भाषा जीवन से जुड़ी भाषा जीवन से जुड़ी हम सभी भाषा को शब्दों, वाक्यों और 'ध्वनियों के व्यवस्थित रूप' में पहचानने के इतने आदी हो गए हैं कि अपने आस-पास बिखरी भाषाओं के विविध रूपों को पहचानने और सराहने की ओर ज़रा-सा भी ध्यान नहीं दे पाते। क्या स्कूल की घंटी या चाट वाले का तवा हमें पुकारता नहीं है? किसी अजनबी की आहट से हमारी गली का कुत्ता भौंक-भौंक कर हमें आगाह नहीं करता? फिर किसी परिचित को देखकर हमारे चेहरे की मुस्कान बहुत कुछ 'कह' नहीं जाती? अँधेरे में सोते हुए पाँच साल के बच्चे का अपने पास लेटे संबंधी को छूकर महसूस करना क्या ‘सुनने' की कोशिश नहीं? इन सब उदाहरणों के ज़रिए हम केवल भाषा के विविध रूपों की ओर इशारा करना चाहते हैं। भाषा अपनी बात कहने और दूसरों की बात समझने के माध्यमों (के समूह) का नाम है और यह जरूरी नहीं कि भाषा शाब्दिक ही हो या उसमें ध्वनियाँ ही हों। सभी प्राणियों में अपनी आवश्यकतानुसार एक-दूसरे से संप्रेषण करने की जन्मजात योग्यता होती है। मानव उन सबसे इसलिए अलग है, क्योंकि वह भाषा का इस्तेमाल केवल संप्रेषण के लिए ही नहीं बल्कि तर्क, कल्पना, विचार और सृजन के लिए भी करता है। मानव का भाषायी विकास उसके 'जन्म' से ही प्रारंभ हो जाता है और जिंदगी भर जारी रहता है। इस विकास में उसके आस-पास के लोग, स्थितियाँ, परिवेश आदि तो महत्वपूर्ण भूमिका निभाते ही हैं, उसका स्वयं का योगदान भी कुछ कम नहीं होता इसीलिए एक ही माँ की दो संतानों की भाषा इतनी अलग हो पाती है। यह इसलिए कि प्रत्येक मस्तिष्क अपने आस-पास की भाषा को ज्यों का त्यों ग्रहण नहीं कर लेता बल्कि उसे परिवर्धित करके उसमें अपने व्यक्तित्व के रंग भर लेता है। इस प्रकार किसी भी भाषा में सामूहिकता के साथ-साथ एक प्रकार की वैयक्तिक विशिष्टता सदैव मौजूद रहती है। विद्यालय का कार्य इन दोनों विशेषताओं के भरपूर विकास के लिए रोचक और सृजनात्मक वातवरण उपलब्ध करवाना है ताकि स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे किसी फैक्ट्री से निकलने वाले रोबोट न बन जाएँ बल्कि उनमें अपनी व्यक्तिगत विशेषताएँ बरकरार रहें। बच्चे का स्कूल में दाखिला लेना एक बड़ी घटना मानी जाती है बच्चे के अभिभावकों के लिए भी, बच्चे के लिए भी और शिक्षकों के लिए भी। पर तीनों के लिए कारण अलग-अलग होते हैं। बच्चे के लिए यह घटना इसलिए 'बड़ी' हो सकती है, क्योंकि यहाँ उसे नये दोस्त, नये झूले, नया मैदान, नये कपड़े और नयी चीजें (जिनमें किताबें, कॉपी आदि शामिल हैं) मिलेंगी। अभिभावकों के लिए यह इसलिए 'बड़ी' घटना बन जाती है, क्योंकि संभवतः पहली बार उनकी संतान इतने समय तक नियमित रूप से बिना उनके सहारे के रहेगी। शिक्षकों के लिए यह इसलिए बड़ी घटना बन जाती है, क्योंकि उनके सामने एक ऐसा 'उत्तरदायित्व' प्रस्तुत हो जाता है जिसे पढ़ाने-लिखाने की उनसे अपेक्षा की जाती है। यह उत्तरदायित्व और घटना इतनी महत्वपूर्ण बन जाती है कि शिक्षक यह मानने लग जाते हैं कि स्कूल के दरवाज़े में घुसने से पहले बच्चे का जीवन सीखने से रहित था या जो कुछ उसने स्कूल की चारदीवारी के बाहर सीखा, उसका स्कूल की पढ़ाई-लिखाई में कुछ खास फ़ायदा नहीं है। सब कुछ नये सिरे से शुरू करना पड़ेगा। वास्तविकता कुछ और है! स्कूल की चारदीवारी में दाखिल होने से पहले के पाँच सालों में बच्चा अपने परिवेश और घर की भाषाएँ बखूबी आत्मसात कर चुका होता है। वह अपनी ज़रूरतों (मुझे भूख लगी है) इच्छाओं (मेरा मन आइसक्रीम खाने का है), कल्पनाओं (कल मैंने शेर देखा था, सच्ची!) और राय (ये अच्छा गाना नहीं है) ज़ाहिर करने के लिए हैरान कर देने वाली हद तक भाषा का परिपक्व प्रयोग करता है। वे चुनौती देने (तुम मेरे जितना दौड़कर दिखाओ), तर्क करने (आप भैया को ज़्यादा प्यार करते हो), उदाहरण देने (बर्फ काँटे की तरह चुभ रही है), निष्कर्ष निकालने (अँधेरा हो गया, रात हो गई) आदि के लिए भी भाषा का ठीक उसी तरह उपयोग करते हैं जिस तरह 'बड़े' करते हैं, बस दोनों के शब्द भंडार और अनुभव संसार में अंतर होता है। जिस तरह बच्चों के लिए बड़ों के कई शब्द नए होते हैं, ठीक उसी तरह बड़ों के लिए भी बच्चों के संसार के कई शब्द नए होते हैं। इससे यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि बच्चों के पास स्कूल आने से पहले ही अच्छा-खासा भाषायी खज़ाना मौजूद होता है जिसे बच्चा अपनी समझ और अनुभवों के आधार परपहचाना, निखारा और सँवारा जाए। इन कामों में आपकी सहायता करेगा सतत और समग्र आकलन। भाषा की कक्षा और आकलन(गिनना) भाषा की कक्षा में आकलन के उद्देश्य हैं-भाषा की समझ, इसे विभिन्न संदर्भो में उपयोग करने की क्षमता और सौंदर्यपरक पहलू परख सकने की क्षमता का मापन। आकलन सीखने- सिखाने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। इसलिए यह आकलन करने से पहले कि बच्चे ने किसी कौशल को प्राप्त किया है या नहीं यह ज़रूर सोच लें कि आपने उस कौशल को प्राप्त करने के लिए बच्चे को बार-बार अलग तरह के अवसर दिए हैं या नहीं। यहाँ पर पहली से पाँचवीं तक की कक्षाओं के लिए आकलन के कुछ मूलभूत बिंदु (संकेतक) आपकी सुविधा के लिए दिए जा रहे हैं जिनमें बच्चे की ज़रूरत के अनुसार बदलाव किया जा सकता है। आकलन के बिंदु (संकेतक) 1. सुनना-समझना 1 सोचकर बोलना कविता/कहानी/विवरण अकेले या सामूहिक रूप से हाव-भाव सहित सुनाती/सुनाता है। कविता/कहानी/विवरण सुनकर बातचीत करती/ करता है। चित्रों पर विवरण सुनाती/सुनाता है।स्वतंत्र रूप से अपनी बात कहता/कहती है। सुनी हुई बात पर अपना मत व्यक्त करती/करता है। बोलते समय जेंडर सामंजस्य का ध्यान रखती/रखता है। दैनिक जीवन/परिचित संदर्भो/कक्षा की गतिविधियों का दो-चार वाक्यों में विवरण देती/देता है।संबंधित प्रश्न पूछती/पूछता है। हिंदी के शब्दों को सही ढंग से बोलती/बोलता है। बात को धैर्य और ध्यान के साथ सुनती/सुनता है।कविता/कहानी/विवरण हाव-भाव एवं आवाज़ के उतार-चढाव के साथ सनाती/सनाता है। क्या, कब, कहाँ, किससे, कैसे और क्यों वाले प्रश्नों के उत्तर पूरे वाक्यों में देती/देता है।नाटक एवं संवाद सुनकर प्रमुख तत्व ग्रहण करती/ करता है। परिचित परिस्थितियों के बारे में बातचीत करती/करता है। बोलते समय लिंग, वचन का सामंजस्य रखती/रखता है। हो रहे कार्य के संबंध में क्या, कब, कैसे प्रश्न पूछती/पूछता है। दैनिक जीवन में विभिन्न संदर्भो में स्वयं को अभिव्यक्त करती/करता है। 2 पढ़ना-समझना पढ़ने के लिए रुचि दिखाती/दिखाता है। परिचित शब्दों, नामों को कविता/कहानी श्यामपट्ट/शब्द कार्ड आदि में पहचानती/पहचानता है। शब्दों तथा छोटे-छोटे वाक्यों को सरलता से पढ़ती / पढ़ता है। नामों को अनुमान लगाकर पढ़ती/पढ़ता है।अर्थ समझ कर पढ़ती/पढ़ता है। कविता/कहानी/कार्ड/चित्र में आए शब्दों को सरलता से पढ़ती/पढ़ता है। वर्ण पहचान कर उनसे नए शब्द बनाती/बनाता और पढ़ती/पढ़ता है। पुस्तकालय की किताबों में से छोटी कहानी/कविता पढ़ती/पढ़ता है 2 पढ़कर समझना, समझ कर व्यक्त करना परिवेश में उपलब्ध लिखित और मुद्रित सामग्री को पढ़कर समझती/समझता है। छोटी सूचनाओं को पढ़कर समझती/समझता है। पढ़ी गई सामग्री के प्रमुख तत्व ग्रहण करती/ करता है। संदर्भ में आए शब्दों का अर्थ समझकर उपयोग करती/करता है। पुस्तकालय या अन्य स्रोतों से किताबें लेकर पढ़ती/ पढ़ता है। पाठ्यपुस्तक और उससे इतर सामग्री की रचनाओं मे पाई जाने वाली विविधता को पहचान कर उसकी सराहना करती/करता है। 3. लिखना अक्षर/शब्द मन से लिखती/लिखता है।पढ़े हुए शब्दों, नामों को लिखती/लिखता है। बोले/सुने हुए प्रश्नों का एक-दो वाक्यों में उत्तर लिखती/लिखता है। स्वयं पढ़कर एक या दो वाक्यों के उत्तर लिखती /लिखता है। सुनकर लिखती/लिखता है। दो-तीन वाक्यों में विवरण लिखती/लिखता है।पूरी वर्णमाला क्रम में लिखती/लिखता है। 3. लिखना क्यों, कब, कैसे वाले प्रश्नों के उत्तर पूरे वाक्यों में लिखती/लिखता है। शब्दों को उपयुक्त दूरी से सीधी लाइन में लिखती/ लिखता है। अपरिचित शब्दों का श्रुतलेखन करती/करता है। छोटा अनुच्छेद, विवरण लिखती/लिखता है। अपने सामान्य और विशेष अनुभवों को लिखती/ लिखता है। 4. सृजनात्मक अभिव्यक्ति देखकर और बिना देखे चित्र बनाती/बनाता है। कविता/कहानी सुनकर उसके अनुसार चित्र बनाती/बनाता है कविता/कहानी/परिचित घटना स्थिति का अभिनय करती/करता है। मिट्टी तथा आस-पास की अन्य सामग्री से चीजें बनाती/बनाता है। मन से कल्पना करके कहानियाँ/कविता बनाती/बनाता है। असमान वस्तुओं के बीच समानता और संबंध ढूँढती/ढूँढ़ता है। 4. सृजनात्मक अभिव्यक्ति किसी वस्तु का वर्णन करती/करता है। कल्पना व अनुभव से कहानी बनाती/बनाता और आगे बढ़ाती/बढ़ाता है। किसी वस्तु के सामान्य उपयोग के अलावा अन्य उपयोग सोचती/सोचता है। अनुपयोगी तथा कम लागत वाली सामग्री का इस्तेमाल करते हुए मुखौटे आदि बनाती/बनाता तथा अभिनय में उनका इस्तेमाल करती/करता है। भाषा के सौंदर्य की सराहना करती/करता है। आस-पास मौजूद पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों तथा लोगों के प्रति संवेदनशीलता का भाव रखती/रखता चीज़ों के व्यर्थ इस्तेमाल को रोकती/रोकता है। 5. परिवेशीय सजगता आस-पास होने वाली घटनाओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती/करता है। आस-पास मौजूद हालातों के बारे में सवाल करती/करता है। सीखना-सिखाना और आकलन उदाहरण आम की टोकरी (कविता) यह कविता पहली कक्षा की पाठ्यपुस्तक रिमझिम-1 से ली गई है। इस कविता में एक लडकी आम बेचने का अभिनय कर रही है। आम की टोकरी छह साल की छोकरी, भरकर लाई टोकरी। टोकरी में आम हैं,नहीं बताती दाम है। दिखा-दिखाकर टोकरी, हमें बुलाती छोकरी। हमको देती आम है,नहीं बताती नाम है। नाम नहीं अब पूछना, हमें आम है चूसना। सीखने-सिखाने के बिंदु सुनने के कौशल का विकास करना। बोलने के कौशल का विकास करना। अनुमान लगाकर पढ़ना। बच्चों को घर की बोली में बात करने का अवसर देना। उचित सुर, ताल और लय के साथ कविता पढ़ने के कौशल का विकास करना। स्थितियों, बातों, शब्दों आदि का अनुमान लगाना। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए तर्क देना। शब्दों, चीज़ों आदि का वर्गीकरण और विश्लेषण करना। समूह में कार्य करना बच्चे को चित्र बनाने का अवसर देना। चित्र और शब्दों द्वारा स्वयं को अभिव्यक्त करना। कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता का विकास करना। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया बातचीत शिक्षिका ने रोज़ की तरह कक्षा में जाने के बाद बच्चों से बातचीत शुरू कर दी। बातों ही बातों में उन्होंने पूछा-आज सुबह नाश्ते में क्या खाकर आए हो। बच्चों ने तरह-तरह की चीजें बतानी शुरू की। बच्चे बताते जाते और शिक्षिका ब्लैकबोर्ड पर लिखती जातीं। उन्होंने कई चीजें लिखीं-रोटी, पराँठा, दलिया, ब्रेड, केला, बिस्किट, सेब। राजू बोला – मैंने कुछ नहीं खाया।" शिक्षिका ने पूछा- "क्यों?" वह बोला – “माँ को तेज़ बुखार था। तभी गोकुल ने अपने बस्ते से केला निकाला- "लो इसे खा लो।" शिक्षिका ने बच्चों को ब्लैकबोर्ड पर लिखी चीजें दिखाते हुए पूछा “अब बताओ, इनमें से तुम्हारी वाली चीज़ कहाँ लिखी है।बच्चों ने अंदाज़े से बताना शुरू किया। फिर शिक्षिका ने सभी चीज़ों के नाम पढ़ने के बाद पूछा- "इनमें से फल कौन-कौन से हैं मिली ने कहा केला और सेब। । शिक्षिका ने केला और सेब के नीचे लाइन खींच कर पूछा- "और कौन-कौन से फल तुमने खाए हैं बच्चों ने फलों के नाम बताने शुरू किए-आम, पपीता, तरबूज़, संतरा, खरबूजा। उमेश बोला- "मुझे आम बहुत अच्छा लगता है। मीठा-मीठा।" सुहास बोला “मुझे तो कच्चा आम बहुत अच्छा लगता है। शिक्षिका बोली किस-किसको आम अच्छा लगता है ।कक्षा में कई बच्चों ने हाथ उठा लिए। शिक्षिका ने पूछा आम को तुम अपने घर की बोली में क्या कहते हो?''