परिचय प्राय: लोगों की यह धारणा है कि खेलने से समय नष्ट होता है। माता-पिता इस बात से डरते हैं कि खेल में बच्चे लड़ेंगे-झगड़ेंगे। खेलने से क्या फायदा? कुछ लिखेंगे-पढ़ेंगे तो कुछ सीखेंगे भी। यह सोचकर बच्चों को खेलने के अवसर कम देते हैं। वास्तव में, बच्चों के काम और खेल अलग नहीं हैं। बचपन में खेल ही उनके सीखने का एकमात्र साधन है। खेल के माध्यम से बच्चे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, साथ ही खेल के माध्यम से अपने आसपास के संसार को देख और समझ सकते हैं। पूर्व प्राथमिक शिक्षा में खेल का महत्त्व खेल विधि मुख्य रूप से बाल-केंद्रित विधि है, जिसमें बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, रुचियों तथा क्षमताओं को ध्यान में रखा जाता है। खेलना बच्चों की स्वाभाविक प्रकृति है। खेल का मैदान हो, घर हो, बाज़ार हो, या अन्य कोई स्थान, बच्चे चुपचाप नहीं बैठ सकते। जो कुछ भी उनके हाथ लगता है, चाहे वह पत्थर हो, पत्ता हो या तिनका हो, वे उसे उठाकर खेलने लगते हैं। खेल उन्हें बहुत प्रिय होता है और खेलने में उन्हें बहुत आनंद आता है।बचपन में खेल ही उनके सीखने का एकमात्र साधन है। खेल के माध्यम से बच्चे अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, साथ ही खेल के माध्यम से अपने आसपास के संसार को देख और समझ सकते हैं। इससे बच्चों को अपने सामाजिक संबंधों एवं स्वस्थ आदतों को विकसित करने में भी सहायता मिलती है। इस प्रकार बच्चे के सभी पक्षों के विकास में सहायक होने के कारण खेल का बहुत अधिक महत्त्व है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा देने के लिए खेल एक प्रभावी साधन है, क्योंकि खेल से बच्चे जल्दी और अच्छा सीखते हैं। खेल-खेल में प्राप्त ज्ञान सुदृढ़ होता है। खेल बच्चों की पांचों इंद्रियों को विकसित करने में सहायक होते हैं। खेल द्वारा बच्चे अपनी ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों – दोनों का उपयोग करते हैं, उनकी मांस-पेशियां दृढ़ होती हैं, समझ बढ़ती है, आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। खेल के माध्यम से बच्चे ठोस अधिगम-अनुभव प्राप्त करते हैं। संपूर्ण अधिगम प्रक्रिया में बच्चा एक निष्क्रिय प्राप्तकर्ता मात्र न रहकर स्वयं सक्रिय रूप से कर के सीखने (Leaming by doing) की क्रिया में भाग लेता है। खेल एक संतुलित क्रिया-प्रधान कार्यक्रम है, जिससे समस्त विकासात्मक उददेश्यों की पूर्ति होती है। खेल बच्चों की अधिगम दक्षताओं, जैसे - निरीक्षण, प्रयोग, समस्या समाधान तथा सृजनात्मकता के विकास का पोषण करता है। खेल बच्चे के मानसिक और शारीरिक संतुलन बनाए रखने में भी सहायक होता है। खेल-क्रियाओं द्वारा बच्चों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के भीतर ही उनकी क्षमताओं और रुचियों को ध्यान में रखकर, उनका समुचित - विकास किया जा सकता है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा की विधियां पूर्व प्राथमिक शिक्षा 4-6 आयुवर्ग के बच्चों की विशेषताओं के आधार पर निश्चित रूप से खेल-विधि से दी जानेवाली शिक्षा है अर्थात खेल और क्रियाकलाप पर आधारित शिक्षा है, जिनमें निम्न खेल एवं क्रियाकलाप बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं खेल शिशुगीत कहानी वार्तालाप कठपुतली खेल गुड़िया का खेल प्रयोग अभिनय प्रकृति में विचरण संगीत व लयात्मक क्रियाएं खेल-सामग्री के साथ संज्ञानात्मक एवं भाषा-संबधी क्रियाएं कक्षा के अंदर व बाहर के खेल पूर्व प्राथमिक शिक्षा का कार्यक्रम नियोजन बच्चों की आवश्यकताएं आयु, स्तर, रुचियां एवं अभिरुचियां ही पूर्व । प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का आधार होनी चाहिए। पूर्व प्राथमिक शिक्षा का नियोजन लंबी एवं छोटी, दोनों अवधि के लिए किया जाना चाहिए। लंबी अवधि के लिए नियोजन से तात्पर्य सालभर की योजना बनाने से है। इसे बनाते समय बच्चों का विकासात्मक स्तर, सामाजिक परिप्रेक्ष्य, सांस्कृतिक मान्यताएं एवं स्थानीय लोगों की विशेष आवश्यकताओं को दृष्टि में रखना चाहिए। तत्पश्चात, सालभर की योजना के आधार पर छोटी अवधि के लिए नियोजन करना चाहिए। छोटी अवधि के लिए नियोजन का अभिप्राय साप्ताहिक योजना बनाने से है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक दिन की क्रियाओं और उसके आयोजन का विवरण हो। साल भर की योजना शैक्षिक सत्र के आरंभ में ही तैयार कर ली जानी चाहिए, जबकि साप्ताहिक योजना अगला सप्ताह शुरू होने से पहले तैयार की जानी चाहिए। यह सनिश्चित करना चाहिए कि यह नियोजन पूर्व प्राथमिक शिक्षा के उददेश्यों की प्राप्ति में सहायक हो। बच्चे के सर्वांगीण विकास पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए निम्नलिखित आयामों को ध्यान में रखना आवश्यक है व्यक्तिगत, सामाजिक और संवेगात्मक विकास शारीरिक और गत्यात्मक विकास संज्ञानात्मक विकास भाषा विकास सृजनात्मक अभिव्यक्ति और सौंदर्यानुभूति का विकास शिक्षिका कार्यकर्मी को एक दैनिक संतुलित कार्यक्रम बनाना चाहिए जिसमें उपरोक्त सभी आयामों से संबंधित खेल-क्रियाएं समाहित हों। इसके लिए समेकित प्रणाली का उपयोग करना वांछनीय है। विषयआधारित साप्ताहिक योजना कार्यक्रम योजना के अंतर्गत किसी मुख्य विषय का चुनाव करके विभिन्न क्रियाकलाप आयोजित किए जाते हैं। बच्चों की आयु, स्तर एवं परिवेश के आधार पर मुख्य विषय का चुनाव किया जाना चाहिए। ये विषय - परिवार, जानवर, फल-फूल, सब्जियां, पेड़-पौधे, घर, हवा, स्वच्छता, त्योहार आदि हो सकते हैं। एक विषय से संबंधित क्रियाकलाप एक सप्ताह या दो सप्ताह तक कराए जा सकते हैं। (यह विषय के विस्तार पर निर्भर करता है। जहां तक संभव हो, प्रतिदिन के क्रियाकलाप उस विषय से संबंधित होने चाहिए। पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम के लिए आवश्यक खेल-सामग्री बच्चे क्रियाशील होते हैं। वे कुछ न कुछ करते रहना चाहते हैं। इसी से वे विविध अनुभव प्राप्त करते हैं। इसके लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा केंद्रों में विभिन्न प्रकार की खेल-सामग्री की आवश्यकता होती है। बालकेंद्रित व आनंददायी शिक्षण विधियां तथा रोचक क्रियाकलाप सामग्री, विद्यालय के वातावरण को आकर्षक एवं रुचिकर बनाती हैं और बच्चों के नामांकन, ठहराव तथा प्रतिधारण क्षमता में वृद्धि करती है। उपयोगी खेलों व क्रियाओं की व्यवस्था करने के लिए महंगी सामग्री की आवश्यकता नहीं है। परंतु क्रियाकलाप को प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ साधारण उपकरण व सामग्री होना जरूरी है। कुछ आवश्यक खेल सामग्री, जैसे: रंगीन मनके, (मोती) पिरोने के लिए धागा पुराने टायर झूले संतुलन बनाए रखने के लिए उपकरण ब्लाक्स डोमिनोज फ्लैश कार्ड्स कठपुतलियां विषय-संबधी सामग्री शिशु गीतों और कहानियों का संकलन गुड़िया घर पजल्स आदि। आस-पास के परिवेश में उपलब्ध सामग्री का प्रयोग करके आकर्षक खेल-सामग्री बनाई जा सकती है, जैसे – मिट्टी, पत्ते, फूल और अन्य प्राकृतिक वस्तुएं। वस्तुएं जिन्हें आप स्वयं बटोर कर खेल-सामग्री बना सकते हैं, जैसे – पुराने डिब्बे, कागज़, दियासलाई की खाली डिब्बियां, कपड़े के टुकड़े, आदि। पर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में आसपास के पर्यावरण एवं प्रतिदिन के जीवन की उपयोगी जानकारी का समावेश होना चाहिए।सीखने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने व निरंतरता के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा के आयोजन तथा घर के वातावरण के बीच जुड़ाव होना बहुत ज़रूरी है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा में बच्चों के व्यक्तित्व को कृत्रिम बनाने के बजाय उसकी स्वाभाविकता को बनाए रखने पर अधिक जोर देने की जरूरत है। संक्षेप में, कार्यक्रम योजना का आधार सामाजिक समन्वय एवं एकता या एकात्मकता के साथ-साथ भौतिक एवं भावनात्मक जुड़ाव होना चाहिए। पूर्व प्राथमिक शिक्षा में बच्चे का मूल्यांकन पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम पाठ्यक्रम केंदित न होकर विकासोन्मुख होता है, अतः विकासात्मक उद्देश्यों के संदर्भ में शिशु का सतत अनौपचारिक मूल्यांकन करते रहना अत्यंत आवश्यक है। शिशु का मूल्यांकन व्यक्तिगत होना चाहिए तथा विकास के हर पक्ष का मूल्यांकन होना चाहिए, जैसे - सामाजिक, संवेगात्मक, शारीरिक, संज्ञानात्मक और भाषा का विकास । निरंतर मूल्यांकन मुख्य रूप से बच्चे के व्यवहार तथा विभिन्न खेल क्रियाओं के समय उसकी प्रतिक्रियाओं का निरीक्षण करके होना चाहिए, जैसे - पहेलियों के द्वारा, निर्देशित भाषायी एवं संज्ञानात्मक क्रियाओं, खेलों आदि के द्वारा। साढ़े चार से छह वर्ष के बच्चों के लिए अभ्यास शीट भी तैयार की जा सकती है। इस आयु स्तर के बच्चों को पढ़ने, लिखने व गणित का औपचारिक शिक्षण नहीं कराया जाता, अत: उनका मूल्यांकन प्रमुख रूप से अवलोकन पर आधारित है। उनके व्यवहारगत परिवर्तनों का, अभिरुचियों के परिमार्जन और कौशलों के विकास का अवलोकन है। निरंतर मूल्यांकन के अतिरिक्त प्रत्येक सत्र में भी बच्चों का मूल्यांकन होना चाहिए। प्रत्येक सत्र के प्रगति पत्र को अभिभावकों को दिखाकर उनसे बच्चों के संबंध में परामर्श करना चाहिए। प्रत्येक सत्र का मूल्यांकन निर्धारित उद्देश्यों तथा उनकी पूर्ति के लिए किए गए कार्यक्रमों पर आधारित होना चाहिए। सतत मूल्यांकन द्वारा उन बच्चों का पता लगाना चाहिए, जिनकी विशेष आवश्यकताएं हों। आवश्यकतानुसार बच्चों को छोटे समूहों में बांटकर कुछ बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। छोटे समूह की क्रियाओं में इन बच्चों को अपनी गति से सीखने और प्रगति करने का अवसर मिलता है। इन बातों को ध्यान में रखकर ही शिक्षिका को उनके लिए क्रियाओं की योजना बनानी चाहिए। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्(रोमिला सोनी ,राजेन्द्र कपूर कृष्ण कान्त वशिष्ठ)