बच्चे सक्रिय और जिज्ञासु शिक्षार्थी होते हैं, इसलिए पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में उनकी सुरक्षा और शिक्षा की व्यवस्था सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य है। छोटे बच्चों के लिए सुरक्षित भौतिक स्थान का सृजन करना चाहिए जिससे उनकी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में मदद हो सके। छोटे बच्चों की गतिविधियों के लिए एक विद्यालय से दूसरे विद्यालय में एवं विभिन्न परिदृश्यों में (शहरी, ग्रामीण, अर्द्ध-शहरी एवं जन-जातीय) भौतिक भिन्नता हो सकती है जो स्थान की उपलब्धता एवं बच्चों की संख्या पर आधारित हो सकती है। सभी बच्चों के लिए एक सुलभ, सुनिर्मित भौतिक वातावरण, अन्वेषण में सहायक होता है, छोटे बच्चों को अपनेपन का एहसास दिलाता है और उन्हें स्वकेंद्रित तथा स्व-निर्देशित खेल में संलग्न करने में सक्षम बनाता है। अच्छा वातावरण माता-पिता और देखभाल करने वालों को भी आमंत्रित तथा शामिल होने का एहसास कराता है।भीतरी और बाहरी भौतिक वातावरण, दोनों का सृजन करते समय नीचे दी गई कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान में रखनी चाहिए। गतिविधि क्षेत्रों सहित भीतरी (इंडोर) परिवेश का सृजन करना गतिविधि क्षेत्र गतिविधि क्षेत्रों को ‘सीखने के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। बच्चों को सक्रिय रूप से संलग्न करने वाले ये क्षेत्र कक्षा में संसाधानों के साथ स्थापित किए जाते हैं और प्रसंगों या विषयों के अनुसार उन्हें बदला भी जा सकता है। गतिविधि क्षेत्रों का महत्व गतिविधि क्षेत्रों में खेलने से बच्चों को अपनी पसंद के अनुसार खेल-क्रिया चुनने और अपनी अभिरुचि को जानने में सहायता मिलती है। ऐसा करना उन्हें सृजन करने के चित्रांकन, अन्वेषण, हस्त-कौशल, नयी कुशलताएँ सीखने एवं गलतियाँ करके अपनी कार्य शैली में सुधार करने के अवसर प्रदान करता है। साथ ही जिस क्रिया में वे संलग्न हों, जैसे-टावर बनाना, पहेली (जिगसॉ पज़ल) को हल करना या किसी भूलभुलैया में मार्ग ढूँढ़ना, उनमें उपलब्धि एवं सफलता का अनुभव कराता है। जब बच्चे अन्य बच्चों के साथ खेलना सीखते हैं, सामग्री का उपयोग करने में भाग लेते हैं, साझा करते हैं, बारी-बारी से काम करना सीखते हैं और अन्य बच्चों की गतिविधि समाप्त होने तक प्रतीक्षा करना सीखते हैं, तो यह उनके सामाजिक, भावात्मक विकास में मदद करता है। वे समय प्रबंधन के साथ आत्म-नियमन भी सीखते हैं।बच्चों का पानी से, रेत से खेलना, जोड़-तोड़ करना स्थूल एवं सूक्ष्म माँसपेशियों के विकास में सहायता करता है। बच्चे समस्याओं का समाधान करना सीखते हैं, कारण प्रदान करते हैं, नयी सामग्री को खोजते हैं और यह उनके संज्ञानात्मक विकास में सहायक होता है।