* बच्चों ने बड़े उत्साह से बताना शुरू किया। बच्चे बताते जाते टीचर ब्लैकबोर्ड पर लिखती जाती। तब शिक्षिका बोली मुझे भी आम बहुत अच्छा लगता है। आज हम आम के बारे में एक कविता पढ़ेंगे 'आम की टोकरी'। इस प्रकार शिक्षिका ने बच्चों से बातचीत करते हुए कक्षा का वातावरण सहज बनाया। उन्होंने बच्चों को अनुमान लगाकर पढ़ने का अवसर दिया। उनकी पसंद के फलों के बारे में बातचीत की। उन्हें अपनी घर की बोली में बातचीत करने का अवसर दिया ताकि कक्षा का हर बच्चा बिना झिझक के सीखने की प्रक्रिया में भाग ले सके। सीखने-सिखाने के दौरान आकलन बातचीत के दौरान शिक्षिका बच्चों का अवलोकन भी करती गईं। गीता, उमेश, सुहास और मिली उत्साह से बातचीत में भाग लेते हैं। गोकुल बहुत संवेदनशील है। उसने अपने बस्ते से केला निकालकर राजू को दिया। गीता, उमेश, सुहास, मिली, गोकुल, जया ब्लैकबोर्ड पर लिखी अपनी बताई खाने की चीज़ों को अनुमान लगाकर सही बता पाए। कक्षा में लगभग सभी बच्चे अनुमान लगाकर पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। अपनी पसंद/नापसंद की चीजें बताने में सभी बच्चों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। मीनल पहले चुपचाप बैठी थी।पर जब घर की बोली में 'आम' बताने को कहा गया तब सबसे पहले वही बोली। अपने घर की बोली में 'आम' शब्द बताने में सभी बच्चों ने उत्साह दिखाया। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 में भाषा शिक्षण के दौरान बहुभाषिकता को एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने की सिफ़ारिश की गई है। कविता सुनना-सुनाना शिक्षिका ने उचित सुर, ताल और लय के साथ कविता सुनाई। सुनाते समय उन्होंने देखा कि कविता सुनने में बच्चे आनंद ले रहे थे। शिक्षिका भी कविता का भरपूर आनंद ले रही थीं। इसके बाद शिक्षिका ने बच्चों से कहा “मैं कविता की एक-एक पंक्ति पढूंगी, तुम मेरे बाद दोहराना।" बच्चों ने वैसा ही किया। फिर शिक्षिका ने कहा “मैं एक पंक्ति पढूंगी, तुम अगली पंक्ति।" बच्चों ने वैसा ही किया। फिर शिक्षिका बोली “अब तुम कविता की पंक्ति पढ़ो, मैं दोहराऊँगी।" बच्चे पढ़ते और शिक्षिका दोहरातीं। बच्चों ने बड़े जोश और आत्मविश्वास से कविता पढ़ी। कविता की पंक्तियाँ पढ़ने का कार्य सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों तरह से कराया गया।जिन बच्चों को कविता याद नहीं हुई और जो बच्चे व्यक्तिगत रूप से कविता नहीं पढ़ सके, शिक्षिका ने उन बच्चों को डाँटाफटकारा नहीं, उन्होंने ऐसे बच्चों को उन बच्चों के साथ जोड़े में रखकर कविता दोहराने तथा पढ़ने का अवसर दिया, जिन बच्चों को कविता याद हो गई थी तथा व्यक्तिगत रूप से पढ़ सके थे। कविता पर बातचीत कविता सुनाने-दोहराने के बाद शिक्षिका ने कविता पर बातचीत की ताकि बच्चों को कविता समझने में मदद मिले। बातचीत के दौरान बिंदु रहे लड़की आम के दाम क्यों नहीं बता रही होगी। यदि तुम्हें टोकरी भर आम मिल जाएँ, तो तुम क्या करोगी/करोगे। आम फलों का राजा है, तो अंगूर क्या है। आम को फलों का राजा क्यों कहा गया है। आम फलों का राजा है तो कच्चा आम क्या है। आम के अलावा तुम्हें कौन-कौन से फल अच्छे लगते हैं। आम को किस-किस तरह से खाते हैं। बच्चों ने जवाब दिया-काटकर, चूस कर। शिक्षिका ने ब्लैकबोर्ड पर तालिका बनाई फल काटकर चूसकर छीलकर केला ✔ अमरुद ✔ आम ✔ पपीता ✔ इसके बाद बच्चों से पूछा-अब बताओ, कौन-से फल काटकर खाए |जा सकते हैं, कौन-से चूसकर और कौन-से छीलकर बच्चे जवाब देते जाते, शिक्षिका फल का नाम लिखती जातीं और तालिका में बच्चों को बुलाकर निशान लगवातीं। बच्चों ने इस गतिविधि में भी उत्साह से भाग लिया। वे अपनी बारी आने पर ब्लैक बोर्ड के पास आते और उनसे पहले यदि किसी बच्चे ने गलत कॉलम में का निशान लगाया है तो पहले उसे ठीक करते, फिर आगे बढ़ते। कक्षा मे एक बच्ची देख नहीं सकती थी, शिक्षिका ने उसे बोलकर गतिविधि में भाग लेने का अवसर दिया। अभिनय की बारी शिक्षिका ने कहा – “यह लड़की आम बेचने का खेल/अभिनय कर रही है। चलो, हम भी कुछ इसी तरह के खेल/अभिनय करते हैं।एक बच्चे ने ठेले में केला बेचने का अभिनय किया, अन्य बच्चों ने केले के दाम पूछे, केले खरीदने का अभिनय किया। आओ लिखें और गिनें शिक्षिका ने बच्चों से कहा- "कविता में से ऐसे शब्द चुनो जिनमें 'म' आता हैऔर उन्हें अपनी कॉपी में लिखो।" बच्चों ने कविता में से 'म' वर्ण वाले शब्द छाँटकर लिखने शुरू कर दिए। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा- "तुममें से किस-किस के नाम में 'म' आता है?" उमेश, मिली, मीनल,रीमा, अमर, मोहसिन ने झट से हाथ खड़े किए। शिक्षिका ने एक-एक करके इन सभी बच्चों के नाम ब्लैकबोर्ड पर लिखे। उन्होंने बच्चों से पूछा कि इनमें 'म' वर्ण कहाँ पर आया है। वे बच्चों को बुलाती और उनसे 'म' के नीचे रेखा खिचवातीं। शिक्षिका ने बच्चों को कविता के साथ छपा चित्र दिखाकर कहा-गिनकर लिखो कि टोकरी में कितने आम हैं? कविता बनाई जया - "हमें आम है लेना, फिर मम्मी को देना।" गोपाल और मीना - "पक्का आम कच्चा आम, देने नहीं पड़ेंगे दाम। सबसे बढ़िया फल है आम, कौन न जाने इसका नाम। सूरज - "आम आम आम, मीठा पीला आम। रीना ने कविता आगे बढ़ाई"खा लो काटो छीलो,या दूध का मिल्कशेक पी लो। सुहास- “आम है पीला-पीला और है रसीला। गीता ने झट से पंक्ति जोड़ी - "पापा हैं लाते, खाती है शीला। सोनू चुपचाप बैठी हुई थी। टीचर ने सोनू से कहा - "तुम बनाओ कविता। सोनू बोली- “आम, आम, आम।" फिर वह बोली- “अब आगे नहीं आता। सीखने-सिखाने के दौरान आकलन जया ने सबसे पहले कविता बनाई। गोपाल और मीना ने मिलकर कविता बनाई। सूरज ने कविता की एक पंक्ति बोली रीना ने कविता को आगे बढ़ाया। सुहास की बनाई कविता में गीता ने एक और पंक्ति जोड़ दी। सोनू ने कविता बनाने की कोशिश की पर एक ही पंक्ति बना सकी। टीचर ने बच्चों द्वारा लिखी कविताओं को उनके पोर्टफोलियों में रखा। उन्होंने यह भी नोट किया कि मिलकर कविता बनाते समय कौन-कौन से बच्चे बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे थे, आपस में एक-दूसरे के विचारों को सुन रहे थे, कविता सुनाने में किसने उत्साह दिखाया। आपने देखा कि इस कविता को पढ़ाते समय शिक्षिका विभिन्न भाषायी कौशलों के विकास के साथ आकलन भी करती चली गई। उन्होंने बच्चों से बातचीत करते समय उन्हें घर की बोली में बोलने का मौका देकर वातावरण को सहज बनाया। उनकी बताई चीज़ों को ब्लैकबोर्ड में लिखकर उन्हें अनुमान लगाकर पढ़ने का अवसर दिया। उन्होंने बच्चों के जीवन से जुड़े, अनुमान लगाने, तर्क करने, घर की बोली में बात करने, चित्रों पर आधारित, सृजनात्मकता का अवसर देने वाले, कक्षा की दुनिया को बाहर की दुनिया से जोड़ने वाले, भाषा का अवलोकन, विषयों से जुड़ाव के अवसर देने वाले अभ्यास करवाए। कविता पर बातचीत के दौरान सवाल भी इस तरह से पूछे, जिनके उत्तर बच्चों ने अपनी कल्पना, अनुमान तथा तर्क के आधार पर दिए। ब्लैकबोर्ड पर बनाई तालिका से बच्चों में वर्गीकरण के कौशल का विकास तथा आकलन किया। तालिका में जया द्वारा गोकुल के लगाए गए गलत निशान को ठीक करने से साथी द्वारा साथी (Peer Assessement) का आकलन भी हआ। आओ गिनें और लिखें गतिविधि द्वारा भाषा को गणित के साथ जोड़ते हुए लिखने के कौशल का आकलन किया। मेरा आम और कविता बनाओ गतिविधियों द्वारा बच्चों में सृजनात्मक कौशल के विकास के साथ उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्ति और बोलने के कौशल का आकलन किया। उन्होंने बच्चों की लिखी कविताओं तथा चित्रों को उनके पोर्टफोलियो में रखा। इस प्रकार सीखने-सिखाने के दौरान ही शिक्षिका ने सुनना, बोलना, पढ़ना, लिखना, वर्गीकरण, तर्क, अनुमान, अवलोकन, सृजनात्मक अभिव्यक्ति, संवेदनशीलता, समूह में कार्य करने की भावना, नेतृत्व की क्षमता आदि सभी पहलुओं का आकलन करते हुए उनके विकास के लिए भरपूर अवसर दिए। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान बच्चों ने क्या सीखा इसकी जानकारी टीचर विभिन्न तरीकों से ले सकती हैं। जैसे- अवलोकन, मौखिक तथा लिखित कार्य, पोर्टफोलियो में रखे गए बच्चों के कार्यो के नमूने आदि। आकलन से जुड़े कुछ मुद्दे बोलने-पढ़ने संबंधी गतिविधियों के दौरान बच्चे द्वारा गलत उच्चारण करने, हाव-भाव (विस्मय आदि) का प्रयोग न करने पर उसे तुरंत टोके नहीं। आपका टोकना उसमें भय और अरुचि के भाव उत्पन्न करेगा। यदि आप यह आकलन कर रहे हैं कि बच्चा आत्मविश्वासपूर्वक बोल रहा है या नहीं, तो आपको यह भी देखना होगा कि उसे अब तक बोलने के अवसर मिले भी हैं या नहीं। कई बच्चों को घर तथा स्कूल में बोलने पर बहुत टोका जाता है जिसका नतीजा यह होता है कि बच्चा बोलने में झिझकता है। जिस बिंदु का आप आकलन करना चाहते हैं उससे जुड़े कार्य करने के भरपूर अवसर बच्चों को दें। उन्हें कक्षा में स्वयं को अभिव्यक्त करने, सवाल पूछने और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए। कक्षा में इस प्रकार का सकारात्मक वातावरण एक दिन में ही बनना संभव नहीं है बल्कि यह भी एक सतत प्रक्रिया है. ठीक आकलन की ही तरह। यदि आपको किसी प्रश्न का अपेक्षित उत्तर न मिले तो आप यह जानने-समझने का प्रयास करें कि उत्तर देते समय बच्चे का दृष्टिकोण क्या रहा होगा। प्रत्येक बच्चे का दृष्टिकोण और सोचने का तरीका विशिष्ट/अलग होता है।इसलिए आपको एक ही प्रश्न के अनेक उत्तर मिलेंगे। बच्चों के उत्तरों पर नकारात्मक टिप्पणियाँ न दें। बच्चों के कई उत्तर कल्पना के आधारों पर स्वीकार किए जाने चाहिए न कि वैज्ञानिक सटीकता के आधार पर, क्योंकि बच्चों का कल्पना संसार बड़ों के वास्तविक संसार से अलग होता है। कक्षा में यदि बच्चे अपने घर की बोली या स्थानीय भाषा में स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं तो भी उनकी अभिव्यक्ति को समान महत्व दें। आकलन करने के लिए सबसे जरूरी यह है कि आप अपनी कक्षा के बच्चों उनकी परिस्तिथियों और ज़रूरतों को समझें। उदाहरण के लिए, यदि आप यह देखना चाहते हैं कि बच्चा सामग्री जुटाने में उत्साहपूर्वक भाग लेता है या नहीं/घर से अखबार लाया है या नहीं, तो आपको यह भी ध्यान देना होगा कि बच्चा यदि अखबार नहीं ला सका. तो उसका कारण क्या रहा होगा। संभव है कि उसके घर में अखबार आता ही न हो या उसे अनुमति ही न मिली हो अखबार लाने की। आप अपने पास एक रजिस्टर या डायरी में प्रत्येक बच्चे के नाम का लिखकर उनमें उस बच्चे के लिए टिप्पणियाँ लिख सकते हैं। एक बार में सभी के बारे में टिप्पणियाँ नहीं लिखी जा सकती। यह ज़रूरी नहीं है कि हर क्रियाकलाप/गतिविधि में कक्षा के हर बच्चे का आकलन किया जाए। यदि कक्षा में तीस या अस्सी बच्चे बैठे हों, तो हर बच्चे का आकलन एक ही समय पर करना कठिन है क्योंकि आकलन करते समय आपको बच्चे की हर गतिविधि पर ध्यान देना होगा। इसीलिए कभी आप बच्चे का व्यक्तिगत रूप से आकलन करें तो कभी सामूहिक रूप से। सामूहिक आकलन के लिए आप इन दो पक्षों पर विचार कर सकते हैं बच्चा अपने समूह में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहा है, समूह में किस प्रकार सहयोग कर रहा है तथा समूह का प्रतिनिधित्व किस प्रकार कर रहा है। यह आप केवल एक समूह पर ध्यान केंद्रित करके पता लगा सकते हैं। दूसरा तरीका यह है कि आप यह देखें कि प्रत्येक समूह में किन-किन बच्चों ने अपने उत्तरदायित्वों को अच्छी तरह समझकर कार्यों में रुचि दिखाई। उदाहरण के लिए, प्रत्येक समूह में किस-किस ने कक्षा के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने समूह का प्रतिनिधित्व किया। पोर्टफोलियो-सत्र के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक बच्चे तरह-तरह की गतिविधियों के दौरान बहुत कुछ लिख/बना रहे होते हैं। यह सब उनके पोर्टफोलियो/ फोल्डर में रखा जा सकता है। यदि आधुनिकतम तकनीकों की सुविधा हो तो सी.डी., कैसेट द्वारा उनके मौखिक कार्यों को भी पोर्टफोलियो में रखना संभव हो सकता है। पोर्टफोलियो रखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बच्चे अपने काम को उलट-पुलट कर देख सकते हैं, अभिभावकों को भी अपने बच्चे के काम की जानकारी मिलती रहती है, शिक्षक भी उसे सिर्फ़ जाँच नहीं अपितु सिखाने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उपकरण बना सकते हैं। बच्चों के कार्यों के नमूने पोर्टफोलियो में ज़रूर रखें। अवसर तथा व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिए जाने पर ये बच्चे सीखते ज़रूर हैं लेकिन कई बार इनकी प्रगति तुरंत नज़र नहीं आती। पोर्टफोलियो में रखे गए इनके कार्यों के नमूने शिक्षक तथा अभिभावक दोनों को ही बच्चे की प्रगति को देखने में मदद करेंगे। बच्चे में भी इससे आत्मविश्वास आएगा जो उसे आगे सीखने में मदद करेगा। शारीरिक चुनौती वाले बच्चों को विद्यालय की मुख्यधारा से जोड़ते समय भी पोर्टफोलियो में रखे उनके कार्यों के नमूनों से उनकी प्रगति की जानकारी प्राप्त होगी। अब सवाल उठता है कि पोर्टफोलियो में क्या-क्या हो। यहाँ कछ बातें सझाव के रूप में दी जा रही हैं - • कक्षा में सीखने-सिखाने के दौरान इस बात का प्रयास करें कि बच्चों को लगे कि उनकी बात का कक्षा में सम्मान किया जाता है। इसके लिए आप उनकी बातों को धैर्य और ध्यान से सुनें, उनकी तारीफ़ करें और गतिविधियों में भाग लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें। कक्षा के क्रियाकलापों, रोज़मर्रा के कार्यों, योजना बनाने और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को समान अवसर दें, उनसे सहयोग लें और उन्हें सहयोग दें। समान अवसर का मसला बहुत जटिल हो सकता है। इसका अर्थ यही है कि बच्चों को उनकी ज़रूरतों के अनुसार अवसर और सहयोग दें। कक्षा के लिए जो फैसले लिए जाते हैं, उनमें बच्चों की राय को भी सम्मान दें और स्वयं आदेश देने और लागू करने के बजाय बच्चों के साथ चर्चा करके लोकतांत्रिक तरीकों से निर्णय लें। यदि कक्षा में विशेष आवश्यकता वाले बच्चे हैं, तो उनकी क्षमताओं के सदुपयोग के अवसर भी आपको तलाशने होंगे। आप जिन गतिविधियों की योजना बना रहे हैं,उनमें जेंडर, जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कक्षा 1 और 2 कक्षा 3 से 5 (कक्षा 1 और 2 के लिए सुझाए गए बिंदुओं के साथ-साथ) तस्वीरें, चित्रकारी, लेख के नमूने, लेखन के शुरुआती दौर के वाक्य। मौखिक अभिव्यक्ति यदि बच्चों द्वारा सुनाया गया वर्णन, कहानी, संवाद, कविता, चुटकुले, पहेलियों आदि की रिकॉर्डिंग की गई हो तो उनके कैसेट/सी.डी.। श्रुतलेख, अनुकरण लेखन के नमूने। शुरुआती दौर का पठन, चित्र आदि को पढ़ने के नमूने (शिक्षिका द्वारा लिखे गए)। किसी चित्र को देखकर वर्णन करने केनमूने। घटना/कहानी पर बनाए गए चित्र और शब्द। लिखी हुई घटनाओं, कहानियों पर बनाए गए चित्र, शब्द और वाक्य। अपनी समझ से लिखी गई कहानी घटना वृत्तांत। नाटक के अभिनय के लिए ज़रूरी सामान की बनाई गई सूची और पात्रों के संवाद। तैयार किए गए विज्ञापन, नोटिस। अनुच्छेद लेखन। पत्र। स्वरचित कविताएँ कहानियाँ। लिखी हुई घटनाओं, कहानियों पर बनाए गए चित्र, शब्द और वाक्य। पनी समझ से लिखी गई कहानी घटना वृत्तांत। नाटक के अभिनय के लिए ज़रूरी सामान की बनाई गई सूची और पात्रों के संवाद। तैयार किए गए विज्ञापन, नोटिस। अनुच्छेद लेखन। पत्र। स्वरचित कविताएँ कहानियाँ। शिक्षिका/शिक्षक द्वारा अपने प्रयास का स्व-आकलन बच्चे के सीखने के स्तर और उपलब्धियों को परखने के साथ यह जानना भी आवश्यक है कि शिक्षिका/शिक्षक द्वारा कक्षा में अपनाए गए तरीके बच्चों की समझ बढ़ाने में कितने सहायक सिद्ध हुए हैं। इसलिए शिक्षक द्वारा अपने सिखाने के तरीकों का स्व-आकलन भी ज़रूरी है ताकि वह अपने सिखाने के तरीकों में बदलाव लाकर उनकी मदद कर सके। • कक्षा में सीखने-सिखाने के दौरान इस बात का प्रयास करें कि बच्चों को लगे कि उनकी बात का कक्षा में सम्मान किया जाता है। इसके लिए आप उनकी बातों को धैर्य और ध्यान से सुनें, उनकी तारीफ़ करें और गतिविधियों में भाग लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें। कक्षा के क्रियाकलापों, रोज़मर्रा के कार्यों, योजना बनाने और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को समान अवसर दें, उनसे सहयोग लें और उन्हें सहयोग दें। समान अवसर का मसला बहुत जटिल हो सकता है। इसका अर्थ यही है कि बच्चों को उनकी ज़रूरतों के अनुसार अवसर और सहयोग दें। कक्षा के लिए जो फैसले लिए जाते