जाए तो औरतों से अधिक लड़कियाँ इस काम में जुटी हुई हैं। अनुमान है कि एक महिला के पीछे 5 लड़कियाँ इस काम में लगी हुई हैं। बीड़ी बनाने का अधिकांश कार्य घरों पर किया जाता है, जिसे फैक्टरी नहीं कहा जा सकता और न ही निर्माता फर्म एवं कामगारों के बीच मालिक-मजदूर के सम्बन्ध होते हैं। बीड़ी बनाने की प्रक्रिया के अत्यंत सरल होने एवं सामान घर ले जाने की सुविधा ने ही महिलाओं का ध्यान अपनी ओर खीचा है। एक शोध में पाया गया कि बीड़ी उद्योग से जुड़े प्रत्येक परिवार द्वारा अपना काम बच्चों में बाँट दिया जाता है इससे बड़े परिवार की आय के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि होती है। बीड़ी उद्योग की एक विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं एवं बच्चों को काम मिल जाता है जिससे परिवार भोजन की सुरक्षा में कमी आती है और कुल पारिवारिक आय में महिलाओं के योगदान आय को औसतन 45.5 प्रतिशत तक बढ़ाता है। बीड़ी निर्माण से जुडी महिलाएं अपना सामान्य घरेलू काम जैसे खाना पकाना, कपड़े धोना आदि काम भी करती रहती है। यदि इन कार्यों को करने के लिए किसी व्यक्ति को रखा जाए तो उसे ये काम करने के बदले भुगतान करना पड़ेगा। लेकिन गृहणी या घर की किसी महिला सदस्या द्वारा यदि ये कार्य किये जाते हैं तो उनके काम को आर्थिक कार्यों में नहीं गिना जाता। घरेलू कार्यों के मूल्यांकन का अभाव के परिणामस्वरूप ही घरेलू कार्यों एवं आर्थिक रूप से लाभकारी कार्यों के बीच महिला श्रमिकों को एकत्रित करने वाल्व विशलेषण के फैसले को अनदेखा किया गया है। शोधकर्ताओं ने महिलाओं के उस समय को जानने करने का प्रयास किया जो वे घरेलू काम में और बीड़ी बनाने में व्यतीत करती हैं। परिवार की कुशलता के लिए गृह कार्य अनिवार्य है। हर कुटुंब का मुख्य उद्देश्य अपन परिवार का अधिकाधिक कल्याण करना है। वे अधिक पैसा कमाने के लिए बीड़ी नहीं बनाते बल्कि इसलिए बनाते हैं क्योंकि इससे उनके परिवार को भोजन मिलने की आशा होती है। इसलिए घरेलू कार्य करने के घंटों में कुछ कटौती की जाती है और यह थोड़ा सा परिवर्तन महिला के घरेलू कार्यों का मूल्यांकन भी करता है साथ ही बीड़ी बनाने से होने वाली आय में वृद्धि को भी दर्शाता है। महिलाओं द्वारा आर्थिक कार्यों को ज्यादा समय तक करने पर उनके जीवन स्तर में सुधार होता है। परिवार की आय व शिक्षा का स्तर दोनों में वृद्धि होती है और घरेलू कार्यों के लिए ज्यादा समय देने पर परिवार की आय कम हो जाती है। इस प्रकार हम देखते है की औरतों के घरेलू कार्य तथा आर्थिक कार्य के समय को निर्धारित करने वाले अनेक कारक है और एक छोटा सा परिवर्तन इन कारकों की परस्पर निर्भरता में गुणात्मक परिवर्तन ला सकता है। ग्रामीण विकास की परिचर्चा में महिलाओं द्वारा किये जाने वाले गैर-कृषि कार्यों को पूरक की संज्ञा दी जाती है। अनेक परिवारों में विशेषकर गरीब परिवारों के बीच कुल आय का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं की आय का होता है। जो उन्हें बीड़ी बनाने से होती है। एक अध्ययन बताता है कि जिन परिवारों की वार्षिक आय 500 रु. से अधिक नहीं हैं उनमें 86 प्रतिशत आय महिलाओं द्वारा अर्जित की जाती है। इसी प्रकार जिन परिवारों की वार्षिक आय 500 से 750 रु, के बीच होती है उसमें 95 प्रतिशत महिलाओं का योगदान होता है। तत्पश्चात दो बड़े आय वर्ग 750-1000 रु. व 1000 -15000 रु. की वार्षिक आय में महिलाओं का योगदान क्रमशः 79 प्रतिशत व 77 प्रतिशत से 95 प्रतिशत के बीच रहता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिन उत्पादन क्रियाओं से परिवार जुड़े होते हैं, विशेषकर महिलाएं वहाँ यह पाया गया है कि महिलाओं के योगदान में वृद्धि से परिवार की आय में वृद्धि होती है जिससे प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ती है। पारिवारिक सामाजिक वातावरण में बीड़ी बनाना ही औरतों के लिए आमदनी का एकमात्र जरिया है। परन्तु वास्तविकता यह है कि बीड़ी अधिकांश महिलाएं नहीं चाहती कि उनकी बेटियां विवाह के पश्चात भी इस कार्य में संलग्न रहे। और जो महिलाएं बेटियों के विवाहोपरांत भी इस कार्य से जुड़े रहने की पक्षपाती है उनका मुख्य तर्क यही है कि यह उनकी अतिरिक्त आय का प्रमुख स्रोत है जिससे उनके सामाजिक, आर्थिक स्तर में भी सुधार होता है। उनकी यह सोच परिवर्तन के काम में बाधक हो सकती है। क्योंकि उनके काम करने की वांछनीयता, आय में सहयोगी के रूप में तथा परिवार कल्याण में नारी के कार्यों के विचारों के साथ नारी स्थापित रूढ़ियों मो चुनौती देने का संकल्प नहीं कर सकती। बीड़ी उद्योग में शोषण के कुछ प्रमुख रूप इस प्रकार हैं। बीड़ी के व्यवसाय में बीड़ी बनाना, उसके मुठ (पैकेट) बनाना तथा उनपर लेबल चिपकाने का काम शामिल है और इन सभी में कुछ खास तरह का कौशल चाहिए। चार वर्ष की उम्र से ही बच्चे-बच्चियों से बीड़ी बनवाया शुरू कर दिया जाता है।। काफी सारे बच्चे पांच से 11 वर्ष की उम्र में तथा कुछ बच्चे 11 से 15 वर्ष की उम्र में इस पेशे में आते हैं। उनके हाथ सधने और काम में पूरी रफ्तार आने में करीब तीन साल का समय लगता है। बीड़ी उत्पादन की प्रक्रिया और यह उद्योग इस तरह बना हुआ है कि इसके हर चरण में मजदूरों के शोषण की गुंजाइश है। 1,000 बीड़ियाँ बनाने के लिए 800 ग्राम तेंदूपत्ता और 350 ग्राम तम्बाकू चाहिए। अक्सर इन दोनों चीजों की तंगी रहती है। अगर माल उपलब्ध भी तो उसके घटिया होने का खतरा रहता है, और उनसे तैयार बीड़ी बेकार हो जाती है। ऐसी बीड़ी जब न खरीदी जाए तो मजदूर मारा जता है। इस बीड़ी को ठेकेदार निर्माता उनके पासबुक में दर्ज नहीं करते। फिर माल का तौल कम होने की शिकायत भी आम है और यह बोझ मजदूर के माथे ही आता है। कच्चे माल की कमी में घट-बढ़ यह काम न मिलने की स्थिति में मजदूर स्थानीय सूदखोरों से बहुत ऊँची दरों पर कर्ज लेते हैं। यह कर्ज ऐसा होता है कि इसे चुकाने में मजदूर और उसके बच्चे नियोक्ता या सूदखोर के बंधुआ बन जाते हैं। बीड़ी मजदूरों के संरक्षण और बचाव के लिए चार कानूनों की मौजदूगी के बावजूद उनके प्रावधान ढंग से लागू नहीं हो पाते और मजदूरों के काम की स्थितियों में कोई बहुत फर्क नहीं आया है। यह काम बहुत ही एकरुपता वाला और उबाऊ है तथा इसमें कुछ नया करने की गुंजाइश नहीं होती। लेकिन यह काम मुशिकल भी है, क्योंकि मजदूर पलभर के लिए भी नजर नहीं फेर पाता। जब बीड़ियों की गिनती पर ही मजदूरी मिलती