गुड़िया से खेलने वाले खेल और नाटकीय खेलों जैसे गतिविधि क्षेत्रों में शामिल हुए बच्चों का अवलोकन करने से बच्चों के संदर्भो, जैसे- उनका परिवार, पारस्परिक अंत:क्रिया, रिश्ते, अवरुद्ध और दबी हुई भावनाएँ आदि के बारे में बहुत कुछ पता चलता है। इस अवलोकन का उपयोग शिक्षकों द्वारा किया जा सकता है। गतिविधि क्षेत्र स्थापित करना गतिविधि क्षेत्र ऐसे होने चाहिए जो सक्रिय, स्वतंत्र अन्वेषण और खोज को आमंत्रित करें और बढ़ावा दें, जिससे बच्चों के सीखने का परिवेश बन सके। प्रदर्शन बच्चों की आँखों के स्तर के अनुसार होना चाहिए ताकि वे उन्हें आसानी से देख सकें। बच्चों की सीखाने की शुरुआती क्रियाओं और तैयार कार्यों दोनों के नमूने प्रदर्शित किए जाने चाहिए ताकि अंतिम उत्पाद के साथ-साथ सीखने की प्रक्रिया को भी महत्व दिया जा सके। प्रदर्शित सामग्री को नियमित रूप से बदलते रहनाचाहिए। प्रत्येक बच्चे के काम को प्रदर्शित किया जाना चाहिए, न कि सबसे अच्छे काम को (ऐसा बारी-बारी से किया जा सकता है)। प्रदर्शन उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए। बहुत अधिक प्रदर्शन से बचना चाहिए क्योंकि इससे कक्षा अव्यवस्थित या अति-उत्तेजक प्रतीत होती है। प्रदर्शन प्रासंगिक और सामयिक होना चाहिए।और सामयिक होना चाहिए। बैठने की व्यवस्था पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ, जैसे बड़े समूह की गतिविधियाँ, छोटे समूह की गतिविधियाँ, संगीत और गत्यात्मक क्रियाएँ, कला संबंधी क्रियाएँ, शिक्षकों द्वारा व्यक्तिगत या छोटे समूह निर्देश, बच्चों को सस्वर पढ़कर सुनाना आदि शामिल हैं। इन सब गतिविधियों के लिए अलग-अलग तरीके से बैठने की व्यवस्था की आवश्यकता होती है इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि पूर्व-प्राथमिक कक्षा में बैठने की व्यवस्था लचीली और विभिन्न क्रियाओं के अनुकूल होनी चाहिए। एक के ऊपर एक ढेर बनाकर रखी जा सकने वाली मेज़ों, कालीनों, दरियों और समायोज्य मेज़ का उपयोग व्हीलचेयर उपयोगकर्ता के लिए अनुकूलन तथा समुचित स्थान प्रदान करने में मदद करता है। पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं के फ़र्नीचर में बच्चों के अनुकूल मेज़ और कुर्सी होनी चाहिए, ताकि उनके पैर फ़र्श को छु सकें और उन्हें स्थिरता प्रदान करें। जब उनके पैर लटकते हैं तो उनके लिए टिककर बैठना और गतिविधियों में भाग लेना मुश्किल हो जाता है। फ़र्नीचर को इस तरह से व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि शिक्षक एवं बच्चों को सहज रूप से गति करने में सुविधा हो और समुचित स्थान प्रदान करे। शिक्षकों को इतनी ऊँचाई पर बैठना चाहिए जिससे बच्चे उन्हें देख सकें। कक्षा अनुकूलन कक्षाओं का अनुकूलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक स्थान से दूसरे स्थान के पूर्व-प्राथमिक विद्यालय के बुनियादी ढाँचे और सुविधाओं में भिन्नता होती है। यदि कक्षा में विशेष आवश्यकता वाले बच्चे हैं तो भौतिक सुविधाओं और सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं के संबंध में कक्षा अनुकूलन अनिवार्य हो जाता है। पूर्व-प्राथमिक विद्यालय में दिव्यांग बच्चों के लिए अनुकूलन और संशोधन के कुछ सुझाव नीचे दिए गए हैं आदेशों/निर्देशों को सरल बनाएँ और दोहराएँ। बार-बार कौशलों का अभ्यास करने के अवसर प्रदान