परिचय कक्षा में की जाने वाली हर गतिविधि और क्रियाकलाप के सम्मेलन से पाठ्यक्रम बनता है और इसकी विषयवस्तु बच्चे की प्राकृतिक और सामाजिक दुनिया से प्राप्त की जा सकती है। शिक्षक द्वारा प्रयोग की जाने वाली शिक्षण विधि और पद्धतियाँ आधारभूत आरंभिक अधिगम सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए और इन्हें बच्चे की आयु और सीखने के स्तर तथा आरंभिक अधिगम आवश्यकताओं के अनुरूप रूपांतरित कर लिया जाना चाहिए। बच्चों को धीरे-धीरे प्राथमिक विद्यालय की औपचारिक दिनचर्या का आदी होने के साथ साक्षरता (पढ़ना और लिखना)और संख्या-विषयक ज्ञान (गणितीय संकल्पनाओं को समझना और प्रयोग में लेना) तथा सामाजिक एवं प्राकृतिक पर्यावरण का व्यवस्थित ज्ञान प्राप्त करने में मदद कीआवश्यकता होती है। अत: यह सुझाया जाता है कि आरंभिक अधिगम सिद्धांत पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या का आधार होने चाहिए। इससे शिक्षा के एक भिन्न मुकाम तक पहुँचने में मदद मिलेगी। यह उन्हें केवल सीखने के अगले पड़ाव तक जाने के लिए ही तैयार नहीं करेगा बल्कि जीवन भर सीखने में भी मदद करेगा। पूर्व-प्राथमिक पाठ्यचर्या के मार्गदर्शक सिद्धांत सीखना सतत और संचयी होता है। तंत्रिका विज्ञान से प्राप्त साक्ष्य सिद्ध करते हैं कि आरंभिक अधिगम आगामी जीवन की उपलब्धियों को प्रभावित करता है। हर बच्चा अलग होता है और वह अपनी गति से ही बढ़ता, सीखता और विकास करता है। सीखने और विकास का आधार खेल एवं गतिविधियाँ हैं। बच्चों के सीखने के लिए बड़ों के साथ प्रतिक्रियात्मक और सहयोगी अत:क्रिया (संवाद) अनिवार्य है। अनुभवजन्य अधिगम के लिए परिवेश निर्मित करने से बच्चे सीखते हैं। पारस्परिक शिक्षण-अधिगम अनुभवों को समृद्ध करता है। स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का विकास और उपयोग सीखने के अवसरों को समद्ध करता है। संदर्भ के प्रति संवेदनशीलता और विविधताओं की सराहना अधिगम में सहायक है। मातभाषा/घर की भाषा ही शिक्षण का माध्यम होनी चाहिए। अधिगम में परिवार की सहभागिता योगदान देती है। पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम की अवधि अनिवार्य पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम की अवधि चार घंटे प्रतिदिन होनी चाहिए। कार्यक्रम में दिन में कुछ समय विश्राम के लिए दियाजाना चाहिए। जो कार्यक्रम लंबे समय का हो, उसमें झपकी लेने का समय भी होना चाहिए। शिक्षक बच्चों से पहले विद्यालय पहुँचें और उनके जाने के बाद ही विद्यालय छोड़ें, ताकि वे अगले दिनके कार्यक्रम की तैयारी कर सकें। वांछनीय • बच्चे सप्ताह में पाँच दिन अर्थात सोमवार से शुक्रवार पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम के लिए आ सकते हैं; शनिवार का दिन शिक्षकों द्वारा पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम का मूल्यांकन करने, अगले सप्ताह के कार्यक्रम की योजना बनाने, शिक्षण-अधिगम सामग्री को तैयार करने, अभिभावकों से संपर्क करने; रिकॉर्ड, रजिस्टर और पोर्टफोलियो, आदि के रख-रखाव हेतु उपयोग में लिया जा सकता है। पाठ्यचर्या मुख्य संकल्पनाएँ, शिक्षण प्रक्रियाएँ और आरंभिक सीखने के प्रतिफल पाठ्यचर्या का स्वरूप समग्र दृष्टिकोण वाला और संदर्भ के अनुसार लचीला भी हो सकता है। पाठ्यचर्या तीन लक्ष्यों को संबोधित करती है। संप्रेषण हेतु मुख्य कौशल/ संकल्पनाएँ, शिक्षकों द्वारा अनुसरण की जाने वाली शिक्षण प्रक्रियाएँ और वर्ष के अंत में बच्चों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले आरंभिक सीखने के प्रतिफल।बच्चों का सीखना और विकास समग्र रूप से होता है, यह स्वास्थ्य, संज्ञान, भाषायी, व्यक्तिगत तथा सामाजिक सकुशलता/विकास के क्षेत्रों में अग्रसर होता है। बच्चे भिन्न तरीकों और भिन्न गति से सीखते हैं। पाठ्यचर्या निम्नलिखित तीन व्यापक लक्ष्यों के माध्यम से विकास के सभी क्षेत्रों को एकीकृत करती है लक्ष्य लक्ष्य 1- यह लक्ष्य बच्चों के सामाजिक-भावात्मक और शारीरिक-गत्यात्मक विकास के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। इन पहलुओं में बच्चों के लिए नियोजित खेल, रचनात्मक गतिविधियों और अनुभवों के माध्यम से सकारात्मक स्व-अवधारणा, आत्म-नियंत्रण, सामाजिक कौशल, आँख तथा हाथ का समन्वयन और स्थूल गत्यात्मक तथा सूक्ष्म-गत्यात्मक कौशलों का विकास शामिल है। इसके अतिरिक्त यह बच्चों को स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और सुरक्षा के लिए अभिविन्यास प्रदान करता है। लक्ष्य 2- यह लक्ष्य भाषा और साक्षरता कौशलों के विकास, जो सभी क्षेत्रों में सीखने का एक अभिन्न भाग है, पर ध्यान केंद्रित करता है। स्वयं को रचनात्मक रूप से व्यक्त करने और आत्मविश्वास के साथ संप्रेषण करने के लिए बच्चों को वयस्कों और अन्य बच्चों के साथ पारस्परिक क्रिया करने के अवसर दिए जाने की आवश्यकता है। जब बच्चे उद्देश्यपूर्ण निर्देश के साथ अर्थपूर्ण साक्षरता गतिविधियों में व्यस्त होते हैं, तो वे सुनने, बोलने, पढ़नेऔर लिखने के कौशल विकसित कर लेते हैं। ये उन्हें प्रभावी संप्रेषक बनने में सक्षम बनाते हैं। लक्ष्य 3— यह लक्ष्य बच्चों के संज्ञात्मक विकास पर प्रकाश डालता है जिसमें पर्यावरण जागरूकता और वैज्ञानिक मनोवृत्ति, गणितीय सोच और समस्या समाधान शामिल है। यह इस बात पर ध्यान केंद्रित करता है कि जब बच्चे पर्यावरण से पारस्परिक क्रिया करते हैं, वह विभिन्न अवधारणाओं एवं कौशलों का विकास करते हैं। इस लक्ष्य का सार बच्चों को ऐसे अवसर प्रदान करता है जो उन्हें जिज्ञासु, सतत, अनुशासित, रचनात्मक और अभिव्यक्त करने वाला बनाए। इसके अलावा समस्या-समाधान, विवेचनात्मक चिंतन और तर्क से संबंधित कौशल विकसित करने के लिए विविध प्रकार के अनुभव और गतिविधियाँ भी सुझायी गई हैं। मुख्य संकल्पनाएँ कौशल प्रत्येक लक्ष्य के अंतर्गत, संप्रेषित की जाने वाली मुख्य संकल्पनाएँ या कौशल शिक्षकों के लिए दिए गए हैं, जिनका लक्ष्य बच्चों का सर्वांगीण विकास है। शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि पाठ्यचर्या को संप्रेषित करते समय सुनिश्चित करें कि प्रत्येक संकल्पना या कौशल को विभिन्न तरीकों से संबोधित किया जाए। शिक्षण प्रक्रियाएँ शिक्षण प्रक्रियाएँ शिक्षकों द्वारा पाठ्यचर्या को इस प्रकार संप्रेषित करने में उपयोग में ली जाने वाली कार्यनीतियाँ हैं जिसमें बच्चे खोजबीन, जाँचपड़ताल, समस्या समाधान और विवेचनात्मक चिंतन द्वारा अपने अधिगम का निर्माण करते हैं और इस प्रकार निर्दिष्ट आरंभिक सीखने के प्रतिफल प्राप्त करते हैं। आरंभिक सीखने के प्रतिफल आरंभिक सीखने के प्रतिफल छोटे बच्चों के सीखने और विकास के लिए अपेक्षाएँ हैं। दूसरे शब्दों में, बच्चों को प्रत्येक वर्ष के अंत में क्या जान लेना चाहिए और क्या करने योग्य हो जाना चाहिए। सीखने के प्रतिफल प्राप्त करने हेतु शिक्षकों को खेलने, अन्वेषण करने, खोज करने और समस्या समाधान के लिए गतिविधियों, अनुभवों, विषयवस्तु को शिक्षण विधि में सम्मिलित करना चाहिए। नोट— विस्तृत जानकारी के लिए पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए पाठ्यचर्या दस्तावेज़ देखें। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षण का माध्यम भाषा बच्चों की पहचान और भावनात्मक सुरक्षा के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ी रहती है। यह उन्हें मुक्त रूप से अपने विचार और भावनाएँ व्यक्त करने में मदद करती है। भारत एक बहु-भाषायी देश है, जहाँ बच्चे पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में अपने घर की भाषा के साथ आते हैं, जो हो सकता है कि पूर्व-प्राथमिक/राज्य की भाषा से भिन्न हो। अनुसंधान भी दर्शाता है कि जो बच्चे उनकी मातृभाषा में चलाए जाने वाले विद्यालय कार्यक्रम में जाते हैं, उन्हें बोधन/समझने की समस्याओं का कम सामना करना पड़ता है। बच्चों की मातृभाषा/घर की भाषा में पढ़ाया जाना अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त है, क्योंकि यह संकल्पना निर्माण के प्रारंभिक वर्षों में बच्चों के साथ काम करने का सबसे उपयुक्त तरीका है। यदि मातृभाषा के रूप में एक से अधिक भाषाएँ हैं, तो शिक्षिका कक्षा में अपनी बात कहने के लिए सभी भाषाओं की अनुमति दे सकती है और फिर धीरे-धीरे बच्चों को विद्यालय में उपयोग में ली जाने वाली भाषा से परिचित कराया जा सकता है। आकलन पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में आकलन सतत और व्यापक होना चाहिए तथा पाठ्यचर्या में नियोजित अनुभवों परआधारित होना चाहिए। आकलन में बच्चे के विकास का प्रेक्षण करना तथा प्रलेखन शामिल होना चाहिए, अर्थात उनके स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति, दिन-प्रतिदिन के अनुभव, कला कार्य तथा अन्य उत्पादों में उनकी भागीदारीऔर उनका व्यवहार। क्षमताओं को पहचानने और प्रोत्साहित करने, उन क्षेत्रों की पहचान करने जिनमें अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता है और सीखने/विकासीय अंतरालों को संबोधित करने के लिए आकलन किया जाता है। विभिन्न साधनों (टूल्स) और तकनीकों जैसे उपाख्यानात्मक (ऐनेक्डोटल) रिकॉर्ड, जाँच सूची, पोर्टफोलियो, अन्य बच्चों के साथ पारस्परिक क्रियाओं को आकलन के लिए उपयोग में लिया जा सकता है। आकलन गैर-प्रतियोगी होना चाहिए। अभिभावकों की भागीदारी शिक्षकों, अभिभावकों और समुदायों का सहयोग होने से बच्चे अकादमिक, व्यावहारिक तथा सामाजिक दृष्टि से बेहतर प्रदर्शन करते हैं। यह जानने के लिए कि बच्चों की रुचियाँ क्या हैं, शिक्षकों को चाहिए कि वे परिवार से संपर्क करें और अभिभावकों को उनके द्वारा घर पर करवायी जा सकने वाली गतिविधियों के बारे में सुझाव दें। बच्चों के घर पर किए जाने वाले कार्यों के नमूने या फोटो अभिभावकों द्वारा शिक्षकों के साथ साझा किए जा सकते हैं। विद्यालयों द्वारा अभिभावक शिक्षा कार्यक्रम भी आयोजित किए जा सकते हैं। पूर्व-प्राथमिक कार्यक्रम में गतिविधियाँ क्षेत्र भ्रमण संचालित करने में मदद के लिए अभिभावक भी स्वयंसेवक के रूप में शामिल हो सकते हैं। पूर्व-प्राथमिक विद्यालयों में प्रौद्योगिकी आज भारत में मोबाइल फ़ोन और पारस्परिक मीडिया के माध्यम से दूरस्थ प्रसंगों में प्रौद्योगिकी का प्रवेश हो चुका हैऔर यह छोटे बच्चे के हाथों में भी पहुंच चुकी है। यह परिस्थिति बच्चों के सीखने और विकास के लिए अवसरऔर चुनौतियाँ दोनों उपलब्ध कराती है, क्योंकि बच्चे प्रौद्योगिकी की तरफ आसानी से आकर्षित हो जाते हैं। यद्यपि भारत में इस क्षेत्र के बारे में कोई नीति नहीं है, अनुसंधान साक्ष्य सुझाते हैं कि छोटे बच्चों के लिए प्रौद्योगिकी का प्रयोग उपयोगी हो सकता है, यदि उसका उपयोग बच्चों के सीखने और विकास को विस्तारित करने के लिए किया जाए, जैसे बच्चों को नयी शब्दावली और संप्रेषण के तरीकों से परिचित कराना, गत्यात्मक नियंत्रण, संकल्पनात्मक समझ, अनौपचारिक संबंध आदि।यह अपेक्षा की जाती है कि लक्ष्य 3 में शामिल मुख्य संज्ञानात्मक कौशलों का विकास आने वाले वर्षों में बच्चों को नयी प्रौद्योगिकियों के साथ तालमेल बिठाने की चुनौतियों का सामना करने लिए सुदृढ़ नींव उपलब्ध कराएगा। परंतु, यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रौद्योगिकी तभी लाभदायक है जब इसमें बड़े मध्यस्थता करें और ऐसा वातावरण बनाया जाए जिसमें पारस्परिक संवाद हो। निष्क्रिय प्रौद्योगिकी, जो बच्चों के खेलने, खोजबीन करने, भौतिक गतिविधि और सामाजिकपारस्परिक क्रिया का स्थान ले ले, उसे प्रत्येक स्तर पर हतोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि यह बच्चों की सृजनात्मकता के प्रतिकूल हो सकती है। यह उनके संप्रेषण और संबंध बनाने के कौशलों को जिनका प्रारंभिक वर्षों में बहुत महत्व होता है, बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अभिभावकों को सलाह दी जाती है कि वे टेलीविजन पर दी जाने वाली जन स्वास्थ्य सलाह का अनुसरण करें और दो वर्ष से छोटी आयु के बच्चों के लिए मीडिया के गैर-पारस्परिक क्रियात्मकऔर निष्क्रिय उपयोग पर रोक लगा दें और 2 से 5 वर्ष के बच्चों को इसके लिए हतोत्साहित करें। छोटे बच्चों के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग के संबंध में ध्यान देने योग्य मुख्य बात यह है कि यह बच्चों के सीखने और विकास के विस्तार के लिए योगदान करे, परंतु सामाजिक और संप्रेषण कौशलों, संबंध बनाने, समस्या समाधान करने तथा बाहर खेलने के अवसरों को कम न करे प्रौद्योगिकी का उपयुक्त उपयोग क्या करें क्या न करें कक्षा-कक्ष के भीतर अन्य बहुत से अधिगम/गतिविधि क्षेत्रों के साथ आई.सी.टी. को भी उपलब्ध कराएँ। उपकरणों के उपयोग एवं रख-रखाव के लिए दिशानिर्देश दें। बच्चों के लिए ऐसे ऐप्स (Apps) और खेलों का पता लगाएँ जो पारस्परिक क्रियात्मक, आयु उपयुक्त हों और अभिभावक या देखरेख करने वालों को भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें। पाठ्यचर्या की विषयवस्तु और अन्य खेल गतिविधियों को समृद्ध करने हेतु प्रौद्योगिकी का उपयोग करें। अनुचित सॉफ़्टवेयर के प्रयोग से बच्चों को बचाएँ। स्क्रीन टाइम व्यक्तिगत पारस्परिक क्रिया का स्थान न ले। सकारात्मक व्यवहार के लिए पुरस्कार के रूप में कंप्यूटर, फ़ोनपर समय न बिताने दें। आई.सी.टी. के लिए मूल कला सामग्री, खेलने की धी हुई मिट्टी, पुस्तकों तथा वास्तविक वस्तुओं और हाथ से करने वाले प्रयोगों का त्याग न करें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद