परिचय प्राथमिक स्तर पर पर्यावरण अध्ययन के अंतर्गत यह विचार किया जाता है कि बच्चों को उनके परिवेश की वास्तविक परिस्थितियों से अनुभव दिए जाएँ, जिससे वे उनसे जुड़ें, उनके प्रति जागरूक हों, उनके महत्व को समझें और प्राकृतिक, भौतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक एवं वर्तमान पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनें। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 संपूर्ण प्राथमिक स्तर पर सीखन-सिखाने की प्रक्रिया हेतु एकीकृत एवं थीम' आधारित उपागम की सिफ़ारिश करता है। इसे कक्षा 3 से 5 तक एक अलग पाठ्यचर्या क्षेत्र के रूप में तथा कक्षा 1 से 2 में भाषा तथा गणित में एकीकृत रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। शुरुआती स्तर पर स्वयं, घर, विद्यालय और परिवार से संबंधित बच्चे के निकटतम परिवेश (जिसमें प्राकृतिक, सामाजिक, भौतिक और सांस्कृतिक स्थितियाँ शामिल हैं) से प्रारंभ करें। इसके बाद धीरे-धीरे (आस-पड़ोस और समुदाय) की तरफ बढ़े। पर्यावरण अध्ययन बच्चों को सिर्फ उनके परिवेश से ही परिचित नहीं कराता बल्कि उनके तथा परिवेश के आपसी संबंध को मज़बूती बनाता है। पर्यावरण अध्य्यन सीखने के लिए बच्चों के संदर्भ में उपयुक्त बाल केंद्रित वातावरण तैयार करना अत्यंत आवश्यक है। बच्चे को सीधे जानकारी, परिभाषाएँ तथा विवरण देने के स्थान पर ऐसी स्थितियों का निर्माण किया जाना चाहिए जिससे वे अपने ज्ञान का सृजन स्वयं करें। ज्ञान के सृजन के लिए वे अपने परिवेश, अन्य बच्चों, बड़ों तथा अन्य महत्वपूर्ण लोगों के साथ अंत: क्रिया करें। इस प्रक्रिया के दौरान वे पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त, ज्ञान के विभिन्न स्रोतों तथा कक्षा के अलावा सीखने के विभिन्न स्थलों की खोज करेंगे। वास्तविक संसार से उनका परिचय उन्हें विभिन्न सामाजिक मुद्दों (जैसे- 'जेंडर' आधारित पक्षपात, हाशियाकरण, विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों, जिसमें बुजुर्ग तथा बीमार दोनों का समावेश हो) एवं प्राकृतिक सरोकारों (जैसे - प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, परीक्षण एवं संरक्षण) से जूझने के अवसर देगा। इस बात का ध्यान रखना होगा कि संसाधन सामग्री के अतिरिक्त कक्षा-कक्ष का वातावरण एवं प्रक्रियाएँ समावेशी हों। इसका अर्थ हैं कि वे बच्चों की विविधताओं, उनकी क्षमताओं, संज्ञानात्मक विकास, सीखने की गति, तरीके आदि को पोषित करें। बच्चों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि उनके अनुभवों को प्राथमिकता देते हुए उसे विद्यालयी ज्ञान से जोड़ा जाए। अतः सीखने की स्थितियों को विभिन्न तरीकों, कार्यनीतियों, संसाधनों से जोड़कर प्रत्येक सीखने वाले (जिसमें विशेष आवश्यकताओं वाले तथा वंचित वर्ग के बच्चे शामिल हों) को अवलोकन करने, अभिव्यक्त करने, चर्चा करने, प्रश्न करने, तर्कपूर्ण चिंतन करने, अपनी तरफ से कुछ जोड़ने तथा विश्लेषण करने के अवसर शामिल हों, जिनमें एक से अधिक ज्ञानेंद्रियों का उपयोग किया जा सके। सीखने की ऐसी प्रक्रियाओं का आयोजन व्यक्तिगत अथवा समूहों में किया जाए। ___ पर्यावरण अध्ययन में पाठ्यचर्या की अपेक्षाओं के अनुरूप बच्चों के विकास को व्यापक रूप से देखने और प्रगति मापने के लिए सीखने के प्रतिफल कक्षावार दिए गए हैं। इसके लिए आयु-अनुरूप शिक्षण प्रक्रियाएँ एवं संदर्भ आधारित सीखने का वातावरण आवश्यक है। बच्चे के सीखने की आवश्यकताओं एवं सीखने के तरीकों की जानकारी शिक्षकों एवं वयस्कों के लिए ज़रूरी है। इससे वे बच्चों कि वर्तमान विचारों को खोजते समझते हुए उनके ज्ञान, कौशलों, मूल्यों, रुचियों एवं मनोवृत्तियों का विकास कर सकेंगे। सीखने-सिखाने की प्रस्तावित प्रक्रियाएँ कक्षावार नीचे सारणी में दी गई हैं। ये शिक्षा के अन्य साझेदारों, विशेषरूप से शिक्षकों को सीखने की स्थितियों के संकेत देती हैं। ये सब उन्हें सीखने संबंधी कार्यों गतिविधियों की योजना बनाने और उन्हें डिज़ाइन करने तथा साथ ही एक समावेशी कक्षा में बच्चों की सीखने संबंधी प्रगति का आकलन करने में सहायक हो सकती हैं। पाठ्यचर्या की अपेक्षाएँ पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यचर्या के अनुसार प्राथमिक स्तर पर बच्चों से यह अपेक्षा की जाती है वे परिवार, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं, भोजन, जल, यात्रा एवं आवास जैसे दिन-प्रतिदिन के जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों/ 'थीम' के वास्तविक अनुभवों द्वारा अपने आस-पास / विस्तृत परिवेश के प्रति जागरूक हों। वे अपने आस-पास के परिवेश के प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा एवं रचनात्मकता का पोषण करें। वे अपने आस-पास के परिवेश से अंत: क्रिया करके विभिन्न प्रक्रियाओं/ कौशलों, जैसे अवलोकन, परिचर्चा, स्पष्टीकरण, प्रयोग, तार्किकता को विकसित करें। उनमें आसपास के परिवेश में उपलब्ध प्राकृतिक, भौतिक एवं मानवीय संसाधानों के प्रति संवेदनशीलता का विकास हो। वे मानव गरिमा और मानवाधिकारों के लिए न्याय, समानता एवं आदर से जुड़े मुद्दों को उठा सकें। कक्षा तीन( पर्यावरण अध्ययन) सीखने-सिखाने की प्रस्तावित प्रक्रियाएँ सीखने के प्रतिफल सभी शिक्षार्थियों को जोड़ो में/समूहों में/व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के अवसर दिए जाएँ तथा प्रोत्साहित किया जाए अपने आस-पास के परिवेश, अर्थात घर, विद्यालय और पड़ोस की विभिन्न वस्तुओं/पेड़-पौधों/जंतुओं/पक्षियों के मूर्त । सामान्य रूप से देखे जा सकने वाले लक्षणों (विविधता, दिखावट, गतिशीलता, रहने के स्थान/कहाँ पाए जाते हैं, आदतें,आवश्यकताएँ, व्यवहार, आदि) का अवलोकन और खोज करें। जिन लोगों के साथ वे रहते हैं, वे क्या काम करते हैं, उनके पारस्परिक संबंध और उनके शारीरिक लक्षणों और आदतों के लिए उनके घर/परिवार को देखना, खोजना और विभिन्न तरीकों से इन अनुभवों को साझा करना। अपने आस-पास में परिवहन के साधनों, संचार साधनों तथा लोग क्या कार्य करते हैं की खोजबीन करें। अपने घर विद्यालय के रसोईघर में खाने की चीजों, बर्तनों, चूल्हों तथा खाना पकाने की प्रक्रिया का अवलोकन करें। बड़ों से चर्चा करके पता लगाना कि हमें पक्षियों/जंतुओं को जल, भोजन कहाँ से प्राप्त होता है (पौधे/जंतु, पौधे का कौन-सा भाग हम खाते हैं, आदि), रसोईघर में कौन काम करता है, कौन क्या खाता है और अंत में कौन खाता है। आस-पास के विभिन्न स्थलों का भ्रमण करना, जैसे – बाज़ार में खरीदने / बेचने की प्रक्रिया का अवलोकन करना, एक पत्र की डाकघर से घर तक की यात्रा, स्थानीय जल स्रोतों आदि का पता लगाना। प्रश्न पूछना और बनाना तथा बिना किसी भय और हिचकिचाहट के अपने बड़ों तथा साथियों को उत्तर देना। अपने अनुभवों/अवलोकनों को चित्र बनाकर/संकेतों/अनुरेखण/ शारीरिक हाव-भाव द्वारा/ मौखिक रूप से कुछ शब्दों/सरल वाक्यों में अपनी भाषा में साझा करें। वस्तुओं/तत्वों की उनके अवलोकन योग्य लक्षणों की भिन्नताओं/समानताओं के आधार पर तुलना करना और उन्हें विभिन्न वर्गों में रखना। माता-पिता/अभिभावक/दादा-दादी, नाना-नानी /आस-पड़ोस के बुजुर्गों से चर्चा कर उनके पहले तथा वर्तमान जीवन में दैनिक उपयोग में लाई गई चीजों, जैसे – कपड़ों, बर्तनों, आसपास के लोगों द्वारा किए गए कार्यों, खेलों की तुलना करना। अपने आस-पास से कंकड़-पत्थर, मनकों, गिरी हुई पत्तियों, पंखों, चित्रों आदि वस्तुओं को एकत्रित कर उन्हें नवीन तरीकों से व्यवस्थित करना है, जैसे- ढेर बनाना, थैली में रखना, पैकेट बनाना। घटनाओं, स्थितियों के होने की संभावनाओं तथा उन्हें रोकने, पुष्टि करने, परीक्षण पर समालोचनात्मक तरीके से विचार करने, उदाहरण के लिए- आस-पास की वस्तु या स्थान तक किसी दिशा (दाएँ/बाएँ सामने/पीछे) से पहुँचना, समान आयतन के किस पात्र में अधिक जल रखा जा सकेगा; किसी मग या बाल्टी में कितने चम्मच पानी आएगा। वस्तुओं, लक्षणों, तत्वों, आदि को पहचानने, वर्गीकरण करने, इनमें भेद करने की अपनी क्षमताओं के अनुसार, विभिन्न इंद्रियों का उपयोग करते हुए, अवलोकन करने, गंध पता लगाने, स्वाद, देखने, अनुभव करने, सुनने के लिए सरल गतिविधियाँ एवं प्रयोग करना। प्रयोगों और गतिविधियों पर प्रेक्षण तथा अनुभव इकट्ठे करना और उन्हें बोलकर / हाव-भाव द्वारा / चित्र बनाकर / सारणियों द्वारा / सरल वाक्यों में लिखकर साझा करना। स्थानीय तथा अनुपयोगी सामग्री, सूखी गिरी हुई पत्तियों, मिट्टी, कपड़ों, कंकड़-पत्थरों आदि को, रंगों के उपयोग से चित्रों, मॉडलों, डिजाइन, कोलॉज आदि बनाकर नया रूप देना। उदाहरण के लिए- मिट्टी का उपयोग कर बर्तन/पात्र, जंतु, पक्षी, वाहन बनाना; खाली माचिस की डिब्बियों तथा कार्ड बोर्ड से फ़र्नीचर बनाना आदि। परिवेश में पाए जाने वाले पालतू पशुओं या अन्य पक्षियों तथा जंतुओं के साथ अपने संबंधों के अनुभवों को साझा करना। सक्रिय रूप से भाग लेना और देखभाल की पहल करना, तदनुभूति साझा करना, समूहों में साथ काम करके नेतृत्व देना, जैसे- विभिन्न कक्षीय / बाहरी / स्थानीय / समकालीन गतिविधियों और खेलों में; पौधों की देखभाल, पक्षियों/पशुओं को भोजन देना, अपने आस-पास की वस्तुओं पर परियोजना कार्य करना। बच्चे सामान्य रूप से अवलोकन द्वारा पहचाने जाने वाले लक्षणों (आकार, रंग, बनावट, गंध) के आधार पर अपने आस-पास के परिवेश में उपलब्ध पेड़ों की पत्तियों, तनों एवं छाल को पहचानते हैं। अपने परिवेश में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं को उनके सामान्य लक्षणों (जैसे- आवागमन, वे स्थान जहाँ वे पाए रखे जाते हैं, भोजन की आदतों, उनकी ध्वनियों) के आधार पर पहचानते हैं। परिवार के सदस्यों के साथ अपने तथा उनके आपस के संबंधों को समझते हैं। अपने घर/ विद्यालय /आस-पास की वस्तुओं, संकेतों (बर्तन, चूल्हे, यातायात, संप्रेषण के साधन साइनबोर्ड आदि), स्थानों, (विभिन्न प्रकार के घर/आश्रय, बस स्टैंड, पेट्रोल पंप आदि), गतिविधियों (लोगों के कार्यों, खाना बनाने की प्रक्रिया आदि) को पहचानते हैं। विभिन्न आयु वर्ग के व्यक्तियों, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए पानी तथा भोजन की उपलब्धता एवं घर तथा परिवेश में पानी के उपयोग का वर्णन करते हैं। मौखिक/लिखित/अन्य तरीकों से परिवार के सदस्यों की भूमिका, परिवार का प्रभाव (गुणों/लक्षणों/आदतों/व्यवहार) एवं साथ रहने की आवश्यकता का वर्णन करते हैं। समानताओं/असमानताओं (जैसे- रंग-रूप/रहने के स्थान भोजन/आवागमन पसंद-नापसंद कोई अन्य लक्षण) के अनुसार वस्तुओं, पक्षियों, जंतुओं, लक्षणों, गतिविधियों को विभिन्न संवेदी अंगों के उपयोग द्वारा पहचान कर उनके समूह बनाते हैं। वर्तमान और पहले की (बड़ों के समय की) वस्तुओं और गतिविधियों (जैसे कपड़े बर्तन/खेलों/लोगों द्वारा किए जाने वाले कार्यों) में अंतर करते हैं। चिह्नों द्वारा/संकेतों द्वारा/बोलकर सामान्य मानचित्रों (घर कक्षा कक्ष/विद्यालय के) में दिशाओं, वस्तुओं/स्थानों की स्थितियों की पहचान करते हैं। दैनिक जीवन की गतिविधियों में वस्तुओं के गुणों का अनुमान लगाते हैं, मात्राओं का आकलन करते हैं तथा उनकी संकेतों एवं अमानक इकाइयों (बित्ता/चम्मच/मग आदि) द्वारा जाँच करते हैं। भ्रमण के दौरान विभिन्न तरीकों से वस्तुओं/गतिविधियों/स्थानों के अवलोकनों, अनुभवों, जानकारियों को रिकॉर्ड करते हैं तथा पैटर्नो (उदाहरण के लिए चंद्रमा के आकार, मौसम आदि) को बताते हैं। चित्र, डिज़ाइन, नमूनों (Motifs), मॉडलों, वस्तुओं से ऊपर से, सामने से और ‘साइड' से दृश्यों, सरल मानचित्रों (कक्षाकक्ष, घर विद्यालय के भागों के) और नारों तथा कविताओं आदि की रचना करते हैं। स्थानीय, भीतर तथा बाहर खेले जाने वाले खेलों के नियम तथा सामूहिक कार्यों का अवलोकन करते हैं। अच्छे-बुरे स्पर्श, जेंडर के संदर्भ में परिवार में कार्य/खेल/भोजन के संबंध में रूढिबद्धताओं पर; परिवार तथा विद्यालय में भोजन तथा पानी के दुरुपयोग / अपव्यय पर अपनी आवाज़ उठाते हैं। अपने आस-पास के पौधों, जंतुओं, बड़ों, विशेष आवश्यकताओं वालों तथा विविध पारिवारिक व्यवस्था (रंगरूप, क्षमताओं, पसंद/नापसंद तथा भोजन तथा आश्रय संबंधी मूलभूत आवश्यकताओं की उपलब्धता में विविधता) के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हैं। कक्षा चार ( पर्यावरण अध्ययन) सीखने-सिखाने की प्रस्तावित प्रक्रियाएँ सीखने के प्रतिफल सभी शिक्षार्थियों को जोड़ो में /समूहों में व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के अवसर दिए जाए तथा प्रोत्साहित किया जाए अपने आस-पास के परिवेश, जैसे – घर, विद्यालय तथा पास-पड़ोस में पाई जाने वाली वस्तुओं/ फूलों/पेड़-पौधे । पशु-पक्षियों का अवलोकन और छानबीन, उनके अवलोकन किए जा सकने वाले लक्षणों, जैसे – विविधता, स्वरूप, गति, रहने के स्थान, भोजन संबंधी आदतों, आवश्यकताओं, घोंसला बनाना, समूह में व्यवहार आदि के आधार पर करना। परिवार के सदस्यों / बुजुर्गों से प्रश्न तथा चर्चा करना कि क्यों परिवार के कुछ सदस्य एक साथ तथा कुछ अलग रहते हैं? कहीं दूर स्थान पर रहने वाले रिश्तेदारों तथा दोस्तों से वहाँ के घर/ वाहनों तथा वहाँ की जीवन-शैली के बारे में बातचीत करना। अपने घर की रसोई/ मंडी/संग्रहालय/वन्यजीव अभ्यारण्य / समुदाय / खेतों/जल के प्राकृतिक स्रोतों सेतुओं/निर्माणाधीन क्षेत्रों/स्थानीय उद्योगों, दूर रहने वाले रिश्तेदारों, दोस्तों के रहने के स्थल एवं ऐसे स्थलों का भ्रमण करना जहाँ चित्रकारी, दरी निर्माण तथा अन्य हस्तशिल्प कार्य होते हों। सब्ज़ी बेचने वालों, पुष्प विक्रेताओं, मधुमक्खी पालनकर्ताओं, माली, किसान, वाहन चालकों, स्वास्थ्य तथा सुरक्षा संबंधी कार्य करने वालों से बातचीत करना तथा उनके कार्यों, कौशलों और उनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले उपकरणों के बारे में जानना और अनुभवों को साझा करना। समय के साथ परिवार में हो रहे परिवर्तनों, परिवार के विभिन्न सदस्यों की भूमिकाओं के बारे में बड़ों से चर्चा करना। रूढ़िबद्ध विचारों / भेदभाव पूर्ण व्यवहार / पशु-पक्षियों/ घर के पेड़-पौधों/ विद्यालय और आस-पड़ोस के विषय में उनके अनुभवों और विचारों को जानना और साझा करना। बिना किसी भय तथा संकोच के प्रश्न बनाना तथा पूछना और प्राप्त किए गए अनुभवों पर मनन करना । अपने अवलोकनों तथा अनुभवों को चित्रों /संकेतों/अभिनय द्वारा मौखिक रुप से अथवा सरल भाषा में कुछ वाक्यों अथवा अनुच्छेद के रुप में लिखकर व्यक्त करना। वस्तुओं के अवलोकन योग्य गुणों में समानता या असमानता के आधार पर तुलना करना तथा उन्हें विभिन्न वर्गों में रखना। अभिभावक/ माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और • पासपड़ोस के बुजुर्गों से कपड़ों, बर्तनों, कार्य की प्रकृति, खेलों आदि के संदर्भ में वर्तमान तथा अतीत की जीवन शैली की चर्चा तथा तुलना करना, एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के समावेशीकरण पर चर्चा करना। अपने आस-पास की वस्तुओं और सामाग्री, जैसे-गिरे हुए फूल, जड़ों, मसालों, बीजों, दालों, पंखों, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लेखों, विज्ञापनों, चित्रों, सिक्कों, टिकटों आदि को एकत्रित करना और उन्हें रचनात्मक तरीके से व्यवस्थित करना। विभिन्न संवेदी अंगों के उपयोग द्वारा अवलोकन/गंध/स्वाद स्पर्श/श्रवण हेतु सरल गतिविधियाँ/ प्रयोग अपनी क्षमतानुसार करना । उदाहरण के लिए विभिन्न पदार्थों की जल में विलेयता, शक्कर व नमक को जल में बने विलयन से अलग करना तथा गीले कपड़े का एक टुकड़ा धूप में / कमरे में मोड़कर रखने में फैला कर रखने में/पंखे की हवा में हवा के बिना/ गर्मी में /ठंड में कब जल्दी सूखता है इसकी जाँच करना। दैनिक जीवन में अनुभव की जाने वाली घटनाओं/ परिघटनाओं/ स्थितियों, जैसे – जड़, पुष्प कैसे वृद्धि करते हैं, घिरनी के बिना तथा घिरनी के द्वारा वज़न कैसे उठाया जाता है का अवलोकन करना। सरल प्रयोगों तथा गतिविधियों द्वारा अपने अवलोकन की जाँच, सत्यापन और परीक्षण करना। ट्रेन-बस टिकट, समय सारणी और 'करेंसी नोट' को पढ़ना तथा नक्शे और संकेत बोर्ड में स्थान का पता लगाना। विभिन्न स्थानीय अनुपयोगी पदार्थों से नए पैटर्न बनाना, ड्राईग, प्रादर्श (मॉडल), मोटिफ़, कोलॉज, कविता/ कहानी/ स्लोगन बनाना। उदाहरण के लिए मिट्टी के उपयोग से बर्तन, पशु-पक्षी, वाहन, रेलगाड़ी बनाना। खाली माचिस के डिब्बों, कार्ड बोर्ड | तथा अनुपयोगी सामग्री आदि से फ़र्नीचर बनाना। घर विद्यालय/ समुदाय में आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक राष्ट्रीय/पर्यावरणीय उत्सवों/त्योहारों में भाग लेना। उदाहरण के लिए प्रातःकालीन सभा/प्रदर्शनी/दीपावली/ओणम/पृथ्वी दिवस, ईद आदि के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन, नृत्य, नाटक, रंगमंच, सृजनात्मक लेखन आदि में भाग लेना। साथ ही दीया/रंगोली/पतंग बनाना/भवन और पुलों के मॉडल बनाना तथा अपने अनुभवों को कहानियों, कविताओं, नारों (स्लोगन), कार्यक्रम आयोजन की रिपोर्ट/वर्णन/सृजनात्मक लेखन (कविता/ कहानी) या अन्य सृजनात्मक कार्यों द्वारा अभिव्यक्त करना। पाठ्यपुस्तकों से इतर अन्य पुस्तकों, समाचार-पत्रों, श्रव्य सामग्री, कहानियों/कविताओं, चित्रों /वीडियो/स्पर्शी सामग्री, वेब स्रोतों तथा पुस्तकालय का उपयोग करना और छानबीन करना। घर/समुदाय में अभिभावकों, साथियों एवं बड़ों से पूछना एवं चर्चा करना। पास-पड़ोस में अपशिष्ट पदार्थों के पुन: उपयोग, अपशिष्ट पदार्थों में कमी लाना, सार्वजनिक संपत्ति की देखभाल और उनका समुचित उपयोग करना, विभिन्न जीव-जंतुओं की देखरेख, जल प्रदूषण तथा स्वास्थ्य तथा स्वच्छता के संबंध में जानकारी प्राप्त करना, समालोचनात्मक तरीके से सोचना और बच्चों के अनुभवों पर मनन करना। महिलाओं की रुढिबद्ध गतिविधियों जो खेल/कार्य से संबंधित हों, की जानकारी लेना/ध्यान रखना, साथ ही ऐसे बच्चों/ व्यक्तियों/परिवारों विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों/जातियों तथा वयोवृद्धों - जिनकी पहुँच सार्वजनिक स्थानों और संसाधनों पर सीमित या प्रतिबंधित है - के विषय में जानकारी हासिल करना और उनके प्रति संवेदनशील होना। समूहों में कार्य करते समय नेतृत्व करना तथा सबका ध्यान रखने के लिए पहल करना, सहानुभूति रखना, विभिन्न भीतर/बाहर/ स्थानीय/समसामयिक खेलों तथा गतिविधियों में सक्रिय रुप से भाग लेना, पौधों की देखभाल के लिए प्रोजेक्ट/रोल प्ले करना, पशु-पक्षियों को भोजन देना, बुजुर्गों तथा विशेष आवश्यकता वालों के संबंध में सोचना। बच्चे आस-पास परिवेश में पाए जाने वाले फूलों, जड़ों तथा फलों के आकार, रंग, गंध, वे कैसे वृद्धि करते हैं तथा उनके अन्य सामान्य लक्षण क्या हैं जानते और पहचानते हैं। पशु-पक्षियों की विभिन्न विशिष्टताओं, जैसे चोंच दाँत, पंजे, कान, रोम, घोंसला, रहने के स्थान आदि को पहचानते हैं। विस्तृत कुटुंब में अपने तथा परिवार के अन्य सदस्यों के आपसी रिश्तों को पहचानते हैं। चींटियों, मधुमक्खियों और हाथी जैसे जीवों के समूह में व्यवहार तथा पक्षियों द्वारा घोंसला बनाने की क्रिया का वर्णन करते हैं। परिवार में जन्म, विवाह, स्थानांतरण आदि से होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या करते हैं। दैनिक जीवन के विभिन्न कौशल-युक्त कार्यों- खेती, भवन निर्माण, कला/शिल्प आदि का वर्णन करते हैं तथा पूर्वजों से मिली विरासत एवं प्रशिक्षण संस्थानों की भूमिका की व्याख्या करते हैं। दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं, जैसे – भोजन, जल, वस्त्र के उत्पादन तथा उनकी उपलब्धता; स्रोत से घर तक पहुँचने की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए फ़सल का खेत से मंडी और फिर घर तक पहुँचना; स्थानीय स्रोत से लेकर जल का घरों व पास-पड़ोस तक पहुँचना और उसका शुद्धिकरण होना। अतीत और वर्तमान की वस्तुओं तथा गतिविधियों में अंतर करते हैं। उदाहरण के लिए परिवहन, मुद्रा, आवास, पदार्थ, उपकरण,खेती और भवन-निर्माण के कौशल आदि। पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, वस्तुओं, अनुपयोगी वस्तुओं को उनके अवलोकन योग्य लक्षणों (स्वरूप, कान, बाल, चोंच, दाँत, तत्वों | सतह की प्रकृति) मूल प्रवृत्तियों (पालतू, जंगली, फल / सब्जी/ दालें / मसाले और उनका सुरक्षित काल), उपयोग (खाने योग्य,औषधीय, सजावट, कोई अन्य, पुन: उपयोग), गुण (गंध, स्वाद, पसंद आदि) के आधार पर समूहों में बाँटते हैं। गुणों, परिघटनाओं की स्थितियों आदि का अनुमान लगाते हैं, देशिक मात्राओं जैसे दूरी, वज़न, समय, अवधि का मानक/ स्थानीय इकाइयों (किलो, गज, पाव आदि) में अनुमान लगाते हैंऔर कारण तथा प्रभाव के मध्य संबंध स्थापन के सत्यापन हेतु साधारण उपकरणों / व्यवस्थाओं का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए वाष्पन, संघनन, विलयन, अवशोषण, दूरी के संबंध में पास/दूर, वस्तुओं के संबंध में आकृति व वृद्धि, फूलों, फलों तथा सब्ज़ियों के सुरक्षित रखने की अवधि आदि। वस्तुओं, गतिविधियों, घटनाओं, भ्रमण किए गए स्थानों- मेलों, उत्सवों, ऐतिहासिक स्थलों के अवलोकनों/अनुभवों/ सूचनाओं को विविध तरीकों से रिकार्ड करते हैं तथा गतिविधियों, नक्शों, परिघटनाओं में विभिन्न पैटर्न का अनुमान लगाते हैं। वस्तुओं और स्थानों के संकेतों तथा स्थिति को पहचानते हैं। विद्यालय और पास-पड़ोस के भूमि संकेतों और नक्शे का इस्तेमाल करते हुए दिशाओं के लिए मार्गदर्शन देते हैं। साइनबोर्ड, पोस्टर्स, करेंसी (नोट/सिक्के), रेलवे टिकट/समय सारणी में दी गई जानकारियों का उपयोग करते हैं। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों/अनुपयोगी पदार्थों से कोलॉज, डिजाइन, मॉडल, रंगोली, पोस्टर, एलबम बनाते हैंऔर विद्यालय/पास-पड़ोस के नक्शे और फ्लो चित्र आदि की रचना करते हैं। परिवार/ विद्यालय /पास-पड़ोस में व्याप्त रुढिबद्ध सोच (पसंद, निर्णय लेने समस्या निवारण संबंधी सार्वजनिक स्थलों के उपयोग, जल, मध्याह्न भोजन/सामूहिक भोज में जाति आधारित भेदभाव पूर्ण व्यवहार, बाल अधिकार ( विद्यालय प्रवेश, बाल प्रताड़ना, बाल श्रमिक) संबंधी मुद्दों का अवलोकन करते हैं तथा इन मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं। स्वच्छता, कम उपयोग, पुनः उपयोग, पुनः चक्रण के लिए तरीके सुझाते हैं। विभिन्न सजीवों (पौधों, जंतुओं, बुजुर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों), संसाधनों (भोजन, जल तथा सार्वजनिक संपत्ति) की देखभाल करते हैं। कक्षा पाँच ( पर्यावरण अध्ययन) सीखने-सिखाने की प्रस्तावित प्रक्रियाएँ सीखने के प्रतिफल सभी शिक्षार्थियों को जोड़ो में /समूहों में व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के अवसर दिए जाएँ तथा प्रोत्साहित किया जाए • प्राणियों का उनकी अद्वितीय तथा असाधारण दृष्टि, गंध,श्रवण, दृश्य, नींद तथा प्रकाश, ऊष्मा तथा ध्वनि आदि के प्रति प्रतिक्रिया के संदर्भ में अवलोकन करना तथा नई बातें खोजना। अपने आस-पास जल स्रोतों को खोजना। फल, सब्जी, अनाज उनके घर तक कैसे पहुँचते हैं? अनाज से आटा तथा आटे से रोटी बनने की प्रक्रिया तथा जल-शुद्धिकरण की प्रक्रिया और तकनीकियों की खोजबीन करना। इकट्ठी की गई जानकारी या साथियों, शिक्षकों तथा बड़ों के साथ भ्रमण किए गए अनुभवों के बारे में चर्चा करना, अनुभव साझा करना। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के रास्ते का मार्गदर्शन क्रम तैयार करना। चित्रों/ बुजुर्गों / पुस्तकों / समाचार-पत्रों / पत्रिकाओं / वेब संसाधनों/संग्रहालयों आदि से ऐसे जन्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना जिनकी श्रवण, गंध तथा दृश्य क्षमता अत्यधिक तीव्र होती है। समतल क्षेत्र, पहाड़ी क्षेत्र, रेगिस्तान आदि विभिन्न भूमि क्षेत्रों की जानकारी प्राप्त करना और इन क्षेत्रों के विभिन्न पेड़पौधों एवं जंतुओं की विविधता तथा इन क्षेत्रों के व्यक्तियों की जीवन शैली के बारे में जानना। शिक्षकों तथा वयस्कों से परिचर्चा करना और चित्रों, पेंटिग का उपयोग करना, संग्रहालयों का भ्रमण करना। विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न समयावधियों के भोजन, आवास, जल उपलब्धता, आजीविका के साधनों, पद्धतियों, प्रथाओं, तकनीकों से संबंधित जानकारी एकत्रित करना। पेट्रोलपंपों, प्राकृतिक केंद्रों, विज्ञान पार्को, जल शुद्धीकरण प्लांट, बैंक, स्वास्थ्य केन्द्र, वन्य जीव, अभयारण्यों, सहकारी संस्थाओं, स्मारकों, संग्रहालयों का भ्रमण करना। यदि संभव हो तो विभिन्न भू-आकृतियों, जीवनशैलियों और आजीविकाओं वाले दूरस्थ स्थानों का भ्रमण करना और वहाँ के व्यक्तियों से चर्चा करना तथा अनुभव को विभिन्न तरीकों से साझा करना। विभिन्न घटनाओं, जैसे – पानी कैसे वाष्पित होता है, संघनित होता है तथा विभिन्न पदार्थ, भिन्न-भिन्न दशाओं में कैसे घुलते हैं; भोजन कैसे खराब हो जाता है; बीज कैसे अंकुरित होते हैं,और अनुभव साझा करना तथा इस संबंध में सरल प्रयोग तथा गतिविधियाँ करना। विभिन्न वस्तुओं बीजों/जल/अनुपयोगी पदार्थों आदि के गुणों/ लक्षणों को जाँचने के लिए गतिविधियाँ तथा सरल प्रयोग करना। अपने आस-पास अवलोकन कर समालोचनात्मक चिंतन करना कि कैसे बीज एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते है, पेड़-पौधे ऐसे स्थानों पर कैसे बढ़ते हैं जहाँ उन्हें किसी ने नहीं लगाया उदाहरण के लिए- जंगल में, कौन उन्हें पानी देता है तथा वे किन लोगों के हैं। आस-पास के रात्रिकालीन आश्रय स्थलों, शिविरों में रहने वाले व्यक्तियों, वृद्धाश्रमों में जाकर बुजुर्गों तथा/या विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों और ऐसे व्यक्तियों जिन्होंने अपने रोजगार के साधन बदल लिए-से बातचीत करना। ये व्यक्ति कहाँ के रहने वाले हैं तथा उन्होंने अपना स्थान क्यों छोड़ा जहाँ उनके पूर्वज अनेक वर्षों से रहते थे? अपने आसपास के इन विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करना। घर, विद्यालय और पड़ोस की परिस्थितियों से संबंधित बच्चों के अनुभवों पर घर/ समुदाय में माता-पिता, शिक्षकों, साथियों तथा बड़ों से बातचीत द्वारा समालोचनात्मक तरीके से मनन करने के लिए जानकारी प्राप्त करना। पक्षपात, पूर्वग्रहों तथा रुढिबद्ध सोच के विषय में बिना दबाव के साथियों, शिक्षकों तथा बड़ों से चर्चा करना और उनके जवाब में उदाहरण प्रस्तुत करना। आस-पास के बैंक, जल बोर्ड, अस्पताल एवं आपदा प्रबंधन संस्थान का भ्रमण करना तथा संबंधित व्यक्तियों से चर्चा करना एवं संबंधित दस्तावेजों को समझना। विभिन्न क्षेत्रों और उन स्थानों पर पाए जाने वाले विविध जीवों, विभिन्न ऐसे संस्थानों जो समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं, जंतुओं के व्यवहार, जल की कमी आदि के वीडियो देखना तथा उस पर अर्थपूर्ण चर्चा करना। विशिष्ट भौगोलिक विशेषताओं के कारण उत्पन्न होने वाली आजीविकाओं पर परिचर्चा करना। सरल गतिविधियों का आयोजन करना, अवलोकन परिणाम को सारिणी, चित्रों, बारग्राफ़, पाई चार्ट, मौखिक, लिखित रूप में रिकॉर्ड करना तथा उनके निष्कर्षों की व्याख्या कर प्रस्तुत करना। सजीवों (पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं) से संबंधित मुद्दों, जैसे - उनके इस पृथ्वी के वैध निवासी होने के अधिकार, पशुओं के अधिकार एवं जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार पर चर्चा करना। निःस्वार्थ भाव से समाज के लिए कार्य करने वाले व्यक्तियों के अनुभवों तथा उसके पीछे की प्रेरणा को साझा करना। समूह में कार्य करते समय सक्रिय रूप से भाग लेना, ध्यान रखने की पहल करना, परानुभूति साझा करना, नेतृत्व करना; उदाहरण के लिए भीतर/बाहर स्थानीय/समसामयिक गतिविधिायों, खेलों, नृत्य, कला, प्रोजेक्ट, रोल-प्ले जिसमें पौधों की देखभाल, जन्तुओं/चिड़ियों को भोजन देना तथा आस-पास रहने वाले बुजुर्गों तथा विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों की देखभाल करना शामिल है। आपातकाल तथा आपदा के समय की तैयारी हेतु 'मॉकड्रिल' (दिखावटी/काल्पनिक अभ्यास) करना। बच्चे पशु-पक्षियों की अति संवेदी इंद्रियों और असाधारण लक्षणों (दृष्टि, गंध, श्रवण, नींद, ध्वनि आदि) के आधार पर ध्वनि तथा भोजन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया की व्याख्या करते हैं। दैनिक जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं (भोजन, जल आदि) और उन्हें उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तथा तकनीकी को समझते हैं, उदाहरण के लिए खेत में उत्पन्न वस्तुओं का रसोई घर पहुँचना, अनाज का रोटी बनना, संरक्षण तकनीकों, जल स्रोतों का पता लगाने और जल एकत्रित करने की तकनीक को समझाते हैं। पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा मनुष्यों में परस्पर निर्भरता का वर्णन करते हैं। (उदाहरण के लिए आजीविका के लिए समुदायों की जीव-जंतुओं पर निर्भरता और साथ ही बीजों के प्रकीर्णन में जीव-जंतुओं और मनुष्य की भूमिका आदि दैनिक जीवन में उपयोगी विभिन्न संस्थाओं (बैंक, पंचायत, सहकारी, पुलिस थाना आदि) की भूमिका तथा कार्यों का वर्णन करते हैं। भू-क्षेत्रों, जलवायु, संसाधनों (भोजन, जल, आश्रय, आजीविका) तथा सांस्कृतिक जीवन में आपसी संबंध स्थापित करते हैं। (उदाहरण के लिए दूरस्थ तथा कठिन क्षेत्रों जैसे गर्म/ठंडे मरुस्थलों में जीवन। वस्तुओं, सामग्री तथा गतिविधियों का उनके लक्षणों तथा गुणों जैसे-आकार, स्वाद, रंग, स्वरूप, ध्वनि आदि विशिष्टताओं के आधार पर समूह बनाते हैं। वर्तमान तथा अतीत में हमारी आदतों/पद्धतियों, प्रथाओं, तकनीकों में आए अंतर का सिक्कों, पेंटिंग, स्मारक, संग्रहालय के माध्यम से तथा बड़ों से बातचीत कर पता लगाते हैं, (उदाहरण के लिए फ़सल उगाने, संरक्षण, उत्सव, वस्त्रों, वाहनों, सामग्रियों या उपकरणों, व्यवसायों, मकान तथा भवनों, भोजन बनाने, खाने तथा कार्य करने के संबंध में। परिघटनाओं की स्थितियों और गुणों का अनुमान लगाते हैं। स्थान संबंधी मात्रकों, दूरी, क्षेत्रफल, आयतन, भार काअनमान लगाते हैं और साधारण मानक इकाइयों द्वारा व्यक्त तथा साधारण उपकरणों/सेटअप द्वारा उनके सत्यापन की जाँच करते हैं। (उदाहरण के लिए तैरना, डूबना, मिश्रित होना, वाष्पन, अंकुरण, नष्ट होना, श्वास लेना, स्वाद आदि ।) अवलोकनों, अनुभवों तथा जानकारियों को एक व्यवस्थित क्रम में रिकार्ड करते हैं (उदाहरण के लिए सारणी, आकृतियों, बारग्राफ़, पाई चार्ट आदि के रूप में) और कारण तथा प्रभाव में संबंध स्थापित करने हेतु गतिविधियों, परिघटनाओं में पैटों का अनुमान लगाते हैं (उदाहरण के लिए तैरना, डूबना, मिश्रित होना, वाष्पन, अंकुरण, नष्ट होना, खराब हो जाना)। संकेतों, दिशाओं, विभिन्न वस्तुओं की स्थितियों, इलाकों के भूमि चिह्नों और भ्रमण किए गए स्थलों को मानचित्र में पहचानते हैं तथा विभिन्न स्थलों की स्थितियों के संदर्भ में दिशाओं का अनुमान लगाते हैं। आस पास भ्रमण किए गए स्थानों के पोस्टर, डिजाइन, मॉडल, ढाँचे, स्थानीय सामग्रियाँ, चित्र, नक्शे विविध स्थानीय और बेकार वस्तुओं से बनाते हैं। और कविताएँ नारे यात्रा वर्णन लिखते हैं। अवलोकन और अनुभव किए गए मुद्दों पर आवाज़ उठाकर अपने मत व्यक्त करते हैं और व्यापक सामाजिक मुद्दों को समाज में प्रचलित रीतियों/घटनाओं, जैसे – पहुँच के लिए भेदभाव, संसाधनों के स्वामित्व, प्रवास/ विस्थापन/ परिवर्जन और बाल अधिकार आदि से जोड़ते हैं। स्वच्छता, स्वास्थ्य, अपशिष्टों के प्रबंधन, आपदा/ आपातकालीन स्थितियों से निपटने के संबंध में तथा संसाधानों (भूमि, ईधन, वन, जंगल इत्यादि) की सुरक्षा हेतु सुझाव देते हैं तथा सुविधावंचित के प्रति संवेदना दर्शाते हैं। स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।