करें। बच्चों को तुरंत सकारात्मक और विवरणात्मक बच्चों को विकल्प प्रदान करें ताकि वे अपनी रुचियों और शक्तियों का अनुसरण कर सकें। ठोस उदाहरण और सामग्री प्रदान करें, जैसे उभरे हुए अक्षर, संख्या आदि। अनुभव और जानकारी को संवर्धित करने के लिए अतिरिक्त समय प्रदान करें। बच्चों को शिक्षक के पास बैठने की व्यवस्था करें तथा उसे दरवाज़े या खिड़कियों या ध्यान भंग करने वाले अन्य बच्चों से दूर बैठाएँ। एक गतिविधि से दूसरी गतिविधि में जाने के लिए सहायता प्रदान करें (दृश्य और मौखिक संकेत दें, गीत, सामग्री दें, घंटी बजाएँ आदि) बच्चों की भावनाओं पर चर्चा करें और उन पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दें। बच्चों को अवसर प्रदान करें कि वे अपनी समझ को अपने शब्दों, गीतों, संकेतों, दृश्य माध्यम, संप्रेषण बोर्ड एवं अन्य उपकरणों द्वारा अनेक रूपों में संप्रेषित एवं प्रदर्शित कर सकें। गतिविधि क्षेत्रों या विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को इस प्रकार चुना जाना चाहिए जिससे कि सभी बच्चों में परस्पर सामाजिक संबंधों को प्रोत्साहन मिले। दैनिक दिनचर्या के दौरान, शिक्षक बच्चों में विभिन्न क्षेत्रों में पारस्परिक अंत:क्रिया को प्रोत्साहित कर सकते हैं। विभिन्न गतिविधियों के दौरान सावधानीपूर्वक नियोजित बैठने की व्यवस्था भी समाजीकरण को बढ़ावा देती है। पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं के लिए उपयुक्त अधिकांश खेल-सामग्री विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के उपयोग के लिए भी उपयुक्त होनी चाहिए। कभी-कभी बच्चों की भागीदारी में सुविधा प्रदान करने के लिए खेल सामग्री को संशोधित करना आवश्यक होता है, उदाहरण के लिए, हैंडल लगाना, सामग्री को बड़ा करना, सामग्री पर आपस में चिपकने वाली पट्टी (वेल्क्रो) लगाना आदि। ये संशोधन सभी बच्चों के लिए उपयोगी है।प्रतिपुष्टि दें। विकास के उपयुक्त एक सारणी बनाएँ (गतिविधियों की अवधि और क्रम, एक गतिविधि से दसरी गतिविधि में जाने के लिए समय आदि दें। बाहरी खेल परिवेश का सृजन बाहरी खेल के परिवेश का सृजन करते समय बाहरी खेल के विन्यास की आवश्यकता, खेल स्थान का अधिकतम उपयोग करना और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हैं, स्मरण रहे यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि छोटे बच्चों का बाहरी खेल क्षेत्र जानवरों, जहरीले पौधों, खतरनाक कीड़ों या बच्चों को नुकसान पहुँचाने वाली चीज़ों से मुक्त हो। खेल या गतिविधि क्षेत्र सुरक्षित होना चाहिए और सड़क यातायात से, घुसपैठियों से और जीवन या सुरक्षा संबंधी किसी भी खतरे से बचने के लिए दरवाजे सहित दीवार से घिरा होना चाहिए। सभी नालियाँ, गड्ढे अच्छी तरह से ढके हुए होने चाहिए। गतिविधियों का संचालन करते समय बाहरी क्षेत्र का शिक्षकों और वयस्कों द्वारा हर समय अच्छी तरह से पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए। अलग-अलग बाहरी क्षेत्रों की सतहों में भिन्नता होतीहै। बच्चों के लिए अर्द्ध-कठोर या घासयुक्त सतह की सिफ़ारिश की जाती है। अगर सतह बहुत सख़्त हो तो उसका अच्छी तरह से समतल और पत्थर रहित होना जरूरी है। बाहरी क्षेत्र के खेल क्षेत्र में स्थान और संसाधन की उपलब्धता के आधार पर विभिन्न प्रकार की खेल सामग्री होनी चाहिए। बाहरी खेल क्षेत्र में स्थूल माँसपेशी वाले खेलों, जैसे-दौड़ना, कूदना, साइकलिंग आदि के लिए मौके देने चाहिए। बगीचे में या घास की सतहों पर बाहरी खेल उपकरणों,जैसे-स्लाइड एवं झूलों की व्यवस्था की जानी चाहिए। बाहरी खेल क्षेत्र की अनुपस्थिति में, उपलब्ध भीतरी खेल क्षेत्र में बड़ी माँसपेशियों के विकास के लिए गतिविधियों का आयोजन किया जा सकता है। बच्चों को संवेगी और छोटी माँसपेशियों के विकासके लिए रेत/मिट्टी/पानी के खेल खेलने के अवसर दिए जाने चाहिए। शिक्षकों की भूमिका यह शिक्षक की ज़िम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि गतिविधि क्षेत्र में बच्चों को उनकी पहल वाले सहज खेल, जो पूर्व नियोजित नहीं हों, उन खेलों के लिए अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। शिक्षक को उपलब्ध स्थान, बच्चों की रुचि और शामिल किए जा रहे विषयों के अनुसार गतिविधि क्षेत्रों को आकर्षक बनाकर कक्षा की व्यवस्था करनी होती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गतिविधि क्षेत्रों की सामग्री अन्वेषणपरक, खोजी, व्यक्तिगत और सामूहिक खेलों के अवसर प्रदान करने वाली हो। चयनित सामग्री के पूर्जे (हिस्से) ऐसे होने चाहिए जिनको जोड़कर बच्चे कुछ भी बना सकें (कई वैकल्पिक चीज़े बना सकें) ताकि इससे बच्चों की सृजनात्मकता, योजना बनाने और इसके क्रियान्वयन की क्षमता में अभिवृद्धि हो सके। शिक्षक विभिन्न प्रकार की कम लागत और बिना किसी लागत के नाटक और शिक्षण सामग्री का सृजन कर सकते हैं। शिक्षक को नियमित रूप से गतिविधि क्षेत्रों की सामग्री की जाँच करनी चाहिए और अनाकर्षक सामग्री के स्थान पर अधिक आकर्षक सामग्री तथा सुरक्षा को ध्यान में रखकर बदलाव करना चाहिए ताकि बच्चों को खेलने में मज़ा आए साथ ही वे सुरक्षित रहें। बच्चों के खेल में दखल 7 दिए बिना ही शिक्षक चल रही गतिविधियों में लाभकारी र सहायता प्रदान कर सकते हैं। गतिविधि क्षेत्रों में खेल के दौरान शिक्षक विकासात्मक जरूरतों या भावात्मक समस्याओं वाले बच्चों की पहचान कर सकते हैं और वह आवश्यक सहायता और हस्तक्षेप कर सकते हैं। शिक्षक का हस्तक्षेप, समस्या हल करने में सहायता देने से लेकर प्रश्न करने, अवांछित व्यवहारों को पुनर्निर्देशित करने और = बच्चों को खेलने के विषयों में लुभाने तक विस्तृत हो सकता है। उपलब्ध खेल सामग्री और गतिविधि क्षेत्र के न आकार के आधार पर शिक्षक को एक या दो गतिविधि क्षेत्रों पर भीड़ से बचने के लिए एक गतिविधि क्षेत्र में हिस्सा व लेने वाले बच्चों की अधिकतम संख्या तय करनी चाहिए। स्त्राेत: पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लिए दिशा-निर्देश,राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), श्री अरविंदाे मार्ग, नई दिल्ली।