हो तो नजर फेरने का सीधा मतलब नुकसान उठाना है। एक ही स्थिति में बैठकर घंटों काम करना, गंदी जगह में बैठना और दिन रात तम्बाकू सूंघना मजदूरों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। आंध्रप्रदेश में बीड़ी उद्योग एक अध्ययन से बीड़ी उद्योग के निम्लिखित गुण-दोष सामने आये: चूँकि यह काम बहुत कुशलता चाहता है और इसमें पीढ़ियों से लोग लगे है, इसलिए इसमें एक किस्म की निरंतरता बन गई और इसमें नये लोगों के आ सकने की गुंजाइश काफी कम हो गई है। बीड़ी ठेकेदार आमतौर पर पुराने परिचित परिवारों को ही काम सौपते हैं। और प्रायः नए लोगों को काम नहीं ही देते। इस काम में साल के नौ महीने लगे रहने वाले मजदूर यह उसके परिवार के लिए बाकी तीन महीनों के लिए किसी अन्य काम में जाना सभव नहीं होता, न उन्हें कोई और काम मिल पाता है। उन्हें पत्ते को साइज से काटना, तम्बाकू मिलनाना, बीड़ी मोड़ना, किनारे मोड़ना, धागा बांधना, मुठ बनाना और लेबल चिपकाना होता है। बच्चे एक काम के बाद दूसरा सीखते हुए आगे बढ़ते हैं और फिर माहिर मजदूर बन जाते हैं। यह बात उललेखनीय है की यह काम चाहे जितना भारी और उबाऊ लगे, स्थितियां जितनी भी मुश्किल हो, बच्चे आमतौर पर अपना काम मजे से करते हैं और माँ-बाप की आमदनी में योगदान करने पर गौरव महसूस करते हैं। वे अपने पास कोई पैसा नहीं रखते और अनेक बच्चे तो काम से लौटने के बाद घर पर पढ़ाई करते हैं। मजदूरी एक हजार बीड़ी बनाने की मजदूरी है 24.90 रूपये। इसमें 8.50 रूपये क महंगाई भत्ता भी शामिल है। प्रति 1000 बीड़ी बनाने के अलग-अलग चरण की मजदूरी इस प्रकार होती है: तेंदू पत्ता को साइज से काटना ( 1२.50 रु.) उसका मुँह बंद करना ( २.50रु.) बीड़ी पर धागा बांधना (1.30 रु.) पत्ते और तम्बाकू की बर्बादी (२.50रु.) बंधुआ बच्चे चाहे जितना माल बनाएं उन्हें बहुत थोड़ी (और दिखावटी) ही मजदूरी मिलती है। अधिकांश को उनके दिनभर के काम की सिर्फ आधी मजदूरी ही मिलती है और बाकी रकम उधार के एवज में रख ली जाती है। काम सीख गया बाल श्रमिक रोज दस घंटे काम करते हुए औसतन 2000 बीड़ियों बना लेता है। आधा काटने पर भी उसे कायदे से रोज 25 रूपये मिलने चाहिए पर पत्ते और तम्बाकू की बर्बादी के नाम पर उनसे २.50 रुपए की जगह 5 रूपये काट लिए जाते हैं। आधी रकम तो उधार के खाते में चली जाती है। सो, आमतौर पर उन्हें दस रूपये या उससे कम ही मिलते हैं। लड़के और लड़की की दिहाड़ी में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। बंधुआ रखे गए बच्चों की वास्तविकता कमाई ठेकेदार या एजेंट द्वारा सीधे काम पर रखे गए बाल श्रमिकों की कमाई से काफी कम होती है। बंधुआ बच्चे भी उधार चुकने के बाद आजाद होने पर ही अन्य बाल श्रमिकों जितना कमा सकते हैं। जब तक मजदूरी न बढ़ेगी उधार चुकाने की क्षमता भी नहीं बढ़ सकती । और जब तक ठेकेदार उचित और सही नाप-तौल का कच्चा माल न दे तथा तैयार माल लेने में नखरे दिखाते हुए काफी सारे माल को घटिया न घोषित करे तबतक उचित मजदूरी भी संभव नहीं है। इस प्रकार यह पूरी प्रक्रिया एक दुष्चक्र का रूप ले चुकी है। अध्ययन से पता चलता है कि बीड़ी उद्योग में दस वर्ष से कम उम्र के बच्चों की पिटाई अधिक होती है, इससे ऊपर वालों की कम । इसका कारण ढूँढना मुश्किल नहीं है दस वर्ष से कम उम्र के बच्चों को न काम का अनुभव होता है, न उनका कौशल निखरा होता है। वे बहुत चौकस होकर काम भी नहीं करते और बचपन की मस्ती में काम को या काम पर आने को भूल जाते हैं। उनकी हाजिरी भी कम होती है उम्र बढ़ने के साथ बच्चों का हाथ सधता जाता है और वे काम भी समझते हैं। साथ ही उन्हें अपने नियोक्ताओं की पसंद-नापसंद का भी पता हो जाता है। इस अध्ययन के दौरान दो लड़कियों और एक लड़के की जो कहानियाँ सामने आई वे बहुत ही दर्दनाक है। वेल्लोर के निकट एक गाँव में बीड़ी बनाने वाली 11 वर्ष की लड़की की अपने नियोक्ता से यह शिकायत है: मेरे मालिक छोटी-सी-छोटी गलती की सजा देते हैं। वे मोती-मजबूत छड़ी से मेरी पिटाई करते हैं। वे अक्सर मुझे अपनी पत्नी के लिए गाँव के कुएं से पानी लाने को कहते हैं। कई बार मुझे उनके दो साल के बच्चे की देखरेख भी करनी होती है। अगर मुझे कभी दवाई या इलाज की जरुरत होती है तब न तो वे मुझे घर जाने देते हैं, न ही इलाज कराते है। मैं उनसे मुक्ति पाना चाहती हूँ। जुड़ी दो कहानियाँ 1. उसी उम्र की एक अन्य लड़की करपदी शहर के पास के एक गाँव में वहीँ काम करती है। उसने अपने नियोक्ता से मुक्ति पाने की कामना के साथ अपनी कहानी इस अध्ययन के एक अध्येता को सुनाई मेरे माँ-बाप मूलतः खेतिहर मजदूर हैं और वे बीड़ी के धंधे को नहीं जानते। मेरे परिवार की भारी आर्थिक मुश्किलों के चलते ही उन्होंने मुझे इस काम में लगाया। मैं छठी क्लास तक पहुँच गई थी, लेकिन फिर मेरे लिए बीड़ी के धंधे में आने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गे। यह सिर्फ मुश्किल काम ही नहीं है, इसमें बिना आराम किये घंटों एक तरह से ही बैठे रहना भी काफी मुशिकल है। काम का बोझ काफी है। रोज 3,000 बीड़ियों का मुँह बंद करने का काम मेरे लिए मुश्किल है। मुझे रोज सिर्फ 3 रूपये की मजदूरी मिलती है। इसलिए में तो इस काम से एकदम ऊब चुकी हूँ। मुझे इस नरक से निकालने में कृपया मेरी मदद करें। एक साल छूटने के बाद भी मैं पढ़ाई शुरू कर सकती हूँ। वेल्लोर शहर में बीड़ी बनाने के काम में लगे 12 वर्ष के एक लड़के अपनी व्यथा इन शब्दों में सुनाई” २. बीड़ी का मुँह बंद करने में हुई जहाँ-सी चूक के लिए भी मालिक मुझे पीटते हैं। वे सिर्फ डांटते-झिड़कते ही नहीं, मेरे माँ-बाप को भी भला-बुरा कहते है, जबकि मालिक से थोड़ा एंडवांस लेने के अलावा उनका और कोई लेना-देना नहीं है। शुरू में मेरा माथा नीचे झुकाए रखा। देखने के लिए मालिक दियासलाई की डिब्बी मेरे गर्दन के ऊपर रख देते थे। फिर मैं न तो सिर उठा सकता था, न इधर-उधर देख सकता था न ही सिर हिला-डुला सकता था। सिर उठाने और मोड़ने के लिए मैं कई बार पिट चूका हूँ। जैसे ही सिर हिलता यह उठता है दियासलाई की डिब्बी गिर जाती है और उसकी आवाज मालिक सुन लेते हैं कई बार तो वे मुझे बड़ी निर्दयता से बिजली के तार से पीटते हैं। पर इन सबसे दुखद बात यह है कि जब अपने बच्चों को पिटाई या उनसे दुव्यर्वहार की खबर माँ-बाप को मिलती है, वे तब भी उनके प्रति सहानुभूति नहीं दिखा सकते। स्रोत:- जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची।