<p style="text-align: justify;">अनुभवों और योग्यताओं की विविधता तथा उपयुक्त शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया पर संवाद की अस्पष्टता के कारण बीते समय में कुछ समस्याएँ उभरकर सामने आई हैं और संभवतया ये समस्याएँ आगे भी आती रहेंगी। अत: वर्तमान पाठ्यचर्या के बेहतर क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि इन मुद्दों का समुचित प्रबधन हो। इससे कक्षा में शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की गुणवत्ता में सुधार लाने में मदद मिलेगी और सभी बच्चों के विकास एवं अधिगम को सुनिश्चित किया जा सकेगा।</p> <h3 style="text-align: justify;">आरंभिक अधिगम से जुड़े कुछ सुझाव </h3> <p style="text-align: justify;">कुछ सामान्य मुद्दों से निपटने के लिए नीचे कुछ सुझाव दिए गए हैं।</p> <ul> <li> अधिगम में विविधता का प्रबंधन प्रत्येक कक्षा में बच्चों के सीखने की क्षमताओं में भिन्नता पाई जाती है और उनके सीखने की शैली भी भिन्न-भिन्न होती है। ऐसी स्थिति में शिक्षक को चाहिए कि।</li> <li> बच्चों की आयु के अनुरूप सीखने की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, सीखने के परिवेश को बच्चों के अनुकूल बनाया जाए।</li> <li> इस बात पर ध्यान दें कि बच्चों को क्या सीखने की ज़रूरत है और वे कैसे जानकारी प्राप्त करेंगे।</li> <li> ऐसी गतिविधियाँ बनाई जाएँ जिनमें संलग्न रहकर बच्चे विषयवस्तु का भाव समझ सकें या उसे पूरी तरह से ग्रहण कर सकें।</li> <li>ऐसी परियोजनाएँ बनाएँ जो बच्चों में सीखे गए विषय का अभ्यास करने और उस विषय पर अधिक समझ विकसित करने की क्षमता का विकास कर सकें।</li> <li> बच्चों को विभिन्न समूहों में काम करने के मौके दें जैसे कभी-कभी उन बच्चों को एक साथ रखें जिनके सीखने का स्तर एक जैसा हो या ऐसे बच्चों के साथ जिनका स्तर मिला-जुला हो या फिर बच्चों का ऐसा समूह जिनकी रुचियाँ एकसमान हों या बच्चों का ऐसा समूह जिनकी रुचियाँ भिन्न-भिन्न हों। कभी-कभी उन साथियों के साथ सीखने के अवसर दें जो काम करते-करते सीखते हैं या कभी-कभी पूरी कक्षा के साथ मिल-जुलकर सीखने के अवसर दें।</li> <li> बच्चों को उनकी विविध क्षमताओं और आयु केअनुसार दो समूह में बाँटें। कम उम्र वाले वे बच्चे जिनकी योग्यताएँ अभी आरंभिक अवस्था में ही हैं, उन्हें स्वच्छंद रूप से खेले जाने वाले खेलों में संलग्न करें और इसी दौरान बड़ी आयु वाले बच्चे जिनकी योग्यताएँ अपेक्षाकृत अधिक विकसित हो चुकी हैं, उनके लिए निर्देशित गतिविधियों का आयोजन करें। 20 मिनट की अवधि के पश्चात् शिक्षक आरंभिक अवस्था की योग्यताओं वाले कम उम्र के बच्चों के लिए निर्देशित गतिविधियों को संचालित कर सकते हैंऔर बड़ी आयु वाले बच्चों को स्वच्छंद खेलों में संलग्न कर सकते हैं। इस प्रकार से शिक्षक विकास के अनुरूप गतिविधियों के सृजन और क्रियान्वयन के द्वारा विविध योग्यताओं और आयु समूह का प्रबंधन उचित तरीके से कर सकेंगे।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">बहु आयु वाले समूह का प्रबंधन</h3> <ul> <li>यदि कक्षा में भिन्न-भिन्न आयु वाले बच्चे मौजूद हैंतो इससे छोटे और बड़े दोनों ही बच्चों को लाभ मिलता है। इस तरह की विभिन्नता वाले समूह में बच्चे एक-दूसरे से सीखते हैं और इस प्रकार साथियों से सीखने (पियर लर्निंग) के कौशल का विकास होता है। बहु आयु वर्ग के बच्चों वाली कक्षा का प्रबंधन कुछ इस प्रकार से हो कि बच्चों को अधिक से अधिक शामिल किया जा सके और उन्हें इस प्रक्रिया द्वाराअधिकतम लाभ दिया जा सके।</li> <li>शिक्षक को बच्चों के सीखने संबंधी भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिए सीखने के परिवेश में पर्याप्त लचीलेपन का प्रावधान करना चाहिए।</li> <li>उन्हें इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि बच्चों को क्या सीखने की ज़रूरत है और वे कैसे जानकारी प्राप्त करेंगे।</li> <li>शिक्षकों को कुछ इस प्रकार से गतिविधियों का सृजन करना चाहिए कि उन गतिविधियों में संलग्न होकर बच्चे विषयवस्तु की सही समझ बनाने की निपुणता प्राप्त कर सकें।</li> <li>इस तरह की परियोजनाओं से बच्चों को जोड़नाचाहिए जिनसे बच्चों में अभ्यास करने, सीखे गए विषय को किसी और परिस्थिति में लागू करने और विषय की और अधिक समझ बनाने की क्षमता पैदा हो सके।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">जेंडर समानता को सुनिश्चित एवं प्रोत्साहित करना</h3> <p style="text-align: justify;">जेंडर संबंधी रूढिबद्ध मान्यताओं को तोड़ने के लिए पूर्वप्राथमिक विद्यालय एक बेहतर स्थान है, अत: शिक्षकों को चाहिए कि वह</p> <ul style="text-align: justify;"> <li> लड़कों और लड़कियों को एक समान ध्यान, सम्मानऔर समान अवसर प्रदान करके बच्चों से ऐसी ही अपेक्षाओं का उदाहरण स्वयं प्रस्तुत करें।</li> <li> ऐसी पुस्तकों, खेलों और अन्य गतिविधियों का चयन करें जो जेंडर संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त हों।</li> <li> किसी एक जेंडर विशेष को सीमित करने वाली भाषा का उपयोग न करना। जेंडर निष्पक्ष (जेंडर न्यूट्रल) भाषा का प्रयोग करें।</li> <li> ऐसी कहानियों, गानों, गतिविधियों और सामग्री का उपयोग करें जिसमें लड़कियों और लड़कों तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को समान रूप से सभी कार्यों में समान भूमिका में दर्शाया गया हो। लड़के और लड़कियाँ दोनों को ही नेता, नायक और समस्या समाधान करने वाले के रूप में दर्शाना चाहिए।</li> <li>अभिभावकों को नियमित रूप से इस विषय पर संवेदनशील बनाएँ ताकि वे इन बातों का घर पर भी अभ्यास करें। यह भी महत्वपूर्ण है कि उनमें जेंडर और विशेष आवश्यकता आधारित भेदभाव को समझनेऔर रोकने के संबंध में समझ पैदा की जाए।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">आरंभिक अवस्था में औपचारिक शिक्षा देने से बचें</h3> <p style="text-align: justify;">आरंभिक वर्षों में बच्चों में ज्ञान, कौशल और संज्ञानात्मक योग्यताओं के विकास पर अधिक बल देने से उनके सकारात्मक दृष्टिकोण, सीखने के प्रति इच्छा एवं तत्परता, मननशील होने, उत्सुकता प्रदर्शित करने, खोजबीन करने, समस्या का समाधान प्रस्तुत करने आदि की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। अत: शिक्षक को चाहिए कि</p> <ul> <li style="text-align: justify;">अवधारणाओं को बनाने और दक्षताओं व कौशलों को पुख्ता करने पर ध्यान केंद्रित करें। ऐसा करने के लिए सीखने-सिखाने की औपचारिक प्रणाली से दूरी बनानी चाहिए। इस प्रकार के अवसर प्रदान करने चाहिए जहाँ बच्चे गतिविधियों, नवीन सामग्रियों और अवधारणाओं के प्रति उत्सुकता और रचनात्मकता प्रदर्शित कर सकें।</li> <li style="text-align: justify;">रटने पर आधारित, शिक्षक निर्देशित अधिगम, जिससे कोई सार्थक संदर्भ न निकल पाए और बच्चे परअनावश्यक दबाव पड़े, हर स्थिति में हानिकारक हैं।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का उपयुक्त समावेशन सुनिश्चित करें</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li> आरंभिक हस्तक्षेप के द्वारा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की क्षमताओं को पहचानकर उनके विकास को बढ़ावा देने से उनके सीखने की कठिनाई कम होती हैं और उनके विकास में गति आती है। आरंभिक हस्तक्षेप से तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमेंबच्चे की ज़रूरतों के अनुसार सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के स्वरूप में फेर-बदल किया जाता है, जिसका उद्देश्य बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता की प्रत्यक्ष रूप से मदद करना है। आरंभिक हस्तक्षेप कई रूपों में किया जा सकता है</li> <li> भाषा और वाक् उपचार (थैरेपी) के द्वारा सुनने की क्षमता में सुधार किया जा सकता है और श्रवण यंत्र (हीयरिंग एड) के उपयोग को सुगम बनाया जा सकता है।</li> <li>फिजियोथैरेपी के द्वारा गत्यात्मक कौशलों, जैसे संतुलन बनाना, बैठना, घुटनों के बल चलना और पैरों पर खड़े होकर चलना आदि क्रियाओं के विकास में मदद मिलती है।</li> <li> बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुरूप जिस प्रकार के छोटे-छोटे उपकरणों की ज़रूरत हो, वे भी उन्हें दिए जाने चाहिए।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">समावेशन का मुख्य लाभ यह है कि इसमें विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ भी समान रूप से व्यवहार किया जाता है और उनकी क्षमताओं पर ध्यान दिया जाता है। इसके साथ ही उन्हें पर्याप्त सुविधाएँ, आधारभूत संरचना और व्यक्तिगत रूप से दी जाने वाली सहायता देकर उनके विकास को सशक्त किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>अत: शिक्षक को चाहिए कि वह</strong></p> <ul style="text-align: justify;"> <li> सभी बच्चों के विकास के संबंध में शुरुआती दौर में ही जाँच करें और उनकी क्षमताओं को पहचानें।</li> <li> शुरुआती पहचान और आरंभिक हस्तक्षेप के महत्वको समझें।</li> <li> बच्चों के लिए संरचनात्मक परिवेश बाधारहित हो, यह सुनिश्चित करने के लिए उसमें अनुकूल परिवर्तन करें।</li> <li> विभिन्न क्षमताओं वाले बच्चों के लिए पाठ्यचर्या को लचीला व सुगम बनाएँ।</li> <li> आकलन एवं मूल्यांकन की उपयुक्त प्रक्रियाएँविकसित करें।</li> <li> सभी हितधारकों को अपने दृष्टिकोण और कार्य पर पुनर्विचार करने तथा आवश्यकता पड़ने पर उनमें बदलाव करने के लिए सशक्त और समर्थ बनाएँ।</li> <li>आयु उपयुक्त खेल एवं सीखने की सामग्री का प्रयोग करें।</li> </ul> <p style="text-align: justify;"> स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।</p>