<h3 style="text-align: justify;"> भूमिका </h3> <p style="text-align: justify;">बच्चे के विकास में उद्दीपन का विशेष महत्त्व है। यहां उद्दीपन से तात्पर्य है- प्रेरणा। बच्चा उचित अवसरों को पाकर कुछ क्रिया-प्रतिक्रिया करता है। इस क्रिया-प्रतिक्रिया से वह सीखता है और सीखने से उसके विकास को एक गति मिलती है। जीवन में बच्चे का पहला संपर्क अपने माता-पिता के साथ होता है। बच्चे का अधिकतर समय परिवार के साथ व्यतीत होता है। यह तो माता-पिता का फर्ज़ है कि वे बच्चे का पालन पोषण करें, किंतु पालन-पोषण केवल पौष्टिक भोजन और साफ़-सुथरे कपड़ों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए।अभिभावकों को चाहिए कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से प्राप्त बाल विकास संबंधित खेल, क्रियाकलाप, कहानियां और गीतों का प्रयोग बच्चे के साथ करें। बच्चा प्रतिदिन परिवार के सदस्यों के साथ अनेक प्रकार की पारस्परिक क्रियाएं करके अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा प्राप्त करता है।अकसर माता-पिता यह भूल जाते हैं कि बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में उनकी एक और भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।</p> <h3 style="text-align: justify;">गृह-शिक्षक के रूप में अभिभावक</h3> <p style="text-align: justify;">गृह-शिक्षक के रूप में अभिभावक कुछ युवा माता-पिता प्रारंभिक बाल्यावस्था की गतिविधियों की महत्ता को नहीं मानते, तो कुछ माता-पिता उन्हें यांत्रिक रूप से प्रयोग में लाते हैं, तो कछ को इनका ज्ञान ही नहीं होता और वे बच्चों को घर पर अनावश्यक औपचारिक शिक्षा के बोझ तले दबा देते हैं।वर्षों से सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों के कारण भारतीय माताएं अपने पुरातन संस्कारों को छोड़ती जा रही हैं। इसकी वजह संयुक्त परिवारों का विघटन तथा नौकरी की तलाश में मूल स्थान छोड़ना आदि है। परिणामस्वरूप बच्चों के पालन-पोषण के परंपरागत तरीके तेजी से बदलते जा रहे हैं। अब पुराने खेल, गीत, कहानियां, घरेलू खिलौने जो बच्चों के माता-पिता तथा घर के बड़े-बूढ़े, दादा-दादी आदि उपयोग में लाते थे, उनका उपयोग लगभग समाप्त होता जा रहा है। . संयुक्त परिवार से एक और लाभ भी था - परिवार में सगे संबंधियों के बच्चे भी होते थे। सब मिलकर खाते-पीते, खेलते और एक-दूसरे से सीखते भी थे।</p> <p style="text-align: justify;">आज के छोटे (लघु) परिवार में इन सबकी कोई संभावना नहीं। माता-पिता अगर बच्चे को उसके हाल पर छोड़ दें तो बच्चा अपने वातावरण में जो कुछ देखेगा, सही या गलत, उसे अपना लेगा, क्योंकि उसमें अभी इन दोनों में अंतर करने की क्षमता का अभाव होता है। परंतु माता-पिता जब घर में एक प्रेमपूर्ण सीखने का वातावरण बनाते हैं, तो बच्चों के भीतर सुरक्षा और जिज्ञासा की भावना पैदा होती है। अतः शिक्षिका तथा माता-पिता को मिलकर यह प्रयास करना चाहिए कि बच्चा सीख सके और आगे बढ़ सके। माता-पिता की सहभागिता से अभिप्राय है कि पूर्व प्राथमिक शिक्षा के नियोजन और क्रियान्वयन में वे आगे बढ़कर शिक्षिका की सहायता करें और बच्चे के अभिभावक की भूमिका को अधिक सफलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से निभाएं। आजकल नर्सरी में दाखिले के लिए भी छोटे बच्चों की प्रवेश परीक्षा ली जाती है। नर्सरी में प्रवेश के बाद 'थ्री आर्स' सीखने पर विशेष बल दिया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">इस तरह के तरीके प्रयोग करने से बच्चे तो बोझ तले दबे ही रहते हैं, माता-पिता भी दबाव में रहते हैं। बच्चे के जीवन को उपयुक्त सांचे में ढालने के लिए शिक्षक एवं माता-पिता की अहम् भूमिका है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे पर अनावश्यक दबाव न डालें, बल्कि उनके साथ खेलें। खेल-खेल में ही बच्चे बहुत कुछ सीखते जाते हैं। साथ ही माता-पिता को चाहिए कि वे शिशु उद्दीपन की पर्याप्त जानकारी प्राप्त करके बच्चों का उद्दीपन सार्थक एवं प्रभावशाली बनाएं।</p> <h3 style="text-align: justify;">प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक बातें </h3> <p style="text-align: justify;">बच्चे को प्रोत्साहित व प्रेरित करने के लिए माता-पिता को घर पर निम्नलिखित बातों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>बच्चे के साथ गुणात्मक समय (quality time) बिताएं।</li> <li>बच्चे के साथ बातें करें। बच्चे को अधिक से अधिक बोलने काअवसर दें।</li> <li> बच्चे को प्यार और सुरक्षा की भावना दें।</li> <li> बच्चे को गीत, कविता और कहानियां सुनाएं और सुनें।</li> <li>बच्चे के साथ उसका साथी बनकर खेलें।</li> <li> उन्हें उचित मार्गदर्शन दें।</li> <li>बच्चे को अधिक रोकें-टोकें नहीं।</li> <li>बच्चे की बात धैर्य से सुनें।</li> <li>बच्चे को खिलौने और उसके स्तर की चित्र-पुस्तकें दें।</li> <li>बच्चे को घर के बाहर घुमाने ले जाएं और आस-पास की चीज़ों के बारे में बातचीत करें। बच्चों के चारों तरफ के वातावरण में जो परिवर्तन हो रहा है, उनकी तरफ उसका ध्यान दिलाएं।</li> <li> बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों के साथ न करें। हर बच्चे की क्षमता भिन्न होती है।</li> <li>क्रियाकलाप व खेल बच्चे की आयु, स्तर और क्षमता के अनुसार दें।</li> <li> क्रियाकलाप/खेल/खिलौने ऐसे हों, जो बच्चे के विकास की दृष्टि से उपयोगी हों।</li> <li>आपका व्यवहार ऐसा हो कि बच्चा उसका अनुकरण करे। .</li> <li>बच्चे के प्रश्नों के उत्तर दें और उसमें खोजबीन की आदत डालें।</li> <li>बार-बार प्रश्न पूछने पर उसे डांटिए नहीं।</li> <li>घर का वातावरण तनाव से मुक्त रखें, ताकि बच्चा सुरक्षित महसूस करे।</li> <li>बच्चों को अपने-आप अनुभव करने का मौका दें, क्योंकि वे स्वयं चीजों को छूकर, सूंघकर, चखकर, ध्यानपूर्वक देखकर, सीखना चाहते हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">लाभ </h3> <p style="text-align: justify;"> क्रियाकलापों व खेलों से बच्चे को माता-पिता व घर के अन्य वयस्कों के साथ रहने एवं आदान-प्रदान के अधिक अवसर मिलते हैं।बड़े लोगों के साथ अर्थपूर्ण समय (quality time) बिताने से बच्चे को निम्नलिखित लाभ होते हैं </p> <ul style="text-align: justify;"> <li>बच्चे. में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है।</li> <li> बच्चे को अपने अस्तित्व का बोध होता है।</li> <li>सबके साथ सामंजस्य स्थापित करना सीखता है।</li> <li>दूसरों के प्रति विश्वास की भावना जाग्रत होती है।</li> <li>उसमें आत्मविश्वास की भावना सबल होती है। आ</li> <li>त्माभिव्यक्ति के अवसर मिलते हैं।</li> <li>बच्चे में उत्सुकता और उत्साह की वृद्धि होती है।</li> <li>सोचने-समझने, कल्पना आदि के अवसर मिलते हैं।</li> <li>और अधिक जानने तथा सीखने की जिज्ञासा बढ़ जाती है।</li> <li>अपने वातावरण के प्रति आकर्षण बढ़ता है।</li> <li>अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।</li> <li style="text-align: justify;"> माता-पिता व अन्य वयरकों द्वारा पौराणिक कथाएं (जैसे – रामायण,महाभारत एवं जातक कथाएं) और पंचतंत्र की कथाएं (पशु-पक्षियों की कहानियां) आदि सुनकर नैतिक मूल्यों एवं अच्छे विचारों का निर्माण होता है। माता-पिता को चाहिए कि इन कथाओं से रोचकप्रसंग लेकर सरल भाषा में सुनाएं। समय का अभाव होने पर भी मातापिता का यह कर्तव्य है कि वे समय निकालकर बच्चों को कहानी अवश्य सुनाएं, क्योंकि कहानी सुनने से बच्चों को आनंद मिलता है, उनकी कल्पनाशक्ति का विकास होता है,</li> <li style="text-align: justify;">उनका ज्ञान बढ़ता है और वे नए-नए शब्द भी सीखते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी पुस्तकों के प्रति रुचि भी विकसित होती है। जब माता-पिता या कोई भी परिवार का सदस्य बच्चों के साथ मिलकर गाता और खेलता है, तो बच्चे उन्हें अपने नज़दीक पाकर बहुत खुश होते हैं। वे अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन आजकल जीवन की गति इतनी तेज़ हो गई है कि माता-पिता को बच्चों के साथ गाने व खेलने का समय कम ही मिल पाता है। जीवन की व्यस्तता के कारण हम इन प्रचलित परंपरागत गीतों को भूलते जा रहे हैं। माता-पिता को इन्हें फिर से बच्चों के जीवन में लाने का प्रयास करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यस्त होने के बावजुद समय निकालकर अपने प्रांत में प्रचलित परंपरागत गीतों, खेलों को बच्चों के साथ अवश्य खेलें, क्योंकि अच्छे संस्कारों की नींव माता-पिता दवारा ही पड़ती है।</li> <li style="text-align: justify;"> उचित खेल-क्रियाओं द्वारा माता-पिता और बच्चे एक-दूसरे को ठीकसे समझ सकते हैं। </li> <li style="text-align: justify;">अगर माता-पिता बच्चे को आसपास के वातावरण को समझने में । सहायता दें, तो बच्चे का सामान्य ज्ञान बढ़ेगा और शुरू से ही बच्चे के प्रश्नों का तर्कपूर्ण या सही उत्तर दें, तो उसका दृष्टिकोण वैज्ञानिक बनेगा।</li> <li style="text-align: justify;">समुचित उद्दीपन क्रियाओं के माध्यम से शिशुओं में जिज्ञासा प्रवृत्ति जागृत की जा सकती है।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">शिक्षिका की भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;"> पूर्व प्राथमिक शिक्षा में शिक्षिका की भूमिका पूर्व प्राथमिक शिक्षा में केंद्र-बिंदु बच्चा है और शिक्षिका उसकी मार्गदर्शिका है। प्रांरभिक बाल शिक्षा केंद्र में आने वाला बच्चा अपने घर की सुरक्षा तथा घर से प्राप्त होनेवाली मान्यताओं को छोड़कर आता है, इसीलिए केंद्र पर उसे लगभग वैसी ही सुरक्षा तथा मान्यताएं मिलना बहुत आवश्यक है तभी वह केंद्र में आसानी से घुल-मिल पाएगा, खुश रहेगा और उसका उचित विकास होगा। इसलिए शिक्षिका का दायित्व है कि वह ।</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>सहनशील रहें।</li> <li>बच्चों को मां का प्यार दें, तभी बच्चे केंद्र में मां की अनुपस्थिति में भी सुरक्षित महसूस करेंगे।</li> <li>संस्कृति के संपोषण तथा संप्रेषण के लिए भाषा, मूल माध्यमों में से एक है। बच्चों तथा अभिभावकों में विश्वास की भावना जागृत करने के लिए उनकी मातृभाषा में बात करना अत्यंत प्रभावकारी है।</li> <li>विभिन्न स्थानीय सामग्रियों/वस्तुओं द्वारा अधिगम के लिए वातावरण तैयार करें।</li> <li> हमारी भावनाएं, हमारे विश्वास एवं मूल्यों से प्रभावित होती हैं। अपनीभावनाओं को बच्चे पर थोपे नहीं, अपित बच्चे की योग्यता एवं क्षमता में विश्वास करे तथा आगे बढ़ने में उसकी सहायता करें।</li> <li> बच्चों को समाधान ढूंढने के अवसर प्रदान करें और उसे अपनी गति से सीखने दें।</li> <li> बच्चे को किसी भी ऐसे नाम से न बुलाएं, जिससे बच्चे के प्रति आपके विश्वास में कमी झलकती हो।</li> <li> बच्चों के समक्ष बातचीत के आदर्श तरीके प्रस्तुत करे।</li> <li>बच्चों का सम्मान करे। इससे उनमें आत्मसम्मान का विकास होता है।</li> <li>बच्चा जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकारें।</li> <li>बच्चे को अपनी क्षमताओं का पता चलने दें, उसके प्रयासों को प्रोत्साहन दें और संप्राप्ति पर उसकी सराहना करें।</li> <li>बच्चे की गलतिया ढूंढ़ने के स्थान पर उसकी क्षमताओं, योग्यताओं एवं सामर्थ्य पर ध्यान दें।</li> <li>बच्चे के सही कार्य करने पर, चाहे वह छोटा-सा ही क्यों न हो,उसकी प्रशंसा करें।</li> <li>बच्चे को सही और गलत का अंतर सिखाएं। शिष्टाचार तथा स्वस्थ आदतों के विकास में बच्चे में सही और गलत का ज्ञान होना आवश्यक है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">यदि बच्चे को प्रारंभिक वर्षों में पर्याप्त भोजन, प्रेम और उत्प्रेरणा मिले, तो उसका प्रभाव उसके भावी जीवन और शिक्षा पर पड़ेगा। साथ ही स्वस्थ एवं उत्पादक जीवन-कला के वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने में उसे अवश्य सहायता मिलेगी।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद(एनसीईआरटी), श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली।</p>