हैं, उनमें बच्चों की राय को भी सम्मान दें और स्वयं आदेश देने और लागू करने के बजाय बच्चों के साथ चर्चा करके लोकतांत्रिक तरीकों से निर्णय लें। यदि कक्षा में विशेष आवश्यकता वाले बच्चे हैं, तो उनकी क्षमताओं के सदुपयोग के अवसर भी आपको तलाशने होंगे। आप जिन गतिविधियों की योजना बना रहे हैंउनमें जेंडर, जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। शिक्षिका/शिक्षक द्वारा अपने प्रयास का स्व-आकलन बच्चे के सीखने के स्तर और उपलब्धियों को परखने के साथ यह जानना भी आवश्यक है कि शिक्षिका/शिक्षक द्वारा कक्षा में अपनाए गए तरीके बच्चों की समझ बढ़ाने में कितने सहायक सिद्ध हुए हैं। इसलिए शिक्षक द्वारा अपने सिखाने के तरीकों का स्व-आकलन भी ज़रूरी है ताकि वह अपने सिखाने के तरीकों में बदलाव लाकर उनकी मदद कर सके। शिक्षिका/शिक्षक द्वारा अपने सिखाने के तरीके के स्व-आकलन हेतु कुछ बिंदु मैंने कक्षा का वातावरण सहज बनाया। मैंने प्रत्येक बच्चे की क्षमता और रुचि की पहचान की। मैंने प्रत्येक बच्चे/समूह की सहायता की। मैंने जो बच्चे मदद माँगने में संकोच कर रहे थे, उनसे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। मैंने बच्चे की प्रगति का रिकॉर्ड रखा। मैंने प्रत्येक बच्चे/समूह के प्रयास की सराहना करते हुए उन्हें प्रोत्साहित किया। मैंने कक्षा में भाषायी विविधता को प्रोत्साहित किया। मैंने किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से दूर रहते हुए प्रत्येक बच्चे का आकलन किया। मैंने बच्चों की मौलिकता/सृजनशीलता को महत्व दिया। मैंने प्रत्येक बच्चे/समूह की बात को ध्यान तथा धैर्य से सुना। मैंने आकलन के दौरान एक बच्चे/समूह की तुलना दूसरे बच्चे/समूह से नहीं की। सृजनात्मक लिखित अभिव्यक्ति का आकलन करते समय वर्तनी की अशुद्धियों पर नहीं बल्कि विचार, मौलिकता एवं रचनात्मकता को महत्त्व दिया। सिखाने के विविध तरीकों का इस्तेमाल किया। मैंने विभिन्न रूप से सक्षम बच्चों को ध्यान में रखते हुए गतिविधियों का आयोजन किया तथा उन्हें सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में पूरी तरह शामिल किया रिकॉर्डिंग और रिपोर्टिंग रिकॉर्डिंग आकलन के संदर्भ में एक शिक्षक के लिए यह जानना-समझना ज़रूरी होता है कि उसकी कक्षा के बच्चे किस प्रकार सीखते हैं और सीखने की प्रक्रिया में उन्हें किससे तथा किस प्रकार की मदद की ज़रूरत है। शिक्षक कक्षा में पढ़ाते समय बच्चों के बारे में जो भी अवलोकन करते हैं उससे उन्हें बच्चों के सीखने के बारे में एक अंदाज़ा तो हो ही जाता है। बच्चे के सीखने की प्रगति की रिकॉर्डिंग ज़रूरी है। रिकॉर्डिंग के कई तरीके हैं, जैसे - चैक लिस्ट, अवलोकन, वीडियो रिकॉर्डिंग, पोर्टफोलियो, फोटोग्राफ्स आदि। ये सभी तरीके सीखने के बारे में कई तरह की जानकारी देते हैं। रिकॉर्डिंग भी योजनाबद्ध तरीके से की जाए। प्रत्येक बच्चे का प्रतिदिन रिकॉर्ड रखना जरूरी नहीं है। यदि आप अवलोकन कर रहे हैं तो एक दिन में केवल चार-पाँच बच्चों के बारे में ही रिकॉर्ड दर्ज़ करें। यह भी ध्यान रखना है कि देखी गई हर बात/गतिविधि की रिकॉर्डिंग करना ज़रूरी नहीं है, उसी बात की रिकॉर्डिंग की जाए जो बच्चे के प्रदर्शन के बारे में कुछ खास बात दर्शाती है। रिकॉर्ड की गई बातों का महत्त्व न केवल शिक्षक के लिए है बल्कि अभिभावकों, प्रशासकों और साथी शिक्षकों के लिए भी है। रिपोर्टिंग सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान की गई रिकॉर्डिंग को रिपोर्ट करना ज़रूरी नहीं है। यह रिकॉर्डिंग शिक्षक को बच्चे को सीखने की प्रक्रिया में मदद करने के लिए है। बच्चे के बारे में प्राप्त जानकारी से शिक्षक बच्चे की सीखने की गति के अनुसार उसे आगे सिखाने की योजना बना सकते हैं। अभिभावक बच्चे की प्रगति जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। ऐसे में आपको अभिभावकों को लिखित में जानकारी देनी होती है कि उनके बच्चे/बच्ची की प्रगति की कैसी स्थिति है? इसके लिए अच्छा यह